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राजपाट- उपचुनाव का भय

जमेर ठहरी पार्टी के सूबेदार सचिन पायलट की सीट जबकि अलवर से पूर्व केंद्रीय मंत्री भंवर जितेंद्र सिंह का नाता रहा है। दोनों 2019 के आम चुनाव के लिहाज से तो अपनी इन्हीं सीटों से लड़ने के लिए तैयार हैं।
Author September 25, 2017 04:28 am
राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे। (फाइल फोटो)

उपचुनाव का भय
लोकसभा और विधानसभा सीट के उपचुनाव राजस्थान की वसुंधरा सरकार के लिए नई मुसीबत लाएंगे। लोकसभा की दो सीटों और विधानसभा की एक सीट के लिए नौबत आ गई है सूबे में उपचुनाव की। विधानसभा चुनाव में अभी साल भर से ज्यादा का फासला है सो उपचुनाव कराना चुनाव आयोग की कानूनी मजबूरी ठहरी। अजमेर सीट सांवर लाल जाट और अलवर सीट महंत चांद नाथ के निधन के कारण खाली हुई है। जबकि मांडलगढ़ सीट कीर्ति कुमारी के निधन से। कांग्रेस की दुविधा लोकसभा सीटों को लेकर ज्यादा है। अजमेर ठहरी पार्टी के सूबेदार सचिन पायलट की सीट जबकि अलवर से पूर्व केंद्रीय मंत्री भंवर जितेंद्र सिंह का नाता रहा है। दोनों 2019 के आम चुनाव के लिहाज से तो अपनी इन्हीं सीटों से लड़ने के लिए तैयार हैं। पर उपचुनाव लड़ने की चर्चा से भी पसीने छूट रहे हैं।

आमतौर पर उपचुनाव में सत्ताधारी दल को फायदा मिलता है। सचिन और जितेंद्र दोनों ही राहुल गांधी के कोर ग्रुप से जुड़े माने जाते हैं। चिंता भाजपा को भी कम नहीं है। उसे दोनों लोकसभा सीटंों पर कद्दावर उम्मीदवार तलाशने पड़ेंगे। भाजपा को अजमेर में ऐसा उम्मीदवार तलाशना पड़ेगा जो जाट, गुर्जर और राजपूत तीनों जातियों में पैठ रखता हो। अलवर ठहरा यादव बहुल इलाका। भाजपा के पास भूपेंद्र यादव हैं इसी इलाके के कद्दावर नेता। पर वे राज्यसभा के सदस्य ठहरे। अमित शाह के करीबी तो हैं ही, उनकी टीम में पदाधिकारी भी हैं। ऐसे में वे उपचुनाव नहीं लड़ना चाहेंगे। उधर दोनों ही दलों के असंतुष्ट नेता उपचुनाव के अवसर को अपने लिए फायदेमंद समझ रहे हैं। उन्हें नाराजगी जताने का मौका जो मिलेगा।
मोदी का तोता
नीतीश कुमार अब पूरी तरह मोदी के रंग में रंग चुके हैं। मोदी ने विधानसभाओं और लोकसभा के चुनाव एक साथ कराने की पैरवी की है। नीतीश भी उनकी हां में हां मिला रहे हैं। हालांकि इससे उन्हें भी फायदा होता दिख रहा होगा। भाजपा के नेताओं का तो अलग नजरिया है। वे मान रहे हैं कि अगला लोकसभा चुनाव भी वे मोदी की लोकप्रियता के दम पर जीत जाएंगे। ऐसे में विधानसभाओं के चुनाव भी साथ हो जाएं तो सोने में सुहागे जैसी स्थिति बन सकती है। नीतीश भी अब यही सोच रहे होंगे कि साथ-साथ चुनाव हुए तो उनके दोनों हाथों में होंगे लड्डू। लोकसभा में वे भाजपा से बंटवारे के दौरान ज्यादा सीटें ले लेंगे। विधानसभा की सीटें तो ज्यादा मिलेंगी ही।

ऐसे में सूबे में सरकार बनी तो उनका मुख्यमंत्री पद सुरक्षित रहेगा। ऊपर से ज्यादा लोकसभा सीटें जीत कर वे राजग के भीतर भी अहम हो जाएंगे। अभी तो अच्छे दिन गुजर ही रहे हैं, आने वाले दिनों में और भी अच्छे गुजर सकेंगे दिन। हालांकि सियासत की अनिश्चितता से भी वे अनजान नहीं हैं। पर आशावादी पक्के ठहरे। सो साथ-साथ चुनाव की सूरत में अपना फायदा होने की आस है उन्हें। यह बात भी कम रोचक नहीं है कि 2004 के बाद उन्होंने न तो एक बार भी लोकसभा चुनाव लड़ा और न विधानसभा चुनाव लड़ने की जहमत उठाई। वे तो विधान परिषद में ही बने हुए हैं। लोकसभा चुनाव के साथ विधानसभा चुनाव हो जाए तो क्या हर्ज है? अलग से चुनाव होगा तो झंझट ही है। अब तो एक ही सिक्के के दो पहलू बन चुके हैं नीतीश और भाजपाई।

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