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राजपाट: सब पर भारी, सियासी उठापटक

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की नजर अभी से अगले लोकसभा चुनाव पर टिक गई है।
Author December 12, 2016 04:45 am
पश्चिम बंगाल की मुख्‍यमंत्री और तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) सुप्रीमो ममता बनर्जी

सब पर भारी

लोकसभा चुनाव से पहले नरेंद्र मोदी के साथ जिस तरह की तलवारबाजी बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने की थी कुछ वैसी ही लड़ाई के मूड में इस समय दीदी दिख रही हैं। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की नजर अभी से अगले लोकसभा चुनाव पर टिक गई है। सूबे की सियासत में तो डंका बज ही रहा है उनका। फिर क्यों प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से टकरा रही हैं। दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को नीतीश कुमार ने तो निराश किया था पर ममता ने उन्हें ताकत दे दी। दिल्ली में नोटबंदी के सवाल पर दोनों मुख्यमंत्री मोदी के खिलाफ एक सुर में हुंकार भरते दिखे। जाहिर है कि अब उनकी निगाह दिल्ली के सत्ता गलियारे पर आ टिकी है। नोटबंदी के बहाने नरेंद्र मोदी पर लगातार हमले कर रहीं हैं। दिल्ली ही नहीं लखनऊ और पटना जाकर भी अलख जगाया। अब तैयारी पंजाब की है। जहां विधानसभा चुनाव ज्यादा दूर नहीं हैं। माहौल सत्तारूढ़ अकाली दल के खिलाफ नजर आ रहा है। सहयोगी के नाते भाजपा का भी वही हश्र होगा जो अकाली दल का। वैसे केंद्र को तो लगातार कठघरे में खड़ा कर रही हैं। कभी उनके विमान को तेल की कमी के बावजूद जानबूझकर हवा में उड़ाने के तो कभी टोल प्लाजा पर सेना तैनात करने जैसे आरोप लगाकर। सेना की सफाई के बावजूद अपना आरोप वापस नहीं लिया। रही सूबे की बात तो नोटबंदी के एक महीने बाद भी नकदी की तंगी खत्म नहीं हो पाई है। इस बहाने भी केंद्र पर सूबे के साथ नोटों की व्यवस्था के मामले में भेदभाव का आरोप लगा दिया। आरोप एक दम निराधार लगता भी नहीं। पांच सौ रुपए के नए नोट अभी तक सूबे के बैंकों में अव्वल तो आए नहीं और आए भी होंगे तो आम आदमी तक पहुंचे नहीं। दिक्कत इसी वजह से ज्यादा बढ़ी है। बार-बार किसी न किसी बहाने आंदोलन करने की उनकी प्रवृत्ति को उनके विरोधी ना पंसद करेंगे ही। ममता पर उनकी प्रतिक्रिया का कोई असर नहीं पड़ता। उनके पास सिंगुर और नंदीग्राम जैसी मिसालें हैं। दोनों आंदोलन कम ही लोगों को जंचे थे पर ममता को सत्ता की राह उन्हीं से हासिल हुई। जो भी हो नरेंद्र मोदी के मुकाबले विपक्ष का एक कारगर मोर्चा बनाने की धुन सिर पर सवार है ममता के। अंजाम की परवाह किए बिना वे तो मिशन-2019 की तैयार में जुट ही चुकी हैं।
सियासी उठापटक

बेचारे मंत्री अपनी मुखिया के बदलते तेवरों का रहस्य समझ ही नहीं पा रहे। राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के बदलते तेवर उनके मंत्रियों की चिंता बढ़ा देते हैं। वसुंधरा सरकार के तीन साल तो निकल गए। सो बचे दो साल अगले चुनाव की चिंता में खपाने ही पड़ेंगे। अपनी सरकार का कामकाज दुरुस्त करने में जुट गई हैं। पार्टी कार्यकर्ताओं की मायूसी से अंजान नहीं हैं। ऊपर से आलाकमान का इशारा भी है। लिहाजा कायापलट में जुट गई हैं। वफादार कार्यकर्ताओं को लालबत्ती का सुख देने लगी हैं। मंत्री तो कार्यकर्ताओं को मुंह लगा नहीं रहे थे। पार्टी का केंद्रीय नेतृत्व भी नाखुश था वसुंधरा से। संघी अपनी मुख्यमंत्री के खिलाफ माहौल बना ही रहे हैं। वसुंधरा ने अपने मंत्रीमंडल में फेरबदल भी किया है। उनके कुछ मंत्री आरोपों के घेरे में हैं। किरण माहेश्वरी और राजेंद्र राठौड के विभागों में भ्रष्टाचार की शिकायतें आम हैं। दोनों मंत्रालयों के कई आला अधिकारी भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो की गिरफ्त में आ चुके हैं। आग तो घूसखोरी की मंत्रियों तक भी पहुंचने वाली थी पर उन्होंने अपने कौशल से खुद को बचा लिया। दर्जन भर मंत्रियों को आलाकमान नापंसद करता है। पर हटा भी तो नहीं सकते। संदेश खराब जाता है। बीच का रास्ता सोचा जा रहा है। जिन्हें हटाएंगी उन्हें संगठन कौशल में बेजोड़ बता पार्टी में पद दिला देंगी। इसके लिए पार्टी के सूबेदार अशोक परनामी है हीं सदा उनके ताबेदार। इस फारमूले पर संघियों को भी कोई एतराज नहीं।

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