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राजपाट: दुविधा में नीकु, चंपूगीरी बेमिसाल

नीकु यानी बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की दुविधा इस बार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नोटबंदी के फैसले ने बढ़ाई है।
Author December 26, 2016 04:21 am
बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार। (फाइल फोटो)

 दुविधा में नीकु

नीकु फिर दुविधा में फंस गए हैं। नीकु यानी बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की दुविधा इस बार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नोटबंदी के फैसले ने बढ़ाई है। नीकु ने कालेधन के खिलाफ मोदी की इस पहल की मुक्त कंठ से सराहना की थी। जबकि उन्हें मुख्यमंत्री बनाने वाले लालू यादव शुरू से ही नोटबंदी के कारण लोगों को हो रही तकलीफ के चलते मोदी के खिलाफ आग उगल रहे हैं। मोदी ने खुद भी नवीन पटनायक और चंद्रबाबू नायडू के साथ-साथ नीतीश बाबू की भी खूब तारीफ की। अब लालू ने एलान कर दिया है कि मोदी के खिलाफ नोटबंदी के मुद्दे पर 28 दिसंबर को होने वाले धरने में नीकु भी शामिल होंगे। लालू को कौन नहीं जानता। भाजपा के खिलाफ वे 1990 से ही लड़ रहे हैं।

भाजपा के विरोध का कोई मौका वे चूकते नहीं। लालकृष्ण आडवाणी के राम रथ को उन्होंने ही मुख्यमंत्री रहते समस्तीपुर में रोक दिया था। धरने का कार्यक्रम लालू ने ही तय किया है। यों नीकु भाजपा के साथ बेशक रहे पर जब मोदी को प्रधानमंत्री बनाने का सवाल आया था तो मुखर विरोध करते हुए उन्होंने भाजपा से गठबंधन तोड़ने में पल भर की देर नहीं लगाई। इस नाते वे हैं मोदी के घोर विरोधी। हालांकि नोटबंदी का अभी तक विरोध नहीं किया उन्होंने। सो दुविधा उनके लालू के साथ धरने में शामिल होने को लेकर बताई जा रही है। लोग सवाल तो करेंगे ही कि पहले तो नोटबंदी का समर्थन कर रहे थे फिर अब क्या लालू के दबाव में झुक गए। यू-टर्न लेने जैसी होगी उनकी हिस्सेदारी। पर हिस्सा नहीं लिया तो लालू की अहमियत घटेगी। जिनकी बदौलत वे राज कर रहे हैं। उनके विधायक तो लालू के विधायकों से कम ही हैं। लगता है कि जद (एकी) के कुछ नेताओं ने पहले से ही भूमिका बना ली है। वे कहने लगे हैं कि पचास दिन बीतने के बाद इस मुद्दे की समीक्षा करेंगे। समर्थन जारी रखने या विरोध करने का फैसला उसी के आधार पर होगा। तटस्थ समीक्षक इसे दुविधा से निपटने के लिए नीकु की बीच का रास्ता तलाशने की कवायद बता रहे हैं।

चंपूगीरी बेमिसाल

रामविलास पासवान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विश्वासपात्र बने रहना चाहते हैं। तभी तो मोदी के कैशलेस लेन-देन को बुलंद करने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ रहे। जब से सियासत में कदम रखा है शायद ही कभी हाजीपुर के बाजार से खुद कुछ खरीदा हो। पर अब केंद्रीय मंत्री के नाते हाजीपुर आए तो क्रेडिट कार्ड से खरीदारी करना नहीं भूले। पासवान भला मोदी के बताए रास्ते पर क्यों न चलें? दिल्ली में क्रेडिट कार्ड से कभी-कभार जूस पी लेते थे या फिर छोटी-मोटी खरीदारी कर लेते थे। एकाध बार पटना में भी ऐसा जरूर किया होगा। पर अब तो हर जगह क्रेडिट कार्ड का इस्तेमाल कर रहे हैं। इससे खबर भी बन रही है। मोदी की नजर में खबर पड़े या न पड़े पर दलित नेता की पहचान क्रेडिट कार्ड वाले पासवान की तो हो ही चुकी है। पासवान भूल गए हैं कि बैंकों में जितने लोगों के खाते नहीं हैं उनमें दलित ही ज्यादा हैं। वे बेचारे क्रेडिट कार्ड तो क्या रखेंगे? फिलहाल तो केंद्रीय नागरिक आपूर्ति मंत्री के नाते मोदी की चिंता करने में ही भलाई है। दलितों के बारे में तो बाद में भी सोच लेंगे।

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