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नन्ही दुनियाः वह उठा और बोला…

कितनी उलझन भरी सुबह थी। कुछ भी अच्छा नहीं लग रहा था। आकाश ने अपनी घड़ी की तरफ देखा। सात बज कर पैंतीस मिनट, मंगलवार, सन 2028, तापमान 18 डिग्री, आर्द्रता... ।
Author July 30, 2017 00:52 am

अरविंद राज

कितनी उलझन भरी सुबह थी। कुछ भी अच्छा नहीं लग रहा था। आकाश ने अपनी घड़ी की तरफ देखा। सात बज कर पैंतीस मिनट, मंगलवार, सन 2028, तापमान 18 डिग्री, आर्द्रता… ।
सूर्योदय हो चुका था, पर घने कोहरे के कारण अभी प्रकाश में दम न था। उसे कुछ ठंड-सी महसूस हो रही थी। उसने लिहाफ कंधे तक खींच लिया। फिर उसने दक्षिण की ओर देखा। पृथ्वी का बड़ा गोला अस्त हो रहा था। पृथ्वी को अस्त होते देख उसे डॉक्टर पांडेय की याद आई। वे जब-तब कहा करते थे, ‘एक दिन आधुनिकता के ये साधन बच्चों का बचपन छीन लेंगे। बच्चे, बच्चे नहीं रह जाएंगे। दुनिया में बच्चे तो होंगे, पर बचपन नहीं होगा।’
डॉक्टर पांडेय, आकाश के पिता के मित्र, पृथ्वी के वयोवृद्ध शोधकर्ता, साथ ही साहित्यकार। उनके पास थीं बच्चों को ज्ञान देने वाली ढेर बातें, ढेर पुरस्कार, ढेर साहित्य। आज आकाश को अपना हाल देख, उनकी बातें सच लग रही थीं।

आकाश के पिता, मिस्टर कुमार कंप्यूटर विशेषज्ञ थे। वह भी ऐसे कि पूरी धरती, चांद, मंगल और यहां, यानी क्रिस-36 ग्रह पर, हर जगह उनकी पूछ थी। इस समय वे यहां से चौदह प्रकाशवर्ष दूर अपनी पृथ्वीवाली लैब में व्यस्त हैं।
वे आजकल एक ऐसे प्रोग्राम पर कार्य कर रहे थे, जिससे जाना जा सकेगा कि इंटरनेट कौन चला रहा है, क्या कर रहा है, क्या देख रहा है, कौन-सी वेबसाइट खोले हुए है। यह मिस्टर कुमार की बरसों पुरानी इच्छा थी। इंटरनेट पर बच्चों के अवांछित प्रोग्राम, वायरस बनाने वालों, हैकिंग और साइबर क्राइम करने वालों से उन्हें सख्त नफरत थी। उनका मानना था कि सर्वर पर एक ऐसा कंट्रोल रूम बने, जहां से हर नेट यूजर और उसकी गतिविधियों को देखा जा सके। एक ऐसा मास्टर कंट्रोलर कंप्यूटर बने, जो नेट यूजर की उम्र, जरूरत आदि को देख कर उसकी अवांछित गतिविधियों को अपने आप ब्लॉक करके उसे तुरंत नेट से डिस्कनेक्ट कर दे। वे पिछले पांच वर्षों से इस अभियान में जुटे थे। सफलता उनके कदमों में बिछने को तैयार खड़ी थी।

आकाश की मां, मैडम भारती पृथ्वी की जानी-मानी वैज्ञानिक। इस क्रिस-36 ग्रह को मानव के रहने योग्य बनाने के अभियान की जुटी थीं। उन्हीं के प्रयासों से छह वर्ष पहले खोजे गए इस ग्रह पर आज मानव बस्तियां बस चुकी थीं।
आकाश का दिमाग पिछले दिनों की यादों में घूम रहा था। आज पूरा ब्रह्मांड सिकुड़ कर छोटा हो चुका था। सब कुछ कंप्यूटर की स्क्रीन में समा चुका था। डब्ल्यूडब्ल्यूडब्ल्यू- इन तीन अक्षरों में सभी कुछ समा चुका है। आपको हिलने-डुलने की भी जरूरत नहीं। बस माउस क्लिक करते रहिए, सब कुछ हाजिर है। गेम, मैसेज, टिकट बुकिंग, शॉपिंग, बिलिंग, समाचार, फिल्म, गाने, और भी न जाने क्या-क्या। कंप्यूटर से हटो तो यही सब कुछ मोबाइल फोन में भी उपलब्ध है।
डॉक्टर पांडेय आज भी खिसिया कर चिल्ला रहे थे, ‘ये मशीनें, मनुष्य को अपंग बना कर ही छोड़ेंगी। मैं कहता हूं कुमार! होश में आ जाओ। अपने लड़के को इस कदर कंप्यूटर का आदी मत बनने दो। केवल काम की चीजें सिखाओ। बाहर भेजो, खेलने-कूदने, खुली हवा में सांस लेने दो।’
अंदर वीडियो गेम में व्यस्त आकाश उनका चिल्लाना सुन कर बड़बड़ाया, ‘मन तो करता है, आपको गेम के अंदर डाल कर आपका जम कर बाजा बजाऊं। जब देखो, तब, पापा को मेरे खिलाफ भड़काते रहते हैं।’

पापा ने उसे आवाज दी, ‘बेटा आकाश! तुम्हारा वह स्कूल वाला प्रोजेक्ट पूरा हुआ कि नहीं?’
‘हां पापा, प्रोजेक्ट तो कब का पूरा करके स्कूल में सबमिट कर दिया है। मैंने तो इस साल का पूरा कोर्स भी कंप्लीट कर लिया है।’ आकाश ने अंदर से ही जवाब दिया।
‘देखा पांडेय जी! मेरा बेटा कितना होशियार है। अभी अर्धवार्षिक परीक्षा हुई नहीं है और आकाश ने कोर्स पूरा कर डाला। पहले ही। आप तो फालतू उसके पीछे पड़े रहते हैं। अब देखो, ये केवल परीक्षा देने जाएगा, बाकी चार महीने मस्ती।’ मिस्टर कुमार ने आकाश की तारीफ करते हुए कहा।
‘हां! और तब तक यह कंप्यूटर में घुसा रहेगा।’ कहते हुए डॉक्टर पांडेय चले गए। पापा के ठहाके उन्हें सड़क तक छोड़ने गए।
और वही हुआ। पापा अपने शोध में व्यस्त, मम्मी अपने अंतरिक्ष कार्यक्रमों में व्यस्त। आकाश ने चार महीने जम कर मस्ती की। उसने कंप्यूटर पर अब तक बने सभी वीडियो गेम्स को उनके अंजाम तक पहुंचा दिया। खाना-पीना सब कंप्यूटर की मेज पर। कंप्यूटर टेबल से उठता तो मोबाइल फोन हाथ में चिपका रहता, क्योंकि दोस्तों से चैटिंग कर उन्हें अपनी उपलब्धियों की जानकारी भी तो देनी होती थी। नहाना-धोना, सोना-जागना सब कुछ गेम्स के आगे अस्त-व्यस्त।

चार महीने तक सभी गतिविधियां अस्त-व्यस्त और सबसे बेपरवाह कंप्यूटर पर बैठे-बैठे गेम खेलने का जो परिणाम हुआ, वह दिल को दहला देने वाला था। आकाश की रीढ़ की हड्डी आगे की ओर झुक कर कर जकड़-सी गई थी। रीढ़ के जोड़ों में भयंकर दर्द रहने लगा था। उसे अपनी कमर सीधी करने में दिक्कत होती थी। कलाई के जोड़ भी जाम होने के स्थिति में थे। अंगुलियां जैसे मुड़ कर रह गई हों। लगातार चमकदार स्क्रीन देखेने के कारण आंखों पर जबरदस्त दुष्प्रभाव पड़ा था। पलकें झपकना भूल गई थीं। बैठे-बैठे पैरों की मांसपेशियां भी कमजोर हो गर्इं। आकाश के लिए अपने पैरों पर सीधा खड़ा होना मुश्किल हो रहा था।
वार्षिक परीक्षाएं सिर पर आ गई थीं। अब तक पढ़ा-लिखा-याद किया सब दिमाग से साफ हो चुका था। दिमाग में सिर्फ गेम के आॅडियो का शोर ही गूंज रहा था, ‘मूव मूव मूव… फायर फायर फायर… मिशन कंप्लीट…’
वह रोने लगा। उसने पापा को फोन लगाया। पापा ने आकर देखा तो दंग रह गए। वे अपनी लापरवाही पर खुद को कोसने लगे, ‘क्यों मैंने आकाश को इतनी आजादी दी? काश, मैंने डॉक्टर पांडेय की बात मान कर आकाश के कंप्यूटर और मोबाइल उपयोग पर लगाम लगाई होती।’
पर अब अफसोस करने और आकाश को डांटने का समय कहां था! उन्होंने तुरंत भारती को फोन किया। वे सब काम छोड़ कर जल्द ही आ गर्इं। आकाश की हालत देख, उन्हें अपने पति और बेटे पर गुस्सा तो बहुत आया, पर वे भी क्या कर सकती थीं।

वे भी तो अपने बेटे से दूर अपने प्रोजेक्ट में व्यस्त थीं। माता-पिता जब अपने-अपने काम में लगे रहेंगे तो बच्चे तो आजाद हो ही जाएंगे।
डॉक्टर कुमार और मैडम भारती को अपनी गलती का अहसास हो रहा था। भारती ने समय निकाल कर खुद आकाश की देखरेख का फैसला किया। वे आकाश को लेकर क्रिस-36 पर आ गर्इं।
यहीं पर डॉक्टर की देखरेख में आकाश का इलाज चल रहा है। उसकी परीक्षाएं छूट चुकी थीं। उसका एक साल बर्बाद हो चुका था। पर यह बहुत अच्छी बात थी कि मां की देखरेख में आकाश अब धीरे-धीरे ठीक हो रहा था। उसके लिए अब कंप्यूटर का मतलब था, जरूरी काम करने की मशीन और मोबाइल का मतलब किसी से बात करने का उपकरण।
‘बेटा आकाश! आज क्या सोते ही रहोगे? मार्निंग वॉक पर चलना है। फिर फिजिकल एक्सरसाइज के लिए डॉक्टर के यहां भी चलना है।’ मां की दुलार भरी आवाज सुन कर आकाश का ध्यान भंग हुआ।
वह उठा और बोला, ‘हां, मां चलिए।’ ०

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