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राजपाट : नीकु का दिल्ली मोह

मोदी सरकार ने उत्तराखंड में राष्ट्रपति शासन लगाया तो नीतीश कुमार उस पर बरस पड़े। वे चुप क्यों रहते?
Author नई दिल्ली | April 3, 2016 23:25 pm
बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार। (फाइल फोटो)

केंद्र सरकार पर निशाना साधने का कोई भी मौका नीकु हाथ से नहीं जाने देते। नीकु यानी बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार अगर केंद्र के प्रति नरमी दिखाएंगे तो सियासी घाटा हो सकता है। बहरहाल, मोदी सरकार ने उत्तराखंड में राष्ट्रपति शासन लगाया तो नीतीश कुमार उस पर बरस पड़े। वे चुप क्यों रहते? राज्यों के प्रति अलोकतांत्रिक सलूक करने का आरोप तो लगाया ही साथ ही चुनौती भी दी कि अगर उसे राज्यों में गैरभाजपा सरकारें सहन नहीं हो रही तो वह दल-बदल कानून को ही खत्म कर दे। परोक्ष रूप से तो इसका यही मतलब था कि भाजपा विधायकों की खरीद-फरोख्त को बढ़ावा दे रही है। दल-बदल कानून की भी उसे परवाह नहीं है। कानून का भी कोई अर्थ नहीं है उसके लिए। नीकु दूर की सोचते हैं। भाजपा दल-बदल कानून के खिलाफ खुल कर कुछ बोल ही नहीं सकती। यही हिसाब-किताब बिठा कर नीकु ने उसे ललकारा है। नीकु जानते हैं कि भाजपा तो उन पर पलटवार भी नहीं कर सकती। चुनाव के बाद जब से बिहार में सत्ता संभाली है तभी से नीकु केंद्र सरकार के प्रति आक्रामक हैं। वे मानते हैं कि उन्होंने राज्यों में क्षेत्रीय दलों ही नहीं कांग्रेस को भी आईना दिखा दिया है कि गैरभाजपा पार्टी एकजुट हो जाए तो भाजपा को कहीं भी सत्ता में आने से रोक सकती है। उनका एजंडा केंद्र में भी गैरभाजपा दलों को एकजुट करने का है। इसके लिए वे पहल भी करने के मूड में दिख रहे हैं। तैयारी भी वैसी ही लगती है अभी से नीकु की।

सियासी मजबूरी
लालू यादव की छवि एक मसखरे नेता की बन चुकी है। राष्ट्रीय जनता दल के मुखिया के बारे में आम धारणा यही है कि वे हमेशा खुशमिजाज रहते हैं। बात भी ऐसी ही करते हैं कि सुनने वाले ठहाके रोक नहीं पाते। यहां तक कि गंभीर मुद्दों पर भी अपनी टिप्पणी से सामने वाले को हंसने को मजबूर कर देते हैं। फिर खुद भी हंसते हैं। अंदाज और ठेठ गंवई भाषा उन्हें दूसरों से अलग दिखाती है। पर अचानक न जाने क्या हो गया है कि लालू गंभीर दिखने लगे हैं। आजकल हंसी-ठिठोली भी कम ही कर रहे हैं। यहां तक कि इस बार होली भी बेहद सादगी से मनाई। जबकि अतीत में उनकी कपड़ा फाड़ और कीचड़ लपेट होली तमाम खबरिया चैनलों के लिए मुख्य आकर्षण होती थी। 1990 के दशक में पूजा-पाठ से चिढ़ने वाले लालू अब पूजा-पाठ पर कुछ ज्यादा ही ध्यान दे रहे हैं। एक तरह से जैसे अपनी छवि को सोच-विचार कर बदल रहे हैं। लगता है कि छोटे भाई नीकु की सोहबत का यह असर है। दरअसल नीकु की छवि तो सनातन गंभीर रहने वाले नेता की बनी हुई है। वे तो बोलते भी गंभीरता और संजीदगी से ही हैं। ठहाका लगाकर तो कभी हंसते ही नहीं। बेहद करीबियों को ही शायद उनकी हंसी दिखती होगी। पर वह भी यदाकदा। बिहार के सियासी हलकों में आजकल लोग चटखारे लेकर चर्चा कर रहे हैं कि कहीं बड़े भाई को छोटे भाई की छवि ने तो नहीं मोह लिया।

मौसम के माहिर
रंग बदलने में अगर गिरगिट को कोई मात दे सकता है तो वह भारत के नौकरशाह हैं। राजस्थान की नौकरशाही का मिजाज इस मायने में एकदम सटीक है। अभी वसुंधरा सरकार का आधा कार्यकाल ही पूरा हुआ है कि नौकरशाही ने रंग बदलना शुरू कर दिया है। अफसर हर मिलने-जुलने वाले से कौतुहल के साथ पूछ रहे हैं कि सूबे में अगली सरकार किसकी बनेगी। यानी वे मान रहे होंगे कि वसुंधरा सरकार का अब तक कार्यकाल लोगों में सकारात्मक छवि बनाने में सहायक नहीं हुआ। यों जमीनी हकीकत से भाजपा का आलाकमान भी अवगत जरूर होगा। सरकार की छवि को लेकर आशंका न होती तो भाजपा अब अपने हर विधायक का रिपोर्ट कार्ड तैयार कराने का फैसला क्यों लेती। विधायक तो ऐसे फैसले से बिदकेंगे ही। उनकी दलील गैरवाजिब है भी नहीं। काम तो सरकार ने नहीं किए। फिर ठीकरा विधायकों के सिर फोड़ने की क्या तुक है? जब मंत्री ही उन्हें तवज्जो नहीं देते तो अफसर क्या सुनेंगे? जिला कलेक्टर विधायकों की सिफारिशों को तरजीह देने की बजाए आला स्तर पर संपर्क साधते हैं। ले-देकर शुरू में गृहमंत्री गुलाब चंद्र कटारिया और चिकित्सा मंत्री राजेंद्र राठौड़ की जरूर कुछ धमक बनी थी। पर अब दोनों ही मुख्यमंत्री की तरफ से भाव न मिलने के चलते हाशिए पर लगते हैं। तभी तो उनके मंत्रालयों के अफसर उनके बजाए मुख्यमंत्री से सीधे निर्देश लेने लगे हैं। विधायकों और मंत्रियों की दुर्दशा से ही शायद नौकरशाही ने अनुमान लगाया है कि अगली सरकार किसकी बनेगी। यों भी राजस्थान का सियासी मिजाज एक तय ढर्रे पर ही चलता आया है। एक बार कांग्रेस तो अगली बार भाजपा सत्ता में आती है। शायद इसी वजह से अफसर कांग्रेस की अंदरूनी राजनीति में ज्यादा दिलचस्पी दिखा रहे हैं। वे इसी उधेड़बुन में लगते हैं कि कांग्रेस में पहले की तरह अशोक गहलोत का दबदबा रहेगा या फिर सचिन पायलट की हैसियत बढ़ जाएगी।

असम में महाभारत
जिन पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव की प्रक्रिया चल रही है, उनमें भाजपा के लिए बेहतर संभावनाएं महज असम में ही हैं। अन्यथा पश्चिम बंगाल हो या तमिलनाडु, पुड्डुचेरी हो या केरल, वहां तो खाता खुलने तक के लाले हैं। असम में भी सफलता की संभावना अपने कारणों से नहीं यूडीएफ और कांग्रेस की तकरार के चलते बढ़ी है। तभी तो नरेंद्र मोदी से लेकर राजनाथ सिंह और स्मृति ईरानी से लेकर अमित शाह तक तमाम भाजपाई धुरंधर यहां सघन प्रचार में जुटे हैं। पहले चरण में चार अप्रैल को पूर्वोत्तर के प्रवेश द्वार कहे जाने वाले इस सूबे में 126 में से 65 सीटों के लिए मतदान होगा। अपनी चुनावी रैलियों में भाजपा के नेता कांग्रेस के प्रति काफी आक्रामक रुख अपना रहे हैं। वैसे भी पिछले 15 साल से काबिज है सूबे की सत्ता पर कांग्रेस। सो शीला दीक्षित की तरह कहीं तरुण गोगोई को भी सत्ता विरोधी रूझान भारी न पड़ जाए। भाजपा ने एक तरफ यूडीएफ और कांग्रेस के बीच तालमेल नहीं होने दिया तो दूसरी तरफ असम गण परिषद और बोडो पीपुल्स फ्रंट से गठबंधन कर मजबूत विकल्प दिया है। बेचारे तरुण गोगोई मोदी के हमले से ऐसे तिलमिलाए कि भाजपा पर एक साल पहले बागी मंत्री हिमंत विश्वशर्मा की मदद से अपनी सरकार गिराने की साजिश रचने का आरोप जड़ दिया। सोनिया गांधी भी पीछे नहीं रहीं मोदी को कोसने में। चुनावी नतीजा चाहे जो रहे पर प्रचार की शैली ने तो कड़वाहट बढ़ाई है कांग्रेस और भाजपा के रिश्तों में।

दिवास्वप्न
हिमाचल को लेकर मुंगेरी लाल की तरह हसीन सपने देख रही है भाजपा। जबकि वीरभद्र सरकार के पास पर्याप्त बहुमत है। ऊपर से हिलोपा और निर्दलीय विधायकों का समर्थन जोड़ें तो 68 के सदन में पार्टी का आंकड़ा 41 बनता है। साफ है कि उत्तराखंड दोहराना है तो नौ कांग्रेसी विधायकों को तोड़ना पड़ेगा। पर यहां तो कोई भी कांग्रेसी विधायक टूटने को तैयार नहीं है। दरअसल प्रवर्तन निदेशालय की कार्रवाई के मद्देनजर भाजपा को सूबे की सत्ता का दिवास्वप्न ललचा रहा है। निदेशालय ने वीरभद्र की आठ करोड़ की संपत्तियों को फिलहाल जब्त किया है। इस कवायद के बाद विधानसभा के बजट सत्र के आखिरी चरण में भाजपा ने थोड़ी मुखरता भी दिखाई थी। कटौती प्रस्ताव पर सत्ता पक्ष की जुबान फिसलने को ही बड़ा मुद्दा बना रहे थे बेचारे मासूम भाजपाई। दरअसल जिस दिन बजट पारित हुआ, एक कटौती प्रस्ताव की चर्चा पर सत्ता पक्ष को न बोलना था। पर गलती से बोल दिया हां। विपक्ष ने इसी को मुद्दा बना लिया। दलील दी कि बजट तो पारित माना ही नहीं जाएगा क्योंकि कटौती प्रस्ताव के तहत सरकार ने विपक्ष की मांग स्वीकार कर ली। नादान भाजपाई भूल गए कि जब तक मत विभाजन की मांग न की गई हो बजट पारित ही माना जाता है। भाजपाई फिर भी कुतर्क कर रहे हैं कि सरकार का बजट पारित नहीं हुआ सो वीरभद्र सरकार भी अब अवैध हो गई। सदन से यही तुर्रा छोड़ कर बाहर चले गए भाजपाई। हल्ला-गुल्ला अगले दिन भी दोहराया और फिर बाहर निकल गए। लेकिन बहुमत के अभाव में सपने देखना बचकाना हरकत ही मानी जाएगी। सूबे में किसी तरह का संवैधानिक संकट भी नहीं दिखता कि उसकी आड़ लेकर राष्ट्रपति शासन लगा दिया जाए। बैकडोर से सत्ता पाने का शार्टकट अपनाने का भाजपाई लालच समझ से परे ही लगता है।

भाग्योदय
कांगड़ा जिले में हिमाचल सरकार के मंत्री सुधीर शर्मा ने कद बढ़ाया है। मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह के करीबी ठहरे। उनकी हैसियत बढ़ते देख दूसरे कांग्रेसी दिग्गजों के पैरों तले से जमीन खिसकने लगी है। शर्मा धर्मशाला से विधायक ठहरे। इलाका तो उनका दूसरा था पर टिकट यहां से दे दिया पार्टी ने। किस्मत वाले निकले कि विजय मिल गई। धर्मशाला में भारत और पाकिस्तान का प्रस्तावित क्रिकेट मैच नहीं होने देने का ठीकरा भाजपा ने वीरभद्र के सिर फोड़ा था। धर्मशाला के लोगों को इससे भारी घाटा होने की दलील दी थी। पर भाजपा का यह आकलन तो गलत साबित हो गया। यहां तो सुधीर शर्मा ने अपनी जड़ें और जमा ली हैं। हाल ही में धर्मशाला को सूबे की सरकार ने नगर निगम का दर्जा भी दे दिया। इससे पहले इकलौता नगर निगम शिमला ही था। नगर निगम बनते ही धर्मशाला में चुनाव हुए तो भाजपा का सूपड़ा ही साफ हो गया। जबकि उम्मीदवारों के समर्थन में शांता कुमार जैसे कद्दावर और पुराने धुरंधर भी प्रचार करने आए थे। सुधीर शर्मा के आगे सब विफल हो गए। लोकप्रियता की वजह धर्मशाला के विकास की उनकी धुन को माना जा रहा है।

बेतुकी बंदिश
मध्य प्रदेश विधानसभा में विधायक बहस के दौरान और भाषण में कौन से शब्दों का प्रयोग करेंगे इसकी बाकायदा एक नियमावली है। इसी नियमावली के तहत गरिमा के अनुरूप नहीं दिखने वाले शब्दों को प्रतिबंधित किया गया है। मसलन बहस के दौरान विधायक, मंत्री या मुख्यमंत्री असत्य शब्द का इस्तेमाल तो कर सकते हैं लेकिन झूठ शब्द नहीं चलेगा। इसी तरह गलत काम तो स्वीकार है पर बेईमानी शब्द नहीं। आम आदमी ऐसी चौंकाने वाली पाबंदी से अनभिज्ञ है। जबकि आम आदमी को तो ये शब्द आम बोलचाल के ही लगते हैं। जिन शब्दों को प्रतिबंधित शब्दों की जगह इस्तेमाल करने की छूट है वे तो पर्यायवाची ही ठहरे। लेकिन हास्यास्पद नियमावली का कोई क्या करे? जिसमें पाप तो स्वीकार नहीं है पर उसकी जगह गलत कृत्य की सुविधा है। कुकर्म की जगह अनैतिक बोलना होगा। बेशर्मी शब्द बोलने की इजाजत नहीं। उसकी जगह लंबा शब्द शालीनता से नहीं इस्तेमाल करना पड़ता है। चापलूसी स्वीकार नहीं। उसकी जगह गुणगान बोलो। मजे लेना असंसदीय है पर आनंद करना चलेगा। अगर कोई भूल से भी प्रतिबंधित शब्द का प्रयोग करे तो उसे तुरंत विलोपित कर दिया जाता है। विधानसभा अध्यक्ष सीताशरण शर्मा को ऐसी बचकाना पाबंदी पर कोई अफसोस नहीं। वे तो संसदीय गरिमा की चिंता में दुबले हुए जा रहे हैं।

मफलर वाले का खौफ
आम आदमी पार्टी का पंजाब की सियासत में उभार हैरान करने वाला है। एक चैनल ने तो अपने सर्वेक्षण में पार्टी को बहुमत के करीब पहुंचा दिया है। कांग्रेस की तो इस सर्वेक्षण के नतीजों से नींद ही उड़ गई है। पर बेचैनी अकाली दल और भाजपा गठबंधन की भी कम नहीं बढ़ी है। इस गठबंधन की नींद तो सिद्धू दंपत्ति ने और ज्यादा उड़ा दी है। क्रिकेट से राजनीति में आए सिद्धू ने अमृतसर लोकसभा सीट पर जीत की हैट्रिक लगाई थी। पर मोदी की लहर में उनकी सीट अरुण जेटली ने झटक ली। यह बात अलग है कि वे अपने जीवन का पहला ही चुनाव हार गए। सिद्धू की पत्नी नवजोत कौर सिद्धू भाजपा की विधायक हैं। उन्होंने हाल ही में एक चौंकाने वाला बयान दे दिया। हर कोई उसके निहितार्थ खोज रहा है। पर संकेत यही लगता है कि वे अरविंद केजरीवाल की पार्टी में जाने की तैयारी में हैं। पति की उपेक्षा हो तो भारतीय पत्नी सहन कैसे कर सकती है। पंजाब में विधानसभा चुनाव अब ज्यादा दूर नहीं। लेकिन पार्टी की बैठकों में उनके पति को कोई बुला ही नहीं रहा है। सिद्धू दंपत्ति अगर आम आदमी पार्टी में चला गई तो भाजपा के लिए खतरे की घंटी बज सकती है। चर्चा तो अरसे से चल रही है कि केजरीवाल नवजोत सिद्धू को अपनी पार्टी की तरफ से मुख्यमंत्री पद की उम्मीदवारी की पेशकश तक कर चुके हैं। सिद्धू की अकाली दल से अदावत किसी से छिपी नहीं है। वे तो इसी राय के हैं कि भाजपा ने अकाली दल से पीछा नहीं छुड़ाया तो घाटा होगा। जहां तक आम आदमी पार्टी का सवाल है, लोकसभा चुनाव में उसे चारों सीटें पंजाब से ही मिली थीं। माघ मेले के मौके पर हुई तीनों पार्टियों की रैलियों को देखें तो सबसे ज्यादा भीड़ केजरीवाल की रैली में ही उमड़ी थी। इस नाते पार्टी की संभावनाएं तो हर कोई देख रहा है पंजाब में। अटकलें तो यहां तक लगाई जा रही हैं कि बहुमत मिला तो केजरीवाल पंजाब के मुख्यमंत्री बन जाएंगे और दिल्ली का राजपाट अपने डिप्टी मनीष सिसोदिया के हवाले कर देंगे।

दुरुस्त आयद
मध्य प्रदेश विधानसभा का बजट सत्र अप्रैल फूल वाले दिन खत्म हो गया। लेकिन यह कई मायनों में अनूठे सत्र के तौर पर याद किया जाएगा। मसलन, सोलह साल में पहली बार बजट सत्र की पहले से निर्धारित सभी 39 बैठकें हुईं। अनुदान की मांगों पर भी 61 घंटे से ज्यादा माथा-पच्ची की विधायकों ने। इस माथा-पच्ची में 110 सदस्यों ने शिरकत की। खास बात यह रही कि इनमें 66 पहली बार सदन के सदस्य बने विधायक थे। सरकार के बारह विधेयक भी पारित हो गए। 888 ध्यानाकर्षण प्रस्ताव आए और 14 गैरसरकारी संकल्पों पर चर्चा हुई। एक और परंपरा पड़ी इस सत्र से। बैठक का समय साढ़े दस के बजाए 11 बजे हो गया। दूसरी नई परंपरा महिलाओं को तरजीह देने वाली थी। महिला और बाल विकास विभाग के बजट पर चर्चा में सिर्फ महिला सदस्यों को ही भाग लेने दिया गया। विपक्ष ने भी सदन में चर्चा और बहस से कतई जी नहीं चुराया। तभी तो विधानसभा अध्यक्ष सीताशरण शर्मा ने सत्ता पक्ष से ज्यादा सकारात्मक सहयोग विपक्ष का मिलने की दुहाई दी। संसदीय कार्यमंत्री नरोत्तम मिश्र की कुशलता के बिना कैसे संभव हो सकता था यह नतीजा। तभी तो एक विधायक ने उन्हें बधाई देते वक्त विराट कोहली बता दिया। मिश्र के नाम भी कोहली की तरह कुछ तो कीर्तिमान हैं भी। मसलन, वे पिछली तीन विधानसभाओं में लगातार संसदीय कार्यमंत्री का जिम्मा संभालते रहे हैं। पूरे एक दशक से।

जूतों में दाल
उत्तराखंड में कांग्रेस की सरकार गिरा कर भाजपा कुछ ज्यादा ही खुशफहमी में लगती है। जबकि पार्टी के भीतर जूतों में दाल बंटने की नौबत साफ नजर आ रही है। वैकल्पिक सरकार का नेतृत्व कौन करेगा, यह सवाल एक अबूझ पहेली बन गया है। कांग्रेस से भाजपा में आए और कांग्रेसी सरकार को गिराने में अहम भूमिका निभाने वाले सतपाल महाराज मुख्यमंत्री पद की दौड़ में खुद को आगे मान रहे हैं। इस चक्कर में दूसरे राजपूत नेता और खांटी संघी भगत सिंह कोश्यारी के साथ उनका रोचक शब्द संघर्ष भी चल पड़ा है। हरक सिंह रावत भी ठाकुर ठहरे। मुख्यमंत्री के लिए उन्होंने ही कोश्यारी का नाम आगे बढ़ाया है। इससे सतपाल महाराज तिलमिला गए। हरक सिंह रावत को आड़े हाथ लिया और पूछा कि वे मुख्यमंत्री बनाने वाले कौन होते हैं। उधर हरक सिंह का बचाव कोश्यारी को करना ही पड़ता। उन्होंने सतपाल महाराज पर जुमला कस दिया कि वे अपने करीबी कांग्रेसी विधायकों को तोड़ ही नहीं पाए। सतपाल महाराज इससे चिढ़ते ही। नहले पर दहला जड़ दिया कि कोश्यारी भी तो अपनी चेली को कांग्रेस से तोड़ कर भाजपा में नहीं ला पाए। उनका इशारा अल्मोड़ा की विधायक रेखा आर्य की तरफ था। जो कभी भाजपा में थीं और कोश्यारी की करीबी मानी जाती थीं। खुद पर हुए इस हमले की शिकायत कोश्यारी पार्टी आलाकमान से कर दी। कोश्यारी खेमे का दावा है कि आलाकमान ने सतपाल महाराज को फटाकारा। नतीजतन बेचारे बैकफुट पर नजर आए। पर किरकिरी तो करा ही ली अपनी।

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