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राजपाट- आम आदमी पार्टी में जारी दिल्ली से लेकर पंजाब तक उठापटक

आम आदमी पार्टी भी समाजवादियों की तरह विखंडन से बच नहीं पाएगी।
Author May 15, 2017 04:58 am
दिल्‍ली के मुख्‍यमंत्री अरविंद केजरीवाल। (फाइल फोटो)

बिखराव की नियति 

लगता है कि आम आदमी पार्टी भी समाजवादियों की तरह विखंडन से बच नहीं पाएगी। दिल्ली में तो उठापटक चल ही रही है, पर पार्टी का बिखराव पंजाब में भी तय दिख रही है। खासकर गुरप्रीत वड़ैच (घुग्गी) के इस्तीफे के बाद। वह विधानसभा चुनाव के वक्त न केवल पार्टी के संयोजक थे बल्कि संकटमोचक के रूप में भी सामने आए हैं। इसी तरह उपकार संधू को भी भगवंत मान का विरोध महंगा पड़ गया। वे पार्टी से निष्कासित कर दिए गए हैं। पार्टी के लिए चिंता की बात यह है कि घुग्गी ने भी इस्तीफा देने से पहले अरविंद केजरीवाल और दूसरे बड़े नेताओं पर गंभीर आरोप लगाए। भगवंत मान के साथ काम नहीं कर पाने की बात भी कही। एक साल पहले ही जुड़े थे पार्टी से घुग्गी। पर थोड़े समय में भी काम खूब किया। नाराजगी तब बढ़ गई जब केजरीवाल ने भगवंत मान को पार्टी का पंजाब का संयोजक बना दिया। छोटेपुर को हटाए जाने के बाद से खाली चल रहा था यह पद। यों भगवंत मान तब भी पार्टी में थे। तब उन्हें संयोजक नहीं बनाया था। घुग्गी को सौंपा था यह अहम जिम्मा। घुग्गी ने केजरीवाल पर लोकतांत्रिक प्रक्रिया के हनन का आरोप जड़ा है। बात है भी ठीक। संयोजक का फैसला 117 प्रतिनिधियों द्वारा होना चाहिए था। घुग्गी भगवंत मान के बजाए धर्मवीर गांधी, एचएस फुल्का और सुखपाल सिंह में से किसी को देना चाहते थे यह पद। अब तो उन्होंने केजरीवाल को पुरानी बात याद दिला कर चुनौती भी दी है। सुच्चा सिंह छोटेपुर को जिस वीडियो के बहाने हटाया था, उसे सार्वजनिक करने का वादा निभाने को कहा है। साथ ही यह उलाहना अलग दे दिया कि चुनाव हारने के बाद पंजाब क्यों नहीं आए केजरीवाल। साबित हो गया है कि पंजाब, पंजाबियत और पंजाबी समुदाय के लोगों से कोई सरोकार वाकई नहीं है केजरीवाल को। अब तो नवजोत सिद्धू के पार्टी में न आ पाने का दोष भी घुग्गी ने केजरीवाल के मत्थे ही मढ़ दिया है।

आंखों के तारे
सुनील जाखड़ बन गए हैं पंजाब में कांग्रेस के सूबेदार। कैप्टन अमरिंदर के मुख्यमंत्री बनने के साथ ही खाली हो गया था पार्टी सूबेदार का पद। यों दावेदार राजिंदर कौर भट्ठल भी थीं। पर आलाकमान ने तरजीह जाखड़ को दी। चुनाव से पहले पार्टी विधायक दल के नेता थे जाखड़। वरिष्ठता भी कम नहीं है। विरोधी दल के नेता के रूप में बादल सरकार के खिलाफ काम खूब किया। कांग्रेस की अंदरूनी गुटबाजी के बावजूद पार्टी को मजबूत करने में कसर नहीं छोड़ी। चर्चा है कि उन्हें सूबेदारी दिलाने में सूबे की पार्टी प्रभारी महासचिव आशा कुमारी ने भी भूमिका अदा की। राहुल गांधी खुद भी उनके संगठन के प्रति समर्पण से प्रभावित थे। कुर्सी संभालते ही एलान किया है कि कांग्रेस बदलेगी राजनीति नहीं करेगी। पार्टी की सरकार सारे चुनावी वादे भी पूरे करेगी। पार्टी कार्यकर्ताओं को सरकार के दूत की भूमिका में आने की सलाह दी है। यानी सरकार की उपलब्धियों का जमीनी स्तर तक प्रचार चाहते हैं। ताजपोशी के वक्त हरीश चौधरी, अंबिका सोनी और आशा कुमारी समेत सूबे के भी तमाम नेताओं की मौजूदगी ने साबित कर दिया कि आलाकमान की आंखों के तारे हैं जाखड़।

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