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राजपाट- अंधेर नगरी चौपट राज

मुख्यमंत्री के घर में सरकारी अस्पताल घोर लापरवाही और अव्यवस्था का शिकार हो तो सूबे के बाकी अस्पतालों की हालत का अंदाजा कोई भी लगा सकता है।
Author August 14, 2017 06:00 am
गोरखपुर में हुए हादसे पर यूपी के स्वास्थ्य मंत्री सिद्धार्थनाथ सिंह ने प्रेस कॉन्फ्रेंस की है। (ANI Photo)

अंधेर नगरी चौपट राज

गोरखपुर मेडिकल कालेज के अस्पताल में पांच दर्जन बच्चों की आकस्मिक मौत पर सूबे के स्वास्थ्य मंत्री सिद्धार्थनाथ सिंह के विवादास्पद बयान ने निराश पड़े विपक्ष को बैठे-बिठाए मुद्दा थमा दिया। अगस्त महीने में बच्चों की मौतों को सनातन परंपरा बता कर अपनी नादानी को ही साबित किया उन्होंने। गोरखपुर वैसे भी मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का अपना घर ठहरा। मुख्यमंत्री के घर में सरकारी अस्पताल घोर लापरवाही और अव्यवस्था का शिकार हो तो सूबे के बाकी अस्पतालों की हालत का अंदाजा कोई भी लगा सकता है। मुख्यमंत्री को भी कुछ नहीं सूझा तो लगे मीडिया पर तोहमत लगाने। योगी हैं और एक पीठ के अधिष्ठाता भी। सो, प्रवचन देने में तो महारत ठहरी। दोषियों को बख्शा नहीं जाएगा, जैसी उनकी टिप्पणियां अब स्थायी बन चुकी हैं। तभी तो अखिलेश यादव और मायावती दोनों ने इसे नरसंहार बता योगी का इस्तीफा मांगा। जबकि तथ्य सामने आ चुके हैं कि आक्सीजन की आपूर्ति बाधित होने से मौतें हुईं। हो सकता है कि आक्सीजन आपूर्ति करने वाले ठेकेदार को बलि का बकरा बना दिया जाए। पर योगी सरकारी व्यवस्था का पोस्टमार्टम क्यों नहीं कर पा रहे? भाजपा ने चुनाव में वादा किया था कि सपा और बसपा के राज में राजकाज और प्रशासन की कार्यप्रणाली जिस तरह चौपट हुई है, भाजपा उसे बदलेगी।

क्या योगी बता सकते हैं कि उत्तर प्रदेश के सरकारी दफ्तरों से ठेकेदारों, आपूर्तिकर्ताओं और दूसरे लोगों का वाजिब भुगतान भी वक्त पर क्यों नहीं होता? अतीत में कितनी बार पेट्रोल पंप और डीजल की आपूर्ति सरकारी दफ्तरों को पेट्रोल पंप के संचालक बंद करने को मजबूर हुए। क्या उत्तर प्रदेश का एक भी विभाग साबित कर सकता है कि उसने अनुबंध में तय भुगतान की मियाद के भीतर भुगतान किया हो? आक्सीजन आपूर्तिकर्ता की अपनी पीड़ा है। किसी भी आपूर्तिकर्ता या ठेकेदार की क्षमता सरकार को एक सीमा से ज्यादा उधार देने की कैसे हो सकती है? कमीशनखोरी के चक्कर में उत्तर प्रदेश के सरकारी दफ्तर लोगों का वाजिब भुगतान वर्षों लटकाए रखते हैं। क्या योगी कोई आयोग या उच्च स्तरीय समिति गठित कर सरकारी दफ्तरों से लोगों के बकाया भुगतान का ब्योरा और भुगतान न होने के कारणों की समीक्षा कराने की पहल करेंगे? अच्छा हो कि पहले वे अपने सभी दफ्तरों को संसद के बनाए आरटीआइ कानून के तहत मांगी जाने वाली जानकारियां वक्त पर उपलब्ध कराने की ही हिदायत दे दें। राज्य के सूचना आयोग के चाबुक चलाने के बाद भी इस कानून के तहत जानकारियां मुहैया नहीं कराने के लिए कुख्यात हैं उत्तर प्रदेश सरकार के दफ्तर।

पाखंडी चिंतन

कुछ नहीं सूझता तो भाजपाई सिंधिया परिवार पर करने लगते हैं प्रहार। मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज चौहान ने भारत छोड़ो आंदोलन की 75वीं जयंती पर नौ अगस्त को फिर सिंधिया परिवार पर हमला बोला है। माध्यम बनाया सुभद्रा कुमारी चौहान की कविता को। हालांकि कुछ शब्द अपनी तरफ से जोड़ दिए और बोले- अंग्रेजों के मित्र सिंधिया ने छोड़ी राजधानी थी, खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी। चौहान ने सिंधिया परिवार पर 1857 की क्रांति के दौरान अंग्रेजों का साथ देने की तोहमत भी लगाई। पार्टी के सूबेदार नंद कुमार सिंह चौहान ने वफादारी के प्रदर्शन के चक्कर में जोड़ दिया कि इतिहास बदला नहीं जा सकता।

सिंधिया घराने पर हमला करने से पार्टी के सांसद प्रभात झा भी नहीं चूके। लेकिन कांग्रेस विधायक दल के नेता अजय सिंह ने भाजपाइयों के दोहरे मापदंड की यह कह कर खिल्ली उड़ाई कि सिंधिया घराने की विजयाराजे सिंधिया यानी राजमाता ने ही खड़ा किया था जनसंघ को। अब बेशक मुख्यमंत्री उनके परिवार के खिलाफ जहर उगलें। राजमाता के सामने तो कंपकंपी छूटती थी सबकी। कांग्रेस के सूबेदार अरुण यादव ने भी मुख्यमंत्री पर ओछी राजनीति करने का आरोप जड़ा। साथ ही शिवराज चौहान से आजादी की लड़ाई में संघी विचारधारा के योगदान की बाबत सवाल दाग दिया। पार्टी के प्रवक्ता केके मिश्र ने वसुंधरा राजे और यशोधरा राजे के बहाने किया पलटवार। सिंधिया परिवार की ये दोनों तो भाजपा में अहम पदों पर हैं। उधर ज्योतिरादित्य सिंधिया ने सफाई दी कि उन्हें शिवराज चौहान का प्रमाण पत्र नहीं चाहिए। उनके पास जनता का दिया प्रमाण पत्र है। जबकि यशोधरा ने मुख्यमंत्री की टिप्पणी से आहत होने और शिकायत अमित शाह व मोहन भागवत तक पहुंचाने की बात कही।

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