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सियासी नुस्खा

जब भ्रष्टाचार के आरोप से मुक्त हो गए तभी वापस मंत्री बनाया था। यानी भ्रष्टाचार के मुद्दे पर कड़ाई नीतीश का सिद्धांत रहा है। फिर तेजस्वी के खिलाफ कदम क्यों नहीं उठा रहे।
Author July 17, 2017 04:22 am
बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार।(फाइल फोटो)

सियासी नुस्खा

नीतीश कुमार दुविधा में फंस गए हैं। हालांकि हैं वे सियासी तौर पर बड़े सयाने। अपने उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव के प्रति क्या रुख अपनाएं, तय नहीं कर पा रहे। सीबीआइ ने मामला दर्ज किया है लालू के छोटे बेटे तेजस्वी के खिलाफ आय से ज्यादा संपत्ति बनाने का। विरोधियों को इस बहाने मौका मिल गया। वे साफ-सुथरी छवि वाले बिहार के मुख्यमंत्री के खिलाफ हवा बनाने की पुरजोर कोशिश में जुट गए हैं। उन्हें उन्हीं का अतीत याद दिला रहे हैं कि जीतन राम मांझी को शपथ लेने के फौरन बाद मंत्रिमंडल से निकाला था। जब भ्रष्टाचार के आरोप से मुक्त हो गए तभी वापस मंत्री बनाया था। यानी भ्रष्टाचार के मुद्दे पर कड़ाई नीतीश का सिद्धांत रहा है। फिर तेजस्वी के खिलाफ कदम क्यों नहीं उठा रहे। अदालत से बरी होकर दोबारा उपमुख्यमंत्री बन सकते हैं तेजस्वी भी। नीतीश ने जैसे ही बयान दिया कि बिहार के लोगों ने महागठबंधन को पांच साल तक सत्ता में रहने का जनादेश दिया है, विरोधी और उग्र हो गए। सवाल दागने लगे कि क्या नीतीश सत्ता के लिए भ्रष्टाचारियों का सहारा लेंगे। उनके तेवर देख नीतीश को सोचना पड़ा रहा है। खुद तो संयत हैं पर अपनी पार्टी के पदाधिकारियों से मन की बात कहला रहे हैं कि जद (एकी) तेजस्वी के मामले का संज्ञान ले रही है। सही वक्त पर फैसला करेगी। विरोधियों का मुंह बंद करने के लिए कुछ तो कहना ही पड़ेगा। रही तेजस्वी की बात, तो उनकी पार्टी राजद एकजुट होकर उनके पीछे खड़ी है। जद (एकी) ने तेजस्वी पर सीधे वार किया तो राजद भी चुप नहीं रहेगा। बेचारे नीतीश को अब बीच का रास्ता ढूंढ़ना पड़ा है। पार्टी की बैठक के बाद कह दिया कि जिन पर आरोप हैं, वे खुद लोगों को सच्चाई बताएं। कमाल है कि सांप भी मारना चाहते हैं पर लाठी टूटने का जोखिम भी नहीं लेना चाहते। सरकार चलती रहे और महागठबंधन बुलंद रहे, फिलहाल तो यही दिख रहा है नीतीश का मंतव्य।
महारानी का इंसाफ
राजस्थान में नौकरशाही का व्यापक बदलाव फिलहाल टल गया लगता है। अलबत्ता नए मुख्य सचिव अशोक जैन ने कमान जरूर संभाल ली है। मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे उनकी वरिष्ठता का सम्मान करेंगी, जैन को कतई उम्मीद नहीं थी। वे तो मुख्यसचिव की कुर्सी के लिए कोई लाबिंग भी नहीं कर रहे। पर ऐनवक्त पर मुख्यमंत्री ने उन्हें बुला कर उनकी नियुक्ति की सूचना दी, तो वे हैरान रह गए। असली दावेदार तो डीबी गुप्ता और एनसी गोयल माने जा रहे हैं। पर जैन बने तो नौकरशाह भी उधेड़बुन में लग गए। तैयारी तो आइएएस और आइपीएस में बड़े बदलाव की थी। लेकिन अशोक जैन ने फिलहाल कोई हड़बड़ी नहीं दिखाई है। एक साल से हाशिए पर थे प्रशासन में जैन। मुख्य सचिव बनते ही सारे नौकरशाह उनकी परिक्रमा करने लगे। अगले साल सूबे में विधानसभा चुनाव होंगे। जाहिर है कि कलेक्टर और कप्तान के पदों पर वसुंधरा अब ऐसे अफसरों को तैनात करना चाहेंगी जो जयपुर से पहुंचने वाले फरमानों पर शिद्दत से अमल करें। पीसीएस से तरक्की पाकर आइएएस बनने वाले अफसर सरकार की इस कसौटी पर ज्यादा खरे उतरते हैं। लिहाजा 1981 बैच के आइएएस अशोक जैन को अब तबादलों की सूची मुख्यमंत्री की मंशा के हिसाब से बनानी पड़ेगी। अपने सांसदों और विधायकों को भी इस मामले में खुश करने का संकेत दिया है वसुंधरा ने। इन बदले तेवरों ने ही तो ज्यादा बेचैन कर दिया है अफसरों को।

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