December 04, 2016

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राजपाट: खाओ कमाओ, भगवा भूत

तृणमूल कांग्रेस और कांग्रेस के रिश्तों पर जमी बर्फ अब पिघलने लगी है। एक दौर में दोनों का गठबंधन था।

Author November 7, 2016 05:32 am
भारतीय जनता पार्टी के झंडे

खाओ कमाओ

सत्ता मिलने पर तबादले भी कमाऊ उद्योग बन जाते हैं। राजस्थान में तो यह उद्योग कुछ ज्यादा ही फल-फूल रहा है। भाजपा के उंगलियों पर गिने जाने लायक लोग जहां मोटी कमाई कर रहे हैं वहीं विधायक और सांसद भी इस बहाने अपना दाल-दलिया करने से चूक नहीं रहे। बेशक इससे भाजपा के जमीनी कार्यकर्ता खफा होंगे ही। पर मंत्री तो मजबूर हैं। कार्यकर्ता की चिंता किए बिना तो काम अटकता नहीं। पर विधायकों और सांसदों की सिफारिशों की अनदेखी तो कर नहीं सकते। तबादले के इच्छुक कर्मचारी और अधिकारी अब विधायकों को ही पकड़ रहे हैं। यों इस बार सरकारी कर्मचारियों के तबादले थोक में हुए। पर मंत्रियों ने अपनी मनमर्जी चलाई।

तभी तो विधायक संतुष्ट नहीं दिख रहे। एक साल के इंतजार के बाद तो मुख्यमंत्री ने तबादलों पर लगी पाबंदी को हटाया था। वह भी मजबूरी में। आखिर मुख्यमंत्री के खिलाफ भी असंतोष बढ़ रहा था और बात दिल्ली दरबार तक पहुंच रही थी। सो करीबियों ने इस नाराजगी से बचने के लिए मुख्यमंत्री को तबादलों पर लगी रोक हटाने का सुझाव दिया था। एक महीने के लिए हटाई गई थी यह पाबंदी। थानेदारों और तहसीलदारों के तबादलों की सिफारिशें सबसे ज्यादा थीं। पर कई जगह विधायक तो क्या मंत्री भी अपनी नहीं चलाते। विधायकों की दिलचस्पी प्रांतीय सिविल सेवा के अफसरों में ज्यादा नजर आई। चुनाव में तो असली भूमिका ये अफसर ही निभाते हैं।
भगवा भूत

तृणमूल कांग्रेस और कांग्रेस के रिश्तों पर जमी बर्फ अब पिघलने लगी है। एक दौर में दोनों का गठबंधन था। पर पिछला लोकसभा और विधानसभा चुनाव दोनों अपने बूते लड़े थे। फिर अचानक अदावत घटने क्यों लगी। जानकार इसे भाजपा का खौफ बता रहे हैं। कांग्रेसियों को अभिषेक बनर्जी की बीमारी ने रिश्ते सुधारने का मौका भी थमा दिया। ममता बनर्जी के भतीजे हैं अभिषेक। लोकसभा के सदस्य तो हैं ही बुआ के भरोसेमंद भी। उनका हालचाल पूछने के बहाने कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस के नेताओं की संवादहीनता खत्म हो गई। पश्चिम बंगाल में भाजपा को सफलता भले ज्यादा नहीं मिल पाई है पर जनाधार लगातार बढ़ा है पार्टी का। तभी तो ममता बनर्जी राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा से मुकाबले के लिए कांग्रेस के साथ रिश्तों को बेहतर बनाने के पक्ष में लग रही हैं।

अपनी पार्टी के नेताओं की बैठक में ममता ने अपनी मंशा का खुलासा भी कर दिया। यों टेलीफोन पर तो अभिषेक की कुशलक्षेम राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी से लेकर नरेंद्र मोदी और सोनिया गांधी सभी ने पूछी। सोनिया का तो ममता से यह संवाद छह महीने के अंतराल से हुआ। बाद में राहुल गांधी ने भी पूछ लिया बुआ से भतीजे का हाल। ममता से राहुल की मुलाकात तो पिछले साल बिहार विधानसभा चुनाव के बाद नीतीश कुमार के शपथ ग्रहण के मौके पर ही हुई थी। ममता ने तीसरे मोर्चे के दलों को भी आगाह कर दिया कि नीतीश की जद (एकी) और मुलायम की सपा में से कोई भी अपने बूते भाजपा का मुकाबला कर ही नहीं सकता। ऐसे किसी भी धर्मनिरपेक्ष मोर्चे से कांग्रेस को अलग रखना बुद्धिमत्ता नहीं हो सकती। सो, कांग्रेस का साथ जरूरी है। ममता ने माना कि कांग्रेस कमजोर हुई है पर धर्मनिरपेक्ष गठजोड़ की मजबूती के नजरिए से इस पार्टी की अनदेखी फिर भी संभव नहीं। राष्ट्रीय राजनीति के संदर्भ में तो काफी अहम है ममता के नजरिए में आया यह बदलाव। संसद के शीतकालीन सत्र में तृणमूल कांग्रेस और कांग्रेस के रिश्तों में सुधार की तस्वीर और साफ हो सकती है।

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First Published on November 7, 2016 5:32 am

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