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राजपाट: राष्ट्रपति चुनाव के लिए विपक्ष ने गैरभाजपा दलों को किया एकजुट, राजग ने नहीं खोले अभी तक पत्ते

अयोध्या मामले में लालकृष्ण आडवाणी के आरोपी बना दिए जाने के बाद नरेंद्र मोदी उन्हें शायद ही बनाना चाहेंगे उम्मीदवार।
Author May 15, 2017 04:31 am
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी। (फोटो- पीटीआई)

नीकु का मौन
मौनी बाबा जैसे क्यों बन गए हैं नीकु। नीकु यानी बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के बारे में सियासी हलकों में यह सवाल प्रमुखता से पूछा जा रहा है। मौनी बाबा यानी जुबान न खोलने वाला बाबा। जिसने जानबूझ कर मौन धारण कर लिया हो। इसी से यह शब्द ऐसा प्रचलन में आया कि जो भी चुप्पी साधने की आदत बना ले, उसे सब मौनी बाबा कहने लगे। यों तो नीकु न जाने कितनी बार दोहरा चुके हैं कि न वे भ्रष्टाचार से समझौता करेंगे और न किसी भ्रष्ट से। उन्हें यह तो पता ही होगा कि वे बिहार के मुख्यमंत्री की कुर्सी पर लालू यादव के दम पर बैठे हैं। चुनाव से पहले ही वादा कर लिया था, लालू ने उन्हें यह कुर्सी सौंपने का। अपना वादा पूरा भी कर दिया। लेकिन लालू को तो चारा घोटाले के लिए अदालत से सजा हो चुकी है। इस नाते उन्हें कोई भी कह सकता है भ्रष्टचारी। ऊपर से सुप्रीम कोर्ट का नया फरमान अलग आ गया। भ्रष्टाचार के चार मामलों में नए सिरे से सुनवाई का। भाजपाई इसके बाद से फूले नहीं समा रहे। वे मान रहे हैं कि मुकदमा चलेगा तो फिर सजा हो जाएगी लालू को। हालांकि सजा हो जाने से भी क्या फर्क पड़ेगा। एक मामले में हुई सजा ने ही चौपट कर रखा है उनका सियासी करिअर। पर भाजपा नेताओं ने इस बहाने नीकु की घेरेबंदी तेज कर दी है। काल्पनिक सवाल को सैद्धांतिक जामा पहना रहे हैं। नीकु से पूछ रहे हैं कि अगर फिर सजा हो गई तो क्या वे लालू का साथ छोड़ देंगे। एकाध छुटभैए ने उन्हें लालू को छोड़ भाजपा के साथ आने की सलाह भी दे डाली है। तो कुछ नीकु का इस्तीफा मांग रहे हैं। इन उलझनों से बचने का नीकु को सटीक उपाय मौनी बाबा बन जाना लगा होगा। जिसे जो बोलना है, बोलता रहे। दिवास्वप्न देखता है तो देखे। समय के साथ सब ठंडा पड़ जाएगा। नीकु का बतौर मुख्यमंत्री तीसरा कार्यकाल भी पूरा हो जाएगा। सूबे में नया कीर्तिमान बनेगा। वैसे भी नीकु खुद को आशावादी बताते रहे। सियासत में कुछ भी निश्चित नहीं होता। फिर वे अनिश्चय को लेकर अपना चैन और सुकून क्यों खोएं। क्या पता कल प्रधानमंत्री बनने का ही मौका मिल जाए।

यक्ष प्रश्न
राष्ट्रपति चुनाव की कवायद तेज हो गई है। विपक्ष इसी बहाने गैरभाजपा दलों की एकजुटता की कवायद कर रहा है तो राजग ने भी अभी तक अपने पत्ते नहीं खोले हैं। अयोध्या मामले में लालकृष्ण आडवाणी के आरोपी बना दिए जाने के बाद नरेंद्र मोदी उन्हें शायद ही बनाना चाहेंगे उम्मीदवार। कौन हो सकता है राजग का उम्मीदवार, इसे लेकर अभी तक अटकलें ही लग रही हैं। अलबत्ता आदिवासी राष्ट्रपति के तौर पर झारखंड की राज्यपाल द्रौपदी मुर्मू को नरेंद्र मोदी की सर्वोच्च पद के लिए पसंद बताने वालों की भी कमी नहीं है। इससे पहले लोकसभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन के नाम को लेकर भी खूब अटकलें लगी थीं। बहरहाल विपक्ष का उम्मीदवार कौन होगा, यह भले अभी तय न हो पाया हो, पर ममता बनर्जी और सोनिया गांधी की कोशिश विपक्ष का साझा उम्मीदवार देने की लगती जरूर है। पश्चिम बंगाल के राज्यपाल रह चुके महात्मा गांधी के पौत्र गोपाल कृष्ण गांधी और लोकसभा अध्यक्ष रह चुकीं मीरा कुमार के नाम चर्चा में हैं। चर्चा में तो शरद यादव और शरद पवार के नाम भी आ चुके हैं। जो भी हो कांग्रेस ने फिलहाल अपने ही साझा उम्मीदवार की कोई शर्त नहीं रखने की नीति अपनाई है। ममता बनर्जी को मंत्रणा के लिए न्योता भी भेज दिया सोनिया ने। इसी चक्कर में तृणमूल कांग्रेस ने अपनी कोर कमेटी की छह मई को तय बैठक टाल दी थी। अब 19 मई को होगी यह बैठक। दिल्ली में संभावित समीकरणों पर विचार के लिए खासा वक्त मिल जाएगा पार्टी को। पश्चिम बंगाल में कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस के रिश्ते बेशक तल्ख हैं, पर ममता और सोनिया के निजी रिश्तों में अभी भी गरमाहट बरकरार है। अपने भुवनेश्वर दौरे में इस मुद्दे पर नवीन पटनायक से भी बातचीत कर आई थीं ममता। माकपा महासचिव सीताराम येचुरी को पश्चिम बंगाल से राज्यसभा चुनाव लड़ने में मदद का संकेत देकर कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने भाजपा के खिलाफ सभी दलों को लामबंद करने की रणनीति अपनाने का मन बना लिया है।

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