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राजपाट- बेटों को लेकर कतई चिंतित नहीं लालू

नीतीश भले इस भ्रम में हों कि वे बिहार से लालू प्रसाद का सियासी वजूद खत्म कर देंगे। पर लालू भी सियासत के मंजे खिलाड़ी ठहरे।
Author August 7, 2017 06:08 am
तेजस्वी यादव और लालू प्रसाद यादव।

लालू का पैंतरा
नीतीश भले इस भ्रम में हों कि वे बिहार से लालू प्रसाद का सियासी वजूद खत्म कर देंगे। पर लालू भी सियासत के मंजे खिलाड़ी ठहरे। बड़ी-बड़ी आफत और मुसीबत से निपटने का अनुभव है। मसलन, दस साल के वनवास के बाद बिहार की सत्ता में वापसी की थी। हालांकि बीस महीने में ही उससे बाहर भी हो गए। इसके बावजूद मनोबल कमजोर नहीं हुआ है। इसी महीने रैली कर रहे हैं। जिसे रैली के बजाए रैला नाम दे रहे हैं। भाजपा भगाओ, देश बचाओ। इस बहाने अपनी ताकत दिखाएंगे। तैयारी जोर-शोर से चल रही है। करीबियों का तो यह भी दावा है कि अपनी ताकत दिखाने के साथ-साथ नीतीश और भाजपा की विरोधी पार्टियों के एका का भी प्रदर्शन करेंगे। भाजपा विरोधी पार्टियों के मुख्यमंत्री शिरकत करेंगे। मायावती और अखिलेश यादव भी साथ दे सकते हैं। वे दोनों भी तो भाजपा के मारे हैं। बिहार में उनके लिए भाजपा से निपटना ज्यादा मुश्किल नहीं है क्योंकि सूबे में सबसे ताकतवर तो वे खुद ही हैं। वे तो नीतीश कुमार को कमजोर करने पर तुले हैं। नीतीश कमजोर पड़ेंगे तो भाजपा अपने आप टूट जाएगी। इस दौरान एक नया बदलाव और दिखा है लालू में। अब अपने बेटों को लेकर कतई चिंतित नहीं दिख रहे वे। बेटे तो खुद को नेता साबित करने में पिता से दो कदम आगे ही हैं। ऐसे में भाजपा विरोधी रैली के जरिए उन्हें भी तो और ताकत मिलेगी।
गले की फांस
अंधेरी गली में फंस गया लगता है अलग गोरखालैंड राज्य की मांग का आंदोलन। वजह महज ममता सरकार ही नहीं बल्कि केंद्र की मोदी सरकार की बेरुखी भी है। जून में शुरू हुए इस आंदोलन का सूत्रधार गोरखा जनमुक्ति मोर्चा करे तो क्या करे? बाहर निकलने का रास्ता ही नहीं सूझ रहा। अलबत्ता सरकार का ध्यान खींचने के फेर में नए-नए तरीके आजमा कर देख लिए। इससे हिंसा और आगजनी की घटनाएं ही बढ़ गईं। आठ लोगों की तो जान जा चुकी है अब तक इस आंदोलन के चलते। संपत्ति तो खैर अरबों की स्वाहा हो गई होगी। राज्य सरकार से तो जनमुक्ति मोर्चे को कोई आस पहले भी नहीं थी पर अब उसने केंद्र सरकार को जरूर दस दिन का अल्टीमेटम दे दिया है। आगे की कोई राह नहीं सूझ रही। सियासी दलों के लिए नाक का सवाल जरूर बन गया है। आंदोलन वापस लेने के लिए कोई बहाना भी तो चाहिए। अन्यथा किरकिरी होने का जोखिम ठहरा। रही आंदोलन को जारी रखने की बात तो उसकी कोई ठोस वजह नजर नहीं आ रही। दशा और दिशा तय करने के लिए अब जनमुक्ति मोर्चे ने इलाके के तमाम सियासी दलों को शामिल कर गोरखालैंड मांग समन्वय समिति जरूर बनाई है। पर मोर्चे के मुखिया बिमल गुरुंग ने यह शर्त रख दी है कि बेमियादी बंद को वापस लेने का कोई अधिकार नहीं होगा इस समिति को।

बंद अगर वापस लेना पड़ेगा तो फैसला गोरखा जनमुक्ति मोर्चा ही करेगा क्योंकि शुरू भी तो उसी ने किया था। उधर जिद पर ममता सरकार भी अड़ गई है। जब तक हिंसा खत्म नहीं होगी दार्जिलिंग के मुद्दे पर वह कोई वार्ता करेगी ही नहीं। जनमुक्ति मोर्चे के नेताओं को भी राज्य सरकार से वार्ता में कोई दिलचस्पी रही नहीं। वे तो लगातार कह रहे हैं कि वार्ता केवल केंद्र सरकार से हो सकती है। केंद्र भी भाव दे तब। कहने को भाजपा का सहयोगी है गोरखा जनमुक्ति मोर्चा। आंदोलन लंबा खिच जाने का खामियाजा अब गोरखा आबादी भी तो भुगत रही है। रोजमर्रा की जरूरत की चीजों का स्टाक खत्म हो चुका है। लाख टके का सवाल यही है कि नई बनी समिति और गोरखा जनमुक्ति मोर्चे का नेतृत्व अपने बेमियादी बंद को कब तक खींचेगा। पर इस सवाल का कोई जवाब नहीं दे पा रहे मोर्चे के नेता।

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