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राजस्थान सरकार में मुखिया बनने को लेकर जुलाहों में लट्ठम-लट्ठा

कांग्रेसी मान रहे हैं कि राजस्थान में पंजाब दोहराया जाएगा। भाजपा ने अभी से अपना लक्ष्य भी तय कर दिया है।
Author May 8, 2017 06:50 am
प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष सचिन पायलट

जुलाहों में लट्ठम-लट्ठा
राजस्थान में सियासी गरमाहट अचानक बढ़ गई है। विधानसभा चुनाव में यों अभी डेढ़ साल का वक्त बचा है। पर टिकटों की दावेदारी अभी से शुरू हो गई है। कांग्रेस और भाजपा दोनों में। दोनों को ही खुशफहमी है कि अगली सरकार उनकी बनेगी। भाजपा के भरोसे का आधार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता और लहर है तो कांग्रेस को सूबे के मिजाज पर भरोसा है। एक बार भाजपा तो अगली बार कांग्रेस आती रही है सूबे की सत्ता में। कांग्रेस के आत्मविश्वास का एक कारण सूबे की वसुंधरा सरकार की छवि भी है। कांग्रेसी मान रहे हैं कि राजस्थान में पंजाब दोहराया जाएगा। भाजपा ने अभी से अपना लक्ष्य भी तय कर दिया है। 2019 के लोकसभा चुनाव के लिए सभी 25 सीटें और अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव में 200 में से 180 सीटें जीतने का लक्ष्य। विधानसभा में फिलहाल भाजपा के 161 विधायक ठहरे। आला कमान को भी अंदाज है कि मौजूदा विधायकों में से आधे हारेंगे। सो, उधेड़बुन मौजूदा विधायकों के टिकट काटने की है। दर्जनभर विधायक तो उम्रदराज भी हो चुके हैं। लिहाजा उम्र सीमा का पैमाना भी टिकट काटने का एक तरीका हो सकता है। पर जो उम्रदराज नहीं हैं पर अपने इलाके में बदनाम हो चुके हैं, मुश्किल ऐसे अलोकप्रिय विधायकों से छुटकारा पाने में आएगी। सो, एक और हथकंडा अपनाया जा रहा है कि न जिला अध्यक्षों को टिकट देंगे और न प्रदेश पदाधिकारियों को। बेशक सूबेदार अशोक परनामी इस बंदिश से मुक्त रहेंगे। हालांकि सबसे बुरा हाल उन्हीं के विधानसभा क्षेत्र आदर्श नगर का है फिलहाल। कांग्रेस ने तो उनके क्षेत्र की बदहाली और खराब कानून व्यवस्था को लेकर पिछले दिनों मार्च भी निकाला था। बहरहाल लोगों की नजर में सरकार की छवि चाहे जितनी भी गई-बीती क्यों न हो, मोदी लहर के भरोसे फिर सत्ता सुख पाने का ख्वाब देख रहे हैं सूबे के भाजपाई। कांग्रेस ने हाशिए पर चल रहे अशोक गहलोत को अहमियत दी है। उन्हें पार्टी का राष्ट्रीय महासचिव सोच समझ कर ही बनाया होगा सोनिया ने। हालांकि सचिन पायलट की सूबेदारी बरकरार है। दोनों की गुटबाजी खत्म हो पाएगी, इसमें भी संदेह है। लिहाजा दोनों को ही संतुष्ट कर आला कमान टिकटों का फैसला कर सकता है। यही वजह है कि दोनों के दरवाजों पर टिकटार्थियों का जमघट साफ दिखने लगा है।
दूर की कौड़ी
पश्चिम बंगाल को लेकर अमित शाह के सपने अभी तो मुंगेरीलाल ही बनाते हैं भाजपा अध्यक्ष को। 2021 के विधानसभा चुनाव में सूबे की सत्ता पर कब्जा और 2019 के लोकसभा चुनाव में सूबे की सबसे बड़ी पार्टी के तौर पर उभरने का लक्ष्य तय किया है शाह ने। सूबे के अपने तीन दिन के दौरे में कमजोर संगठन में जान फूंकने की भरसक कोशिश करते दिखे वे। उसके बाद ही मुखर हुए उनके सूबेदार दिलीप घोष। अगले साल होने वाले पंचायत चुनाव को क्वार्टर फाइनल, लोकसभा को सेमी फाइनल और विधानसभा को फाइनल बता रहे हैं। उनका वश चले तो सूबे में मध्यावधि चुनाव करा दें। खराब कानून-व्यवस्था का आरोप शायद केंद्र के राष्ट्रपति शासन के हथियार के इस्तेमाल की संभावना के मकसद से लगाया होगा। घोष ने फरमाया कि सूबे में विधानसभा चुनाव भी 2019 के लोकसभा चुनाव के साथ ही हो सकते हैं। भाजपा कार्यकर्ताओं पर तृणमूल कांग्रेस के चौतरफा हमलों से आहत दिख रहे हैं घोष। अमित शाह ने संगठन को जमीनी स्तर पर मजबूत करने का रोडमैप उन्हें समझा दिया है। दस हजार समर्पित कार्यकर्ताओं की एक टीम चाहते हैं सूबे में अमित शाह। मकसद हर मतदान केंद्र तक लोगों को मोदी सरकार की उपलब्धियों और ममता सरकार के कुशासन के बारे में अवगत कराना है। भाजपा ने इसके लिए बूथ स्तर के कार्यकर्ताओं को प्रशिक्षित करने की योजना भी बना ली है। भाजपा की उम्मीदें नारद स्टिंग मुद्दे पर भी टिकी है जिसमें तृणमूल कांग्रेस के कई कद्दावर नेता फंसे हैं। घोष इसी आधार पर भविष्यवाणी कर रहे हैं कि कोई नहीं जानता कि ममता बनर्जी की पार्टी का आने वाले दौर में क्या होगा?

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