June 29, 2017

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बुरे फंसे रघुबर

झारखंड के मुख्यमंत्री रघुबर दास की मुश्किलें बढ़ रही हैं। विरोधी ही नहीं अब तो उनके अपने गठबंधन के नेता ही उनके विरोध में मुखर हो रहे हैं।

Author June 19, 2017 07:27 am
झारखंड के मुख्यमंत्री रघुवर दास। (Image Source – PTI)

झारखंड के मुख्यमंत्री रघुबर दास की मुश्किलें बढ़ रही हैं। विरोधी ही नहीं अब तो उनके अपने गठबंधन के नेता ही उनके विरोध में मुखर हो रहे हैं। छोटा नागपुर टेनेंसी एक्ट (सीएनटीए) और संथाल परगना टेनेंसी एक्ट (एसपीटीए) ने रघुबर दास का सिरदर्द बढ़ा दिया है। रघुबर दास का सपना है कि उनके मुख्यमंत्री रहते उनके सूबे में देसी ही नहीं विदेशी पूंजीपति भी कारखानों की झड़ी लगा दें। लेकिन असली सवाल तो दूसरा है। पूंजीपतियों को जमीन चाहिए। आदिवासियों की जमीन कोई ले नहीं सकता। कानून ही ऐसा है। बेशक बेटी की शादी के लिए आदिवासियों को पहले से इजाजत लेकर जमीन बेचने की सुविधा है। लिहाजा रघुबर दास ने दोनों कानूनों में बदलाव कर उन्हें राष्ट्रपति के पास भेज दिया। सुधार यह किया है कि कोई भी पूंजीपति आदिवासियों से उनकी जमीन लीज पर ले सकता है।

जिससे जमीन लेगा, उसे पुनर्वास के तौर पर नौकरी देगा। चार साल तक उद्योग नहीं लगा पाया तो जमीन वापस आदिवासी की हो जाएगी। सूबे की विरोधी पार्टियां इस संशोधन का विरोध कर रही हैं। अब तो सरकार में शामिल आजसू ने भी मुखर तेवर अपना लिए हैं। तीन बार सूबे के मुख्यमंत्री रह चुके भाजपा के आदिवासी नेता अर्जुन मुंडा भी विरोध में आ गए हैं। इसके लिए अखिल भारतीय आदिवासी मुंडा समाज का सहारा ले रहे हैं। ताकि अपनी ही पार्टी के विरोधी होने के आरोप से बच सकें। सभी ने राष्ट्रपति से फरियाद की है कि झारखंड सरकार के प्रस्ताव को एक सिरे से खारिज कर दिया गया। जानकार कह रहे हैं कि रघुबर दास को अड़ियल रवैया छोड़ना पड़ेगा। जिद की तो घर के रहेंगे न घाट के। घर यानी झारखंड और घाट यानी भाजपा व सूबे की सरकार।

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First Published on June 19, 2017 7:27 am

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