April 29, 2017

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राजपाट: राज ही रहने दो, दूजी राह न कोय

अखिलेश यादव ने चुनावी नतीजे आने से पहले ही मन की बात कह दी थी कि जरूरत पड़ेगी तो वे बुआजी यानी मायावती का समर्थन भी लेने से गुरेज नहीं करेंगे।

Author April 17, 2017 04:47 am
बसपा सुप्रीमो मायावती (बाएं) और सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव।

राज ही रहने दो
ममता बनर्जी ठहरीं अपनी मर्जी की मालिक। बांग्लादेश के साथ तीस्ता नदी के पानी के बंटवारे पर प्रस्तावित समझौते की फाइल पर अंगद के पांव की तरह अडिग हैं पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री। इससे दोनों देशों के आपसी रिश्तों में दूरी घटाने की मुहिम को झटका लगा है। बहरहाल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से हुई उनकी मुलाकात का अर्थ सियासी हलको में हर कोई अपने-अपने हिसाब से निकाल रहा है। जब कोलकाता से दिल्ली के लिए रवाना हुई थीं तब तक तो प्रधानमंत्री से मुलाकात की कोई योजना थी नहीं उनकी। नोटबंदी, सारदा चिटफंड और रोज वैली घोटालों के बाद यों भी भाजपा और तृणमूल कांग्रेस के आपसी रिश्तों में तल्खी बढ़ी ही है। लिहाजा किसी को मोदी और ममता की अनायास बैठक का अनुमान भी नहीं था। यों खुद ममता ने इस बैठक के बाद सफाई दी कि सूबे की वित्तीय समस्याओं पर चर्चा करना था मुलाकात का मकसद। यह बात अलग है कि विरोधियों ने इसके लिए उन्हें कठघरे में खड़ा कर दिया है। वे तो इसे सीबीआइ के चंगुल से बचने की ममता की कोशिश बता रहे हैं। वे मानने को तैयार नहीं कि मौजूदा हालात में सियासी मुद्दों पर चर्चा के लिए मुलाकात हो। वाम मोर्चे के मुखिया बिमान बसु ने सीबीआइ से बचने की कोशिश वाली थ्योरी सबसे पहले चलाई। दरअसल सारदा समेत दूसरे कई घोटालों में तृणमूल कांग्रेस के कई कद्दावर नेता जेल की हवा खा चुके हैं। अब नारद स्टिंग मामले ने अलग संकट बढ़ाया है। इसी तरह कांग्रेस के सूबेदार अधीर चौधरी ने भी ममता पर निशाना साधते हुए कटाक्ष किया कि कोलकाता में केंद्र के खिलाफ गरजने वाली ममता ने दिल्ली जाकर मोदी के सामने घुटने टेक दिए। बेचारे तृणमूल कांग्रेस के नेताओं को कोई सफाई देते बन ही नहीं रहा अपनी नेता की कवायद पर।
दूजी राह न कोय
आंबेडकर जयंती पर बहिनजी को सन्मति आ ही गई। अखिलेश यादव ने चुनावी नतीजे आने से पहले ही मन की बात कह दी थी कि जरूरत पड़ेगी तो वे बुआजी यानी मायावती का समर्थन भी लेने से गुरेज नहीं करेंगे। दो महीने की खामोशी के बाद आई है मायावती की प्रतिक्रिया। भाजपा के विरोध में दूसरे दलों से हाथ मिलाने से परहेज नहीं करने का एलान कर दिया है। बहिनजी के पास अब दूसरा कोई विकल्प है भी तो नहीं। पहले 2012 में हार का सामना किया। फिर 2014 के लोकसभा चुनाव ने तो लोकसभा से पार्टी का नामोनिशान ही मिटा दिया। अब फिर विधानसभा चुनाव के नतीजे अस्तित्व के लिए संकट बन कर आए हैं। महज 19 सीटों पर सिमट गई देश के सबसे बड़े सूबे की सबसे ज्यादा चार बार मुख्यमंत्री रह चुकीं मायावती की पार्टी बसपा। राज्यसभा का कार्यकाल अगले साल खत्म हो जाएगा। 19 विधायक भी एकजुट रह पाएंगे, इसमें संदेह है। ऐसे में कांग्रेस और सपा की मदद से ही बची रह पाएगी, राज्यसभा की सदस्यता। हार के बाद सपा और बसपा दोनों के भीतर ही घमासान मचा है। सो गैरभाजपा दलों के गठबंधन से ही निकल सकती है भविष्य की राह। भाजपा को यूपी में महज चालीस फीसद वोट मिले हैं। यानी साठ फीसद वोट कांग्रेस-सपा-बसपा और रालोद में बंट गए। याद कीजिए 1993 को। वह राम मंदिर की आंधी का दौर था। 1991 में भाजपा ने राम के नाम पर ही उत्तर प्रदेश में स्पष्ट बहुमत की सरकार बनाई थी। 1992 में बाबरी मस्जिद टूटी तो यह सरकार भी उसकी भेंट चढ़ गई। कल्याण सिंह को दोबारा बंपर जीत का भरोसा था। लेकिन यूपी की सियासत में एक नया प्रयोग हुआ। कांशीराम और मुलायम सिंह यादव ने हाथ मिलाया। दोनों 1993 का चुनाव मिल कर लड़े। नारा था- मिले मुलायम कांशीराम, हवा हो गए जय श्रीराम। यादव, दलित और मुसलमान का गठजोड़ भाजपा के लिए तब भी चिंता का सबब बना था और आगे भी बन सकता है। साफ है कि अब 2019 के लोकसभा चुनाव को ध्यान में रख कर गठबंधन ही होगा गैरभाजपा दलों के सामने एक मात्र विकल्प।

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First Published on April 17, 2017 4:44 am

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