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खराब दौर में हरीश रावत

विधायक दल का नेता तय करने से लेकर पार्टी की सूबेदारी तक के मामले में आलाकमान ने उन्हें तवज्जो नहीं दी।
Author May 8, 2017 06:50 am
हरीश रावत। (फाइल फोटो)

उखड़ी सांस
भाजपा को देश के हर कोने में मजबूत बनाने के अपने अभियान के तहत अमित शाह चंडीगढ़ में भी देंगे 20 मई को दस्तक। यों मकसद इस केंद्र शासित शहर के पार्टी कार्यकर्ताओं और पदाधिकारियों से मुलाकात का है। पर हलचल हरियाणा भाजपा में भी शुरू हो गई है इस दौरे को लेकर। मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर और पार्टी के सूबेदार सुभाष बराला ही नहीं कुछ मंत्री भी कर सकते हैं भाजपा अध्यक्ष से मुलाकात। मनोहर लाल खट्टर पर तो वैसे भी खतरा मंडरा ही रहा है। आलाकमान का वरद हस्त न होता तो कतई स्वीकार न करते उन्हें अपना नेता सूबे के पुराने धुरंधर भाजपाई। वैसे अमित शाह के चंडीगढ़ दौरे की पुष्टि यहां के सूबेदार संजय टंडन ने कर दी है। पंडित दीनदयाल उपाध्याय कार्यकर्ता विस्तारक योजना का हिस्सा है यह दौरा। दरअसल दीन दयाल उपाध्याय का यह जन्मशताब्दी वर्ष ठहरा। आरएसएस की पाठशाला में दीक्षित होने के बाद जनसंघ के मुखिया बने थे उपाध्याय। जनसंघ का ही नया संस्करण है भाजपा। दीनदयाल उपाध्याय के अलावा किसी नेता का राजनीतिक दर्शन है ही नहीं भाजपा में बताने लायक। एकात्म मानववाद के हामी थे

वे। उसी पर आगे बढ़ने का उपक्रम करती रही है बकौल अमित शाह दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी। हालांकि हरियाणा में अमित शाह का दौरा बाद में प्रस्तावित है। चार जुलाई से छह जुलाई तक करेंगे वे इस सूबे की समीक्षा। जहां अपने बूते पहली बार सत्ता का स्वाद ले रही है पार्टी। अपनी इस योजना में अमित शाह बूथ स्तर तक के पार्टी कार्यकर्ताओं से मिलते हैं। दीन दयाल कार्यकर्ता विस्तारक योजना के तहत आरएसएस की तर्ज पर पूर्णकालिक कार्यकर्ताओं की टोह ली जा रही है। एक पखवाड़े से लेकर एक साल तक का अपना वक्त पार्टी को दे सकने वाले कार्यकर्ता चंडीगढ़ से ऐसे 28 कार्यकर्ता गए थे प्रशिक्षण लेने। जाहिर है कि उन्हें अमित शाह दूसरे राज्यों में भेजेंगे पार्टी के विस्तार के लिए। रही चंडीगढ़ की बात तो यहां दूसरे सूबों से आएंगे पूर्णकालिक कार्यकर्ता। घोषित मकसद भले विस्तारकों की खोज है पर आएंगे तो हरियाणा सरकार के कामकाज और मंत्रियों की दशा व दिशा को भी परखेंगे जरूर।
जग हंसाई
लगता है कि हरीश रावत का खराब दौर अभी खत्म नहीं हुआ है। उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव की करारी हार के लिए कांग्रेस आला कमान ने उन्हीं को मान लिया है जिम्मेवार। इसे अनुचित भी कैसे ठहरा सकते हैं रावत। आखिर सरकार चलाने से लेकर टिकट बांटने तक में उनको पूरी छूट दे दी थी। खुद भी दो सीटों से लड़े थे वे चुनाव। हालांकि इससे असुरक्षा और कमजोरी का संदेश भी गया था मतदाताओं के बीच। खुद तो दोनों जगह हारे ही, पार्टी की भी लुटिया डुबो दी। अब विधायक दल का नेता तय करने से लेकर पार्टी की सूबेदारी तक के मामले में आलाकमान ने उन्हें तवज्जो नहीं दी। चकराता से जीते प्रीतम सिंह को सौंप दी राहुल गांधी ने पार्टी की कमान। हरीश रावत ने तो इंदिरा हृदेश को विधायक दल का नेता बनाने पर भी नाक भौं सिकोड़ी थी।

मंशा तो उनकी खुद ही पार्टी का सूबेदार बन जाने की थी। पर किशोर उपाध्याय ने टांग मार दी। खुद को दोबारा मौका मिलते नहीं देख हरीश रावत का भी विरोध तेज कर दिया। आला कमान ने दोनों को ही पहुंचा दिया हाशिए पर। चुनाव के बाद से हरीश रावत सोनिया गांधी और राहुल गांधी से मिलने के तमाम जतन कर चुके हैं। पर मां बेटे ने वक्त देना जरूरी नहीं समझा। उधर सूबे के कांग्रेसी भी अब रावत की चकाचौंध से मुक्त हो चुके हैं। त्रिवेंद्र रावत सरकार के खिलाफ देहरादून के गांधी पार्क में धरना देकर हरीश रावत ने अपनी जगहंसाई ही कराई। बामुश्किल सौ सवा सौ लोग जुट पाए उनके इस धरने में।

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