December 06, 2016

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राजपाट: उलझन में नीकु, सियासी खिलाड़ी

शराबबंदी के मुद्दे पर उलझन बढ़ गई है नीकु की। बिहार के मुख्यमंत्री ने सोचा था कुछ, पर होने लगा है कुछ और।

Author November 7, 2016 05:29 am
बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार (फाइल फोटो)

उलझन में नीकु

शराबबंदी के मुद्दे पर उलझन बढ़ गई है नीकु की। बिहार के मुख्यमंत्री ने सोचा था कुछ, पर होने लगा है कुछ और। आमतौर पर नीकु की रणनीति विरोधियों को मात देने की रही है। विरोधी डाल-डाल तो नीतीश कुमार पात-पात। पर शराबबंदी के मामले में तो सब उलट-पलट गया है। नीकु डाल-डाल और विरोधी पात-पात लग रहे हैं। इस वित्तीय वर्ष की शुरुआत के साथ ही कड़ाई के साथ अमल शुरू किया था। सोच समझ कर नियम कानून बनाए थे। सूबे की पुलिस को इसी कानून पर अमल के काम में झोंक दिया था। बड़ी तादाद में लोगों की गिरफ्तारी भी हुई थी और शराब की जब्ती भी। लेकिन तमाम कवायद के बाद भी उम्मीद के मुताबिक सफलता नहीं मिली। ऊपर से विरोधी अलग सीना तान कर सामने खड़े हो गए। नीकु तो इतने उत्साह में थे कि दूसरे सूबों में भी शराबबंदी की मुहिम छेड़ रहे थे। झारखंड और उत्तर प्रदेश में तो शुरुआत भी कर डाली। नतीजा उलटा निकला। फायदे से ज्यादा फजीहत हिस्से आई। जबकि वे तो दिल्ली में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से भी फरियाद कर आए कि भाजपा शासित राज्यों में भी शराबबंदी को लागू कराया जाए। मोदी के सूबे गुजरात में तो शराबबंदी लागू है भी। जद (एकी) के नेताओं ने तो भले उनकी वाहवाही की हो पर कांग्रेस और राजद के नेता तो कन्नी ही काटते दिखे। अलबत्ता अब तो इस मुद्दे पर नीकु की आलोचना हो रही है। उलझन इसी से बढ़ी है कि कदम भी वापस नहीं खींच सकते। हां, बीच का रास्ता निकालने की रणनीति अपनाई है। अरविंद केजरीवाल की तर्ज पर लोगों से ही पूछ रहे हैं कि शराबबंदी को कैसे लागू करें। लोगों के सुझावों पर विचार करने का भरोसा भी दिया है। सरकार ने इस बाबत लोगों से अपील करने वाला विज्ञापन भी छपवा दिया है अखबारों में। उलझन शायद इसी कवायद से सुलझ जाए।
सियासी खिलाड़ी

उत्तराखंड में कांग्रेस का अंदरूनी घमासान जारी है। सूबे की पार्टी प्रभारी अंबिका सोनी को दो दिन खपाने पर भी अपेक्षित परिणाम नजर नहीं आए। मुख्यमंत्री हरीश रावत और पार्टी के सूबेदार किशोर उपाध्याय दो विरोधी ध्रुवों जैसा आचरण कर रहे हैं। अंबिका सोनी ने दोनों को ही आईना दिखाया। कांग्रेस से बगावत कर भाजपाई खेमे में जा मिले विधायकों को पार्टी में वापसी का न्योता दे दिया अंबिका सोनी ने। पर सियासी और कानूनी जंग लड़ते-लड़ते जुझारू बन चुके हरीश रावत ने उनकी मौजूदगी में ही विजय बहुगुणा और हरक सिंह रावत को दगाबाज बता दिया। लगे हाथ यह भी जताना नहीं भूले कि कांग्रेस में उनकी मर्जी के बिना उत्तराखंड में किसी नेता की वापसी संभव नहीं। पीछा छुड़ाने के लिए अंबिका सोनी ने पीडीएफ विधायकों की बाबत फैसले का अधिकार हरीश रावत को सौंप दिया। ऊपर से इन विधायकों को कांग्रेस का सहयोगी और संकट का साथी भी बता दिया। इससे हरीश रावत का मूड ठीक हुआ होगा। भले सूबेदार किशोर उपाध्याय का मुंह फूल गया हो। बेचारी न रावत को संतुष्ट कर पाई और न उपाध्याय को। किशोर उपाध्याय को तो गिला ही पीडीएफ विधायकों से ज्यादा है। दिनेश धनै ने चुनाव में उपाध्याय को पटखनी दी थी। अब उपाध्याय की पार्टी के सिरमौर बन मंत्री पद का सुख भोग रहे हैं। परोक्ष रूप से तो हरीश रावत ने अंबिका सोनी को बता दिया कि उत्तराखंड में असली कांग्रेसी वे ही हैं और पार्टी भी उन्हीं के साथ है। रही सूबेदार किशोर उपाध्याय की बात तो वे नाम के अध्यक्ष हैं, हैसियत कुछ भी नहीं है उनकी।

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First Published on November 7, 2016 5:28 am

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