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राजपाट: रिश्तों की मर्यादा

उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव में भी राहें जुदा होने के आसार हैं। बड़े भाई की मजबूरी है कि वहां अपने उम्मीदवार नहीं उतार सकते।
Author October 3, 2016 06:26 am
राजद के पूर्व सांसद शहाबुद्दीन ने हाई कोर्ट से जमानत मिलने के बाद कहा था कि नीतीश कुमार उनके नेता नहीं हैं।

नीकु का विरोधाभास

नीकु फिर विवाद में घिर रहे हैं। नीकु यानी बिहार के दूरदर्शी माने जाने वाले मुख्यमंत्री नीतीश कुमार। अब तो जद (एकी) के मुखिया भी हैं वे। अभी फैसला कर दिया कि देश में विदेशी शराब बनाने वाली जो कंपनी बिहार में कारखाना लगाएगी, उसे बाटलिंग और पैकेजिंग पर टैक्स से छूट मिलेगी। एक तरफ तो नीकु ने अपने सूबे में कड़ाई से शराब बंदी लागू की है। दूसरी तरफ शराब कंपनियों को न्योता दे रहे हैं। जबकि विरोधी तो पहले ही उनकी लानत-मलानत कर रहे थे कि शराबबंदी लागू की है तो फिर सूबे में चल रहे शराब के कारखानों को बंद क्यों नहीं करते? विरोधियों ने शराबबंदी से सूबे को हो रहे राजस्व घाटे का सवाल भी उठाया था। तब तो नीकु ने लापरवाही से जवाब दिया था कि घाटे की परवाह वे नहीं करते? शराब छोड़ने से लोगों का जो पैसा बचेगा, उससे वे कोई न कोई रोजगार और कमाई करेंगे। फिर टैक्स भी देंगे। नुकसान उतना नहीं होगा जितना फायदा हो जाएगा। रही शराब कारखानों को न्योता देने की बात तो लोगों को रोजगार मुहैया कराना है, इसके पीछे उनकी सरकार का मकसद। वैसे भी शराब कंपनियों के लिए यह नियम पहले से लागू है कि जिस सूबे में कारखाना होगा, वहां बनी शराब उस सूबे में सप्लाई नहीं की जा सकती। दूसरे सूबों में होगी उसकी सप्लाई। यानी नए कारखाने लगने से शराबबंदी की नीति पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा। अजीब हाल है। शराबबंदी के मुद्दे पर नीकु अगर डाल-डाल हैं तो विरोधी पात-पात। नीकु तो शराबबंदी की मुहिम दूसरे सूबों में भी चला रहे हैं। झारखंड, उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश में तो सभाएं भी कर चुके हैं। पर यह अटपटा लगता है कि अपने सूबे में नए कारखाने खुलवाना चाह रहे हैं तो फिर दूसरे सूबों में शराबबंदी की बात क्यों कर रहे हैं? फिर कहां बिकेगी बिहार के कारखानों में बनी शराब। यह तो विरोधाभास है नीकु के नजरिए का।

रिश्तों की मर्यादा

एक और एक मिलकर गणित के साधारण हिसाब से दो हो जाते हैं, पर दुनियादारी के हिसाब से उनकी ताकत ग्यारह के बराबर हो जाती है। बिहार में भी दो भाई आपस में मिले तो दोनों का ही रुतबा बढ़ गया। बड़े भाई और छोटे भाई का यह रिश्ता स्वाभाविक नहीं है। पर रिश्ता तो मानने से होता है। नीतीश को अपना छोटा भाई मानते हैं लालू यादव। आजकल शहाबुद्दीन के सवाल पर रिश्तों में खिंचाव बढ़ा है। दोनों ने मुंह फुला रखे हैं। उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव में भी राहें जुदा होने के आसार हैं। बड़े भाई की मजबूरी है कि वहां अपने उम्मीदवार नहीं उतार सकते। वहां की सत्तारूढ़ पार्टी के नेता के पौत्र से बेटी ब्याह रखी है। लिहाजा मदद करना फर्ज है उनका। पर छोटा भाई वहां न केवल अपने उम्मीदवार उतारने की सोच रहा है बल्कि जमकर प्रचार करने का एलान भी कर चुका है। हां, इतना तय है कि जब तक दिल्ली में नरेंद्र मोदी सत्तारूढ़ हैं, दोनों भाइयों का संबंध बना रहेगा। एक दूसरे पर सीधे तो दूर परोक्ष रूप से भी वार नहीं करेंगे। बड़े भाई को तो बड़प्पन दिखाना ही पड़ेगा। अपने ज्यादा विधायक होने के बावजूद उसे मुख्यमंत्री बनवा कर भी तो बड़प्पन दिखाया ही था।

बेबाक तिवाड़ी

राजस्थान की भाजपा सरकार के मंत्रियों के हाल निराले हैं। पार्टी के ही कद्दावर नेता घनश्याम तिवाड़ी ने इसकी पोल खोल दी है। मंत्रियों को मोहरा करार दिया है और औकात मोहर जैसी बता दी है उनकी। वैसे भाजपा और सरकार दोनों की हालत को लेकर दुखी पार्टी का आलाकमान भी बताया जा रहा है। जहां तक तिवाड़ी का सवाल है, वसुंधरा से वरिष्ठ होने के बावजूद हाशिए पर हैं। वसुंधरा ने मंत्री पद दिया ही नहीं। तभी तो उनके सुर बागी लगते हैं। वसुंधरा के मुखर आलोचक बन चुके तिवाड़ी को अब पार्टी के कई विधायकों का भी समर्थन मिल रहा है। जो सरकार के भ्रष्टाचार से आहत हैं। तिवाड़ी ने तो अपनी अलग दीन दयाल वाहिनी भी बना डाली। उधर जयपुर के पार्टी दफ्तर में अब निष्ठावान भाजपाइयों का अकाल पड़ गया है। वसुंधरा से असंतुष्ट नेताओं में तिवाड़ी अकेले नहीं हैं। नरपत सिंह राजवी और ज्ञानदेव आहूजा की भी कद्र नहीं कर रही वसुंधरा। सूबे के मंत्रियों और विधायकों की पीड़ा को दोहराते हुए तिवाड़ी ने हाल ही में कटाक्ष भी कर दिया। ये मंत्री अपनी बेबसी का रोना रोते हैं। इस पर तिवाड़ी ने बेबाकी से चुटकी ली कि जिसकी सरकार में चलती है, अब उसे ही क्यों चलता नहीं कर देना चाहिए। मंत्रियों की पीड़ा अपनी परवाह नहीं करने वाले अफसरों के कारण बढ़ी है। सरकार के लिए बनी सलाहकार परिषद पर भी रिटायर अफसरों का ही दबदबा है। भले उन्हें सूबे की जमीनी हकीकत का कतई भान न हो। तीन साल में विकास का एक भी उल्लेखनीय काम नहीं कर पाई है भाजपा सरकार। अमित शाह खफा न होते तो मध्य प्रदेश, हरियाणा, महाराष्ट्र और झारखंड जैसे सूबों के साथ केरल् में हुई पार्टी की राष्ट्रीय परिषद की बैठक में राजस्थान का नाम क्यों न लेते? जहां तक पार्टी के वफादार और जमीनी कार्यकर्ताओं का सवाल है, अपने राज में भी वे तो महसूस नहीं कर पाए तीन साल में अच्छे दिन।

गुरुंग बनाम ममता

दुर्गा पूजा सबसे बड़ा त्योहार है सूबे का। पश्चिम बंगाल के पर्वतीय क्षेत्र दार्जिलिंग में फिर भी सियासी सरगर्मी बढ़ गई है। गोरखा जनमुक्ति मोर्चे के साथ रिश्तों में तल्खी बढ़ी है तृणमूल कांग्रेस की। इलाके की अनदेखी का आरोप लगा मोर्चे ने बारह घंटे का बंद भी किया था पिछले दिनों। पर मुख्यमंत्री ममता बनर्जी भी अड़ियल ठहरीं। दार्जिलिंग का महत्व घटाने के मकसद से कलिंपोंग को सूबे का 21वां जिला बना दिया उन्होंने। जबकि पहले यह दार्जिलिंग का ही हिस्सा था। मोर्चे के मुखिया विमल गुरुंग को अखरा है यह फैसला। वे तो पर्वतीय इलाकों को अपनी बपौती समझते हैं। तभी तो ममता पर आरोप जड़ दिया कि वे गोरखालैंड के लोगों को बांटने की सियासत कर रही हैं। ताकि अलग सूबे का आंदोलन भटक जाए। लेपचा और तामंग तबकों के लिए कलिंपोंग में अलग-अलग विकास बोर्ड भी बना दिए हैं ममता ने। पर विमल गुरुंग ने फरमाया है कि इलाके के लोग फिर भी गोरखालैंड के पक्षधर हैं। पूजा की छुट्टियों में दार्जिलिंग होता है सूबे के पर्यटकों का पसंदीदा ठिकाना। लेकिन सियासी गहमागहमी से डरे पर्यटक अब दूसरे इलाकों का रुख कर रहे हैं। बंद को लेकर भी प्रशासन से ठन गई थी मोर्चे की। कोलकाता हाईकोर्ट ने भी बंद को असंवैधानिक और गैरकानूनी ठहराया था। सियासी पंडित मानने लगे हैं कि गुरुंग की पकड़ अब कमजोर हो गई है। इसीलिए अपनी ताकत दिखाने की गरज से ही वे बार-बार रैलियां और बंद करने पर उतर आए हैं। बेशक उनके आंदोलनों से इलाके की अर्थव्यवस्था पर खतरा क्यों न बढ़ रहा हो।

एमपी गजब है

भ्रष्टाचार के मामले में काफी उर्वर बन गया है मध्य प्रदेश। लोकायुक्त की पुलिस के छापों ने देश में हर किसी को हैरान किया। मध्य प्रदेश पर्यटन विभाग के विज्ञापन की मुख्य पंक्ति है- एमपी अजब है। देश के लोगों ने भ्रष्टाचार के मामले में इसे एकदम खरा महसूस किया। चुंगी के बाबू और नगर पालिका के जेई तक जहां करोड़ों की काली कमाई में पकड़े जाएं, आइएएस पति-पत्नी के बिस्तर में करोड़ों की नकदी बरामद हो, वह सूबा वाकई अजब भी है और गजब भी। तभी तो सूबे की सरकार को अपनी एजंसियों पर भी भरोसा नहीं रहा। स्टार्टअप को आसान बनाने के लिए मुख्यमंत्री ने बुलाई थी कैबिनेट की बैठक। सुझाव आया कि लघु उद्योग निगम में इसके लिए विशेष प्रकोष्ठ बना दिया जाए। स्कूली शिक्षा के मंत्री विजय शाह को अटपटा लगा। लिहाजा टपाक से बोले कि लघु उद्योग निगम तो दो फीसद कमीशन खाने वाली खराब छवि की संस्था है। उसे यह काम दे दिया तो समझो हो गया स्टार्टअप। शाह की इस टिप्पणी से बैठक में सन्नाटा छा गया। पर मुख्यमंत्री को तो पूछना ही था कि कहां बनाई जाए विशेष प्रकोष्ठ। ज्यादातर मंत्रियों की राय थी कि स्टार्टअप को कायदे से चलाना है तो प्रकोष्ठ को सरकारी तंत्र से दूर ही रखा जाए। ऐसी व्यवस्था हो कि बिना लापरवाही काम हो और युवा परेशान न हों। दरअसल प्रधानमंत्री के महत्वाकांक्षी स्टार्टअप कार्यक्रम के लिए मध्य प्रदेश सरकार ने एक अरब रुपए का कैपिटल वेंचर फंड बनाया है। कोई युवा अगर पचास लाख का कर्ज लेगा तो बारह फीसद ब्याज की उसकी देनदारी का दो तिहाई हिस्सा सूबे की सरकार चुकाएगी। बहरहाल कैबिनेट ने भी सरकारी संस्थाओं में भ्रष्टाचार की बात तो मान ही ली।

युद्ध और चुनाव

पाक सीमा पर जारी तनाव ने पंजाब विधानसभा के आगामी चुनाव पर ही सवाल उठा दिया है। तनाव के चलते सरकार ने सीमा के दस किलोमीटर भीतर तक के दायरे के गांव खाली करवा लिए हैं। ऐसे में चुनाव पर उठने वाला सवाल स्वाभाविक भी है। चार महीने ही तो बचे हैं। ऊपर से तैयारी के लिए भी वक्त चाहिए। ऐसे में भारत-पाक के बीच तनाव का माहौल बना रहा तो चुनाव खिसकने की नौबत भी आ सकती है। लाखों लोग घर बार छोड़ शिविरों या रिश्तेदारों के घर पनाह ले रहे हैं। स्कूल बंद हो गए हैं और ग्रामीण इलाकों के सरकारी अस्पताल और डिस्पेंसरी भी वीरान हैं। मुख्यमंत्री प्रकाश् ा सिंह बादल ने बेघर हुए लोगों के लिए बनाए शिविरों का दौरा कर मुश्किलों को जाना है। उधर कांग्रेस के नेता दूसरी बात कह रहे हैं। सीमा तो राजस्थान और गुजरात से भी लगती है पाकिस्तान की। पर राजस्थान में तो सरकार ने सीमा के गांवों को खाली नहीं कराया। पंजाब सीमा पर बीएसएफ की गतिविधियां भी पहले जैसी ही हैं। फिर क्यों जरूरत से ज्यादा एहतियात बरत रही है पंजाब सरकार। वाकई युद्ध का खतरा है या फिर चुनाव के चक्कर में सोची-समझी रणनीति से हो रहा है सब कुछ।

दूर की कौड़ी

सुच्चा सिंह छोटेपुर पंजाब में आम आदमी पार्टी के संयोजक थे। स्टिंग में फंसे तो केजरीवाल ने कुर्सी खींच ली। लिहाजा नवजोत सिद्धू से उम्मीद लगा ली उन्होंने। यह बात अलग है कि सिद्धू के अपनी अलग पार्टी नहीं बनाने के एलान ने खफा भी कर दिया छोटेपुर को। तभी तो थक हार कर अपनी अलग पार्टी बनाने का एलान किया है। मैदान में उनका उतरना चुनावी सियासत पर असर जरूर डालेगा। अकाली दल को भी अपने नुकसान का डर सता रहा है। अकाली-भाजपा गठबंधन को हराने का एजंडा है छोटेपुर का। तभी तो पंजाब प्रोग्रेसिव एलायंस बना उसमें समान विचारधारा वाले दलों और नेताओं को जगह देंगे। अब बाकायदा इस्तीफा भी दे दिया है केजरीवाल की पार्टी से। बकौल छोटेपुर पंजाब में अकाली दल, भाजपा, कांग्रेस और आप सब नाकाम साबित हुए हैं। लिहाजा सूबे के हितों के लिए नए क्षेत्रीय दल की जरूरत बढ़ गई है। प्रकाश सिंह बादल पर पारिवारिक हितों की रखवाली का आरोप लगाया है उन्होंने। बिहार, यूपी, ओड़ीशा, तमिलनाडु, तेलंगाना और आंध्र प्रदेश जैसे सूबों की मिसाल दे रहे हैं छोटेपुर। जहां क्षेत्रीय दल मजबूती से सरकार चला रहे हैं। अब भी सिद्धू को छूट दी है कि चाहें तो अपने संगठन आवाजे पंजाब को उनके एलायंस में शामिल कर सकते हैं।

छोड़ी छाप

अपनी तीन दिन की यात्रा से उत्तराखंड के लोगों पर गहरी छाप छोड़ गए राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी। कहने को पूरी तरह निजी और धार्मिक थी उनकी यह यात्रा। पर लोगों से मेल-मुलाकात का मोह नहीं छोड़ा फिर भी प्रणब ने। केदारनाथ और हरिद्वार के पंडे तो उनकी धार्मिक प्रवृत्ति के कायल हो गए। अपने बेटे और बेटी समेत केदारनाथ में आधे घंटे तक विधि विधान से पूजा तो की ही बाद में मंदिर की परिक्रमा भी कर दी। हरिद्वार में भी हरकी पौड़ी पर गंगा पूजन व गंगा आरती के बाद श्रद्धा से गंगा जल का आचमन भी किया और गंगा का अभिषेक भी। बाद में गंगा की अविरलता, निर्मलता और स्वच्छता की शपथ भी लेना नहीं भूले। गंगा सभा हरिद्वार के लिए तो यह दुर्लभ अवसर बन गया। तभी तो राष्ट्रपति को रजत अभिनंदन पत्र, चांदी की गंगा जली और अंगवस्त्र भेंट किया। देहरादून में अंग्रेजी राज के बने आसियाने में ठहरे। वहीं समाज के तमाम प्रतिष्ठित लोगों को चाय पर आमंत्रित कर प्रेमभाव से बतियाए। विनम्रता से सबका दिल जीत लिया बुजुर्ग प्रणब ने।

संकट में कुनबा

सुप्रीम कोर्ट ने बीसीसीआइ को हड़काया तो धूमल को जैसे सांप सूंघ गया। हिमाचल के कद्दावर भाजपा नेता प्रेम कुमार धूमल के बेटे अनुराग ठाकुर ही तो हैं अब बीसीसीआइ के कर्ताधर्ता। इससे भाजपा के धूमल विरोधी खेमे की बांछे खिल गई हैं। दबी जुबान से ही खुसर-फुसर चालू है कि वीरभद्र के खिलाफ तो मुंह खोलने से पहले ही घबराते थे अब सुप्रीम कोर्ट के हमलावर तेवरों ने और पतली कर दी है उनकी हालत। उनके सांसद बेटे को बीसीसीआइ की कुर्सी छोड़नी पड़ेगी। लोढ़ा समिति ने यही सुझाव दिया था अरबों का धंधा करने वाले क्रिकेट संगठन को। ऐसे में धूमल के कुनबे को समझ नहीं आ रहा कि करें तो क्या करें? सुप्रीम कोर्ट पर नुक्ताचीनी तो कर नहीं सकते।

चक्रव्यूह में राजा

सीबीआइ और प्रवर्तन निदेशालय हाथ धोकर पीछे पड़े हैं हिमाचल के मुख्यमंत्री वीरभद्र और उनके परिवार के। कहने को कुछ भी कहें पर बेटे विक्रमादित्य को लेकर तो तनाव में जरूर होंगे वीरभद्र। हालांकि कहा यही है कि न सीबीआइ हव्वा है और न ईडी। पर प्रवर्तन निदेशालय तो लगातार पूछताछ कर रहा है विक्रमादित्य से। डर न होता तो दिल्ली हाईकोर्ट की शरण क्यों लेते? हाईकोर्ट ने फिलहाल तो राहत दे ही दी है कि विक्रमादित्य को गिरफ्तार नहीं किया जाए। अभी तक निदेशालय के कब्जे में केवल एलआइसी का एजंट ही है। जिसकी अभी जमानत नहीं हो पाई है। वीरभद्र, उनकी पत्नी प्रतिभा सिंह और बेटे विक्रमादित्य को तो अदालत ने राहत दे रखी है। सो, निदेशालय के हाथ बंधे हैं। हां, यह तो कोई नहीं नकार सकता कि केंद्र की एजंसियों के चक्रव्यूह में उलझने के कारण हिमाचल सरकार के कामकाज पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ रहा। दरअसल यह तो कोई भी बखूबी समझ सकता है कि जब राजा खुद संकट में हो तो भला प्रजा कैसे खुश रह सकती है।
सत्ता का चरित्र

ग्वालियर में मध्य प्रदेश भाजपा की कार्यसमिति की बैठक में संघ प्रचारक सुरेश यादव की निर्मम पिटाई का मुद्दा हावी रहा। बालाघाट के बेहर थाने में भाजपा की ही सरकार के राज में संघ के प्रचारक को पुलिस यातनाएं दे तो हंगामा बरपेगा ही। सूबे के पार्टी प्रभारी विनय सहस्त्रबुद्धे इस घटना पर कुपित दिखे। नौकरशाही को बेलगाम बताया। ऊपर से चेताया भी कि जब तंत्र हावी हो जाता है तो मंत्र चला जाता है। ऐसे माहौल में दीनदयाल के मार्ग पर चलना कठिन होगा। एक तरह से सूबे की अपनी सरकार के सुशासन के दावे पर सवाल खड़ा कर दिया राष्ट्रीय उपाध्यक्ष ने। इससे पहले महासचिव कैलाश विजयवर्गीय ट्वीट के जरिए अपनी भड़ास निकाल चुके थे। बालाघाट में संघ दफ्तर के भीतर घुस कर एएसपी की मौजूदगी में जिला प्रचारक से मारपीट की गई, यह अक्षम्य है। कैलाश के इस ट्वीट के बाद विरोधी स्वर और मुखर हो गए। भूपेंद्र सिंह, गौरीशंकर बिसेन और रामपाल तीनों मंत्रियों को दिन भर संघियों को सफाई देनी पड़ी। गृहमंत्री हैं भूपेंद्र सिंह। बालाघाट के सांसद बोध सिंह भगत भी कुपित नजर आए। बैठक में सवाल उठाया कि अब तक दोषी पुलिस वाले गिरफ्तार क्यों नहीं हुए। भूपेंद्र सिंह को अखरा और सवाल को अनसुना कर मंच से जाने लगे। नतीजतन सूबेदार नंदकुमार सिंह ने हस्तक्षेप कर सांसद को चुप कराया। गृहमंत्री ने बड़ी रोचक सफाई दी कि पुलिस अफसर प्रचारक यादव को पहचानते ही नहीं थे। लिहाजा अनजाने में हो गई चूक। ऊपर से तुर्रा यह दिया कि अब प्रचारकों का थानेदारों से परिचय कराया जाएगा। उनकी थानों को सूची भेजेंगे। यह खबर बाहर निकली तो कांग्रेस के सूबेदार अरुण यादव को मौका मिल गया। तपाक से फब्ती कस दी कि कांग्रेस तो सदा कहती रही है कि शासन प्रशासन की असल कमान तो आरएसएस संभाल रहा है। बहरहाल संघ प्रचारक की पिटाई के विरोध में बालाघाट बंद हुआ तो बजरंग दल और विश्व हिंदू परिषद भी समर्थन में आ गए। संघ के दबाव में एसपी ने एक टीआइ समेत आठ पुलिस वालों को निलंबित कर दिया। मुख्यमंत्री चूंकि विदेश में थे सो कार्यसमिति की बैठक में पहले दिन गैरहाजिर रहे। अलबत्ता दूसरे दिन समापन सत्र को संबोधित किया उन्होंने। गनीमत है कि समापन पार्टी के नेताओं ने सूबे में चौथी बार सरकार बनाने के इरादे से किया।

 

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First Published on October 3, 2016 6:26 am

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