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राजपाट: हमाम में सब नंगे, बोलबाला बेकारी का

उत्तराखंड में वंशवादी राजनीति को आगे बढ़ाने में अब न कांग्रेसी कसर छोड़ रहे हैं और न भाजपाई ही पीछे हैं।
Author December 26, 2016 04:34 am
उत्तराखंड के मुख्यमंत्री हरीश रावत। (फाइल फोटो)

हमाम में सब नंगे

उत्तराखंड में वंशवादी राजनीति को आगे बढ़ाने में अब न कांग्रेसी कसर छोड़ रहे हैं और न भाजपाई ही पीछे हैं। मुख्यमंत्री हरीश रावत अपनी बेटी और बेटे दोनों को चुनाव लड़वाने की जुगत भिड़ा रहे हैं तो भगत सिंह कोश्यारी संघी प्रचारक ठहरे। अविवाहित हैं तो क्या भतीजे की फिक्र तो कर ही सकते हैं। 74 पार कर चुके हैं। लिहाजा मुख्यमंत्री पद पर दावेदारी करने से झिझक रहे हैं। सांसद हैं सो पता नहीं विधानसभा का टिकट मिलेगा भी या नहीं। विजय बहुगुणा ने कांग्रेस में रहते अपने बेटे को लोकसभा उपचुनाव लड़ाया था। हार गए थे साकेत बहुगुणा। बेटे की चिंता करें कि अपने लिए ही लाले पड़े हैं। हरीश रावत ने पत्नी अनुपमा को 2014 में हरिद्वार से लोकसभा चुनाव लड़ाया था। पर मोदी की आंधी में वे परास्त हो गई थी। कहने को भाजपा कैडर आधारित पार्टी है पर अभी तक सूबेदार का फैसला नहीं कर पाई। अजय भट्ट के पास दोहरा जिम्मा है। विधायक दल के नेता तो थे ही तीरथ सिंह रावत के हटने के बाद कब से पार्टी के सूबेदार भी बने हैं। सतपाल महाराज अलग परेशान हैं। कांग्रेस छोड़ कर पछता रहे होंगे। अपना तो कुछ कल्याण कर नहीं पाए पत्नी अमृता रावत का मंत्री पद और विधायकी भी कुर्बान कर दी भाजपा पर। फिर भी भरोसा नहीं कि उन्हें मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित करेगी भी या नहीं भगवा पार्टी। अमित शाह ने बेशक तवज्जो न दी हो पर खरे तो निशंक निकले। पार्टी आलाकमान से अपनी हसरत बेझिझक जाहिर कर दी कि वे बनना चाहेंगे पार्टी की तरफ से मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार। सांसद हैं तो क्या फर्क पड़ता है
बोलबाला बेकारी का

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने तो बड़ी आसानी से कह दिया कि नोटबंदी के चलते केवल पचास दिन कष्ट होगा देश के लोगों को। लेकिन उन्हीं की सत्ता वाले सूबे मध्यप्रदेश में इसके प्रतिकूल प्रभाव के आंकड़े चिंताजनक हैं। छोटी कंपनियों के 65 फीसद कर्मचारी बेरोजगार हुए हैं। मध्यम दर्जे की कंपनियों में बेरोजगार हो गए लोगों का यह आंकड़ा 25 फीसद है। असर कम ही सही पर बड़ी कंपनियों पर भी हुआ है। जिनकी नौकरी गई है वे ज्यादातर मजदूर ठहरे। जो दिहाड़ी मजदूर हैं उन्हें भी हफ्ते में सातों दिन काम नहीं मिल रहा। बामुश्किल तीन दिन ही कर पा रहे हैं वे मजदूरी। खरगोन की सेंचुरी डेनिम फैक्टरी बंद हो गई है। कब चालू होगी, कोई नहीं जानता। बड़वानी जिले के कपास कारखानों में भी बेकारी बढ़ गई है। मंडला की खदानों में सत्तर फीसद मजदूरों को घर भेजा जा चुका है। भोपाल में कपड़ा और खाद्य प्रसंस्करण कारखानों ने अपना उत्पादन बीस फीसद घटा दिया है। बुरहानपुर के पावरलूम कारखाने बंद होने से तीस हजार मजदूर बेरोजगार हो गए हैं। रतलाम के सर्राफों को दिन भर ग्राहक के दर्शन नहीं होते। वे तो फिर भी भूखे नहीं मरेंगे पर इस धंधे से परिवार पालने वाले पांच हजार बंगाली कारीगर खाली बैठे हैं। कुछ तो अपने वतन को भी लौट गए।

 

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