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राजपाट- संकट में जो काम आए, वही होता है अपना

बाबा बिहार में पुराने समाजवादी रामानंद तिवारी के बेटे शिवानंद तिवारी को कहते हैं। वे पाला बदलते रहे हैं। कभी नीतीश के साथ तो कभी लालू के साथ।
Author May 15, 2017 04:44 am
नीतीश कुमार के साथ शिवानंद तिवारी ।

घर का भेदी
तिवाड़ी बम का भूत खूब छाया है आजकल राजस्थान में। भाजपा के सबसे वरिष्ठ नेता हैं घनश्याम तिवाड़ी। भैरोंसिंह शेखावत और वसुंधरा की पिछली सरकार में मंत्री रहे। इस बार वसुंधरा ने उन्हें हाशिए पर धकेल रखा है। अब अनुशासन की तलवार लटका दी है उनके सिर पर। जब से वसुंधरा ने सत्ता संभाली है, घनश्याम तिवाड़ी सरकार की कार्यप्रणाली के प्रति मुखर रहे हैं। ऊपर से दीनदयाल वाहिनी का गठन कर भ्रष्टाचार विरोधी मुहिम छेड़ रखी है। अगड़ों के हितों की अनदेखी के खिलाफ आक्रोश जताने से चूकते नहीं। ढाई साल तक तो भाजपा नेतृत्व ने उन्हें छेड़ा नहीं लेकिन अब जब विधानसभा चुनाव में महज एक साल बचा है, उन्हें केंद्रीय अनुशासन समिति से नोटिस दिला दिया है। तिवाड़ी इसे पार्टी विरोधी गतिविधि का अंजाम मानने को तैयार नहीं। वे तो एक विधेयक का विरोध मान रहे हैं इसकी वजह।

दरअसल इस विधेयक में वसुंधरा राजे ने प्रावधान कराया है कि पद से हटने के बाद भी मुख्यमंत्री को कैबिनेट मंत्री के बराबर सुख-सुविधाएं मिलेंगी। तिवाड़ी ने इस विधेयक का सदन में विरोध करते हुए डंके की चोट पर कह दिया कि कोई खुद को जन्मजात राजा कैसे मान सकता है लोकतंत्र में। उनकी शिकायत आलाकमान तक पार्टी के सूबेदार अशोक परनामी ने पहुंचाई। मुख्यमंत्री के दरबारी माने जाते हैं परनामी। इसी के बाद आलाकमान ने नोटिस भेज कर दस दिन के भीतर मांग लिया तिवाड़ी से जवाब। अभी जवाब दिया नहीं है उन्होंने। पर करीबियों को बता दिया है कि सूबे की सरकार के भ्रष्टाचार का खुलासा करेंगे, वे अपने जवाब में। तिवाड़ी की हां में हां मिलाने वालों की भाजपा में कमी नहीं है। भले वे खुल कर सामने आने को तैयार नहीं। उधर आरएसएस नहीं चाहता कि तिवाड़ी पर चाबुक चले। जयपुर में मंदिर तोड़े जाने के बाद से संघी खेमा वसुंधरा को ज्यादा पसंद नहीं कर रहा। सरकार और संघ के बीच दूरी बढ़ने की वजह भी तो यही बताई जा रही है।

सच्चे सखा
संकट में जो काम आए, वही होता है अपना। लालू यादव के संकट में बाबा आ रहे हैं उनके काम। बाबा बिहार में पुराने समाजवादी रामानंद तिवारी के बेटे शिवानंद तिवारी को कहते हैं। वे पाला बदलते रहे हैं। कभी नीतीश के साथ तो कभी लालू के साथ। पिछली बार जब नीतीश से खफा हो गए थे तो यहां तक एलान कर दिया था कि अब सियासत नहीं करेंगे। मतलब यह कि लोकसभा या विधानसभा का चुनाव नहीं लड़ेंगे। अलबत्ता नीतीश को छोड़ कर लालू के साथ हो गए थे। लालू ने भी उनकी प्रतिज्ञा का ध्यान रखते हुए उनके बजाए उनके बेटे को विधानसभा चुनाव में टिकट दे दिया था। जीत भी गया। हालांकि बाबा तो कुपित थे। क्रोध में अपने बेटे का प्रचार करने गए ही नहीं। बेटे राहुल को अखरा तो जरूर था, पर लालू का साथ फिर भी नहीं छोड़ा। इन दिनों बाबा अपना ज्यादा ध्यान लिखने-पढ़ने पर लगा रहे थे।

अचानक लालू यादव के बचाव में कूद पड़े। भाजपा ने लालू को घेरना तेज किया तो लालू के बचाव में बाबा लगे भाजपा को घेरने। दरअसल राजग के नेता भी कर रहे थे यों तो यह घेरेबंदी पर उनसे भाजपा काबू नहीं आ पा रही थी। बाबा के मैदान में उतरने से भाजपाई चौकन्ने हुए हैं। हालांकि इसी दौरान सुप्रीम कोर्ट का फैसला भी आ गया। किसी ने नहीं की लालू की हिमायत। इससे लालू परेशान भी हुए होंगे। ऐसे संकट के वक्त बाबा ही दिखे उनके साथ। सियासत से संन्यास लेने का मतलब यह तो कतई नहीं हो सकता कि वे संकट में घिरे किसी नेता का बचाव भी न करें। ऐसी तो कोई कसम उन्होंने खाई नहीं थी। संन्यास की यह सियासत शिवानंद तिवारी ही तो कर सकते हैं।

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