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राजपाट- पूरी हुई हसरत

घनश्याम तिवाड़ी फिर गरज रहे हैं। राजस्थान में भाजपा के सबसे अनुभवी नेता हैं तिवाड़ी। मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे की कार्यशैली उन्हें कभी नहीं भायी।
Author August 14, 2017 06:12 am
भाजपा के वरिष्ठ विधायक घनश्याम तिवाड़ी

पूरी हुई हसरत

राम विलास पासवान के अच्छे दिन आ गए। छोटा भाई पशुपतिनाथ पारस बिहार सरकार में अचानक मंत्री बन गया। उन्होंने तो सपने में भी नहीं सोचा था कि ऐसा हो सकता है। वैसे भी पारस इस समय विधायक नहीं हैं। तो भी नीतीश भाई ने उनका मान रखा और उनके छोटे भाई को मंत्री बना दिया। मंत्री बनाया है तो छह महीने के भीतर विधान परिषद में भी ला ही देंगे। पासवान की एक खूबी है। वे अपने धुर विरोधियों की चाहे जितनी कटु आलोचना करें पर उस मुकाम तक नहीं पहुंचते कि सदा के लिए शत्रुता हो जाए। भाजपा को ही लें। उसके साथ कभी दोस्ताना तो कभी बैर चलता ही रहा। राजद और जद (एकी) के साथ भी यही नीति अपनाई। लालू से कभी हाथ मिला लिया तो जरूरत महसूस होते ही छुड़ा भी लिया। नीतीश के साथ जब तक पटी, एका कायम रखा, नहीं पटी तो राह जुदा कर ली। धोखा भी कम नहीं खाया। सियासी दावपेंच के माहिर ठहरे। तभी तो अवसर पड़ने पर हर कोई करता है उनकी पूछ। जब केंद्र की यूपीए सरकार में मनमोहन सिंह के साथ मंत्री थे तो नीतीश तब भाजपा के साथ बिहार की सत्ता में थे। लेकिन नीतीश ने पासवान के सपने को तब भी पूरा किया था। उनके जिले में नदी पर पुल बनवा कर। इतना ही नहीं पुल के उद्घाटन समारोह में पासवान को भी अपने साथ ले जाना नहीं भूले। अब उनके छोटे भाई को मंत्री बना कर उनका यह बहुत पुराना सपना भी पूरा कर दिया। हालांकि पारस को मंत्री बनाने पर कुछ विरोध भी हुआ। नीतीश ने परवाह नहीं की।

अंतरकलह

घनश्याम तिवाड़ी फिर गरज रहे हैं। राजस्थान में भाजपा के सबसे अनुभवी नेता हैं तिवाड़ी। विधानसभा में भी कोई उनसे ज्यादा अनुभवी नहीं। मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे की कार्यशैली उन्हें कभी नहीं भायी। हालांकि उनकी आलोचना के चक्कर में पार्टी आलाकमान ने अनुशासन समिति से उन्हें नोटिस भी दिला दिया जिसका जवाब भी दे चुके हैं। लेकिन आलाकमान ने कार्रवाई अभी तक नहीं की। तिवाड़ी खांटी संघी ठहरे। आपातकाल में उन्नीस महीने जेल में बिताए थे। वसुंधरा की पिछली सरकार में मंत्री भी रहे। लेकिन इस बार वसुंधरा ने मंत्री नहीं बनाया। तभी से दोनों का आपस में ऐसा मोहभंग हो गया कि एक-दूसरे को फूटी आंखों नहीं देख सकते। अमित शाह ने पिछले दिनों तीन दिन तक जयपुर प्रवास किया तो विधायक दल की बैठक में तिवाड़ी को बुलाया ही नहीं। जबकि पार्टी से निलंबित चल रहे विधायक मानवेंद्र सिंह को इस बैठक का बाकायदा बुलावा भेजा गया। जसवंत सिंह के बेटे हैं मानवेंद्र। चूंकि तिवाड़ी की जानबूझ कर उपेक्षा की गई तो फिर वे बवाल मचाते ही। दरअसल संघी खेमा तो यही चाहता है कि तिवाड़ी पार्टी में बने रहें। संगठन मंत्री वी सतीश भी कोशिश कर रहे हैं।

उधर तिवाड़ी ने दीनदयाल वाहिनी बना ली है। सूबे की सरकार के खिलाफ अभियान छेड़ दिया है। भाजपा का नेतृत्व दीनदयाल वाहिनी को समानांतर संगठन बता रहा है। तिवाड़ी को भेजे नोटिस में भी इस बात का हवाला दिया गया है। हालांकि अमित शाह ने इस संगठन की गतिविधियों को आपत्तिजनक बताने से परहेज किया। जयपुर में इस बाबत मीडिया के सवाल पर संभल कर जवाब दिया कि दीनदयाल जी के नाम से जो भी काम किया जाएगा वह गलत हो ही नहीं सकता। इस टिप्पणी ने तिवाड़ी समर्थकों के चेहरे खिला दिए। इसी से भाई लोग यह निहितार्थ तलाशने में जुट गए कि वसुंधरा और तिवाड़ी के बीच सुलह सफाई की कवायद में जुटा है आलाकमान। यह बात अलग है कि तिवाड़ी ने अब नया पैंतरा चल दिया। सूबे की सरकार के भ्रष्टाचार के खिलाफ लोक संग्रह अभियान चलाएंगे। यह तो अपने ही नेतृत्व के खिलाफ मोर्चाबंदी हो गई। यानी वे नए सिरे से जंग के मूड में हैं। अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव के मद्देनजर तिवाड़ी के बागी तेवर से आलाकमान चौकन्ना हुआ है। एक तरफ उसकी कोशिश अतीत में पार्टी छोड़ कर गए नेताओं को चुनाव से पहले वापस लाने की है तो दूसरी तरफ जो पहले से पार्टी में हैं, अगर वही छोड़ने लगे तो मुश्किल होगी। मसलन, किरोड़ी लाल मीणा की घर वापसी चाहते हैं अमित शाह। शायद इसी उधेड़बुन के चलते टल रही है तिवाड़ी के खिलाफ कार्रवाई।

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