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राजपाट : यक्ष प्रश्न

लालू यादव खांटी सियासी ठहरे। सियासत के दांवपेंच में उनके पारंगत होने की हकीकत को उनके धुर विरोधी भी कभी नहीं नकारते। चारा घोटाले में अदालत से मिली सजा के चलते वे खुद चुनाव नहीं लड़ सकते।
Author नई दिल्ली | June 6, 2016 03:21 am
लालू प्रसाद यादव (Photo PTI)

लालू यादव खांटी सियासी ठहरे। सियासत के दांवपेंच में उनके पारंगत होने की हकीकत को उनके धुर विरोधी भी कभी नहीं नकारते। चारा घोटाले में अदालत से मिली सजा के चलते वे खुद चुनाव नहीं लड़ सकते। लेकिन इतनी बड़ी बाधा भी उनके मिजाज को प्रभावित नहीं कर पाई। संकट में भी मुस्कुराते रहने का बेजोड़ माद्दा है उनमें। किसी की परवाह भी नहीं करते। अगर करते तो भला अपने मन के मुताबिक कहां चल पाते। आज कल कुनबे की वजह से चर्चा में हैं। उनकी पत्नी राबड़ी दो बार बिहार की मुख्यमंत्री रह चुकी हैं। नेता प्रतिपक्ष का जिम्मा भी निभाया।

इस समय भी विधान परिषद की सदस्य हैं। दोनों बेटे विधानसभा चुनाव जीते थे। तेज प्रताप और तेजस्वी दोनों को ही उन्होंने मंत्री भी बनवा दिया। छोटे को तो उपमुख्यमंत्री का ओहदा दिला कर सरकार में दूसरे नंबर की हैसियत दिला दी। अब अपनी बड़ी बेटी मीसा भारती को राज्यसभा का टिकट दे दिया। उनकी जीत में किसी को संदेह नहीं। परिवारवाद की ऐसी दूसरी मिसाल शायद ही ढूंढ़ने से मिले। हां, यूपी में मुलायम और तमिलनाडु में करुणानिधि के परिवारवाद भी गिनाए जाते हैं। पर लालू से वे सब पीछे ही हैं। बेटों और बेटी से भी पहले लालू अपने दोनों सालों को राजनीति में लाए थे।

विधानसभा और विधान परिषद में भेजा था। बेशक सुभाष यादव और साधु यादव दोनों ही अब उनसे खफा हैं। साधू यादव को तो लालू ने लोकसभा और राज्यसभा भी भेजा। बेटी मीसा को लोकसभा भेजने की उनकी हसरत मतदाताओं ने पिछले चुनाव में पूरी नहीं होने दी। विधानसभा चुनाव के मौके पर अटकलें खूब लगी कि लालू अपनी बेटी और पत्नी को बढ़ाएंगे। पर दोनों की ही अनदेखी कर इस चुनाव में उन्होंने अपने बेटों को मौका दिया। छोटे की तो चुनाव लड़ने की उम्र ही कुछ दिन पहले हो पाई थी।

राज्यसभा चुनाव में भाई लोग राबड़ी के दिल्ली आने के अनुमान लगा रहे थे। पर लालू ने चुना बेटी को। बेटी के बहाने ही सही दिल्ली में ठौर ठिकाना हो जाएगा। लालू से अब कोई परिवारवाद के मुद्दे पर उलझता ही नहीं। उलझे भी क्यों? वे तो डंके की चोट पर कहते हैं कि वे अगर राजनीति में हैं तो उनका परिवार राजनीति में क्यों नहीं आ सकता? समाजवादी आंदोलन से निकले लालू एक दौर में कांग्रेस और नेहरू गांधी परिवार पर वंशवाद का आरोप लगा कर कठघरे में खड़ा करते थे। लेकिन अब वे खुद भी उसी राह पर हैं। परिवारवाद के विरोध की राजनीति अब उन्हें राजनीति लगती ही नहीं। अब तो हर किसी को यही जिज्ञासा है कि अगले मौके पर वे अपने परिवार से किसे लाएंगे सियासत में। यक्ष प्रश्न जैसी है यह जिज्ञासा।


वक्त का फेर
मुख्यमंत्री तो बेशक बन गए नीकु पर अब पहले जैसी धमक कहां? बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार पुराने वक्त को याद जरूर करते होंगे। उनके पहले जैसे दिन अब नहीं हैं। बिहार में राज्यसभा की पांच और विधान परिषद की सात सीटों के लिए चुनाव हो रहा है। जो सीटें राज्यसभा में खाली हो रही हैं, पांचों ही नीतीश की जद (एकी)के कब्जे में थीं। अब दो पर संतोष करना पड़ रहा है। यानी तीन सीट का घाटा हो गया। उनमें भी दो सहयोगी राजद के पास जा रही हैं। यही सोच कर मन बहला लेंगे कि अपने पास दो और दो चार सीटें आ रही हैं। लालू भी सगे न सही पर सियासी बड़े भाई तो हैं ही।

तकलीफ यह देख कर हो रही होगी कि एक सीट भाजपा के पास जा रही है। इसी तरह विधानसभा की खाली हुई सात में से पहले नीकु के पास तीन सीटें थीं। अब दो ही आ रही हैं उनके हिस्से में। दो लालू यादव के पास जा रही हैं और एक कांग्रेस के खाते में। राजद को नफा हुआ न नुकसान। पहले भी उसकी दो ही सीटें थीं। बस फायदा तो कांग्रेस को हो गया।

भाजपा की हालत भी जस की तस है। पहले भी दो सीटें थीं और अब भी दो ही मिलेंगी। लालू का चेहरा देखकर नीकु भले मुस्कराते हैं पर उनके करीबी तो अफसोस ही जता रहे हैं। हर सदन में जद (एकी) की ताकत घट रही है। विधानसभा से ही हो गई शुरुआत। वहां पहले जैसी ताकत बची होती तो घाटा क्यों उठाना पड़ता।


दलित बेचारे
जीतन राम मांझी की पहचान बिहार में पूर्व मुख्यमंत्री से ज्यादा पुराने दलित नेता के नाते रही है। कांग्रेस, राजद और जद (एकी) में रहे। पिछले विधानसभा चुनाव से पहले अपनी अलग पार्टी हिंदुस्तान आवाम मोर्चा सेकुलर खड़ी कर दिखाई। जब जद (एकी) में थे तो संकट से घिरे नीतीश कुमार ने उन्हें अपना सिंहासन सौंपा था। खूब श्रेय मिला था उन्हें इस फैसले के चलते। लेकिन उन्हीं मांझी को बाद में नीतीश ने कुर्सी छोड़ने को मजबूर भी कर दिया। इसे मांझी ने दलितों को भुनाने की सियासत बताया था। अपने अपमान को दलितों का अपमान माना था।

फिलहाल मांझी की पीड़ा दूसरी है। सूबे में राज्यसभा की पांच और विधान परिषद की सात सीटों का चुनाव हो रहा है। उन्हें अफसोस है कि किसी भी पार्टी ने दलित को अपना उम्मीदवार नहीं बनाया। बनाता भी क्यों? घड़ियाली आंसू ही तो बहाते हैं सब दलितों के हित में। किसी को अपनी और अपने परिवार की फिक्र थी तो किसी को अपना मान-सम्मान बचाने की। किसी को धन्नासेठ को स्थापित करना था। ऐसे में दलित को कौन सम्मान देता।

मांझी तो अब अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे हैं। दूसरे दलितों का क्या भला करें? समझ गए हैं कि दूसरों की मदद के बिना दलित नेता कुछ नहीं हासिल कर सकते सियासत में। अच्छा होता कि मायावती से सबक लेते। जिन्होंने दूसरों को अपनी मदद के लिए मजबूर कर देश के सबसे बड़े सूबे का राजकाज चार बार संभालने का कीर्तिमान कायम कर दिखाया।


हसरत बड़े फलक की
पश्चिम बंगाल तो जमीन है दीदी की। पर उड़ने के लिए तो आसमान चाहिए। वह तो दिल्ली आकर ही मिलता है। यकीनन राष्ट्रीय राजनीति में अपनी अहमियत बढ़ाने का संकेत ममता बनर्जी ने विधानसभा चुनाव से पहले यों ही नहीं दिया था। नजर तो उनकी भी दूसरे क्षत्रपों की तरह दिल्ली की गद्दी पर ही टिकी होगी। संयुक्त मोर्चे की सरकार ने राह दिखा दी।

कर्नाटक के गुमनाम मुख्यमंत्री एचडी देवगौड़ा को देश का प्रधानमंत्री पद मिला तो बाकी क्षत्रप तो फिर भी उनसे ज्यादा ही सक्रिय रहे हैं देश के सियासी फलक पर। नीतीश कुमार और मुलायम सिंह यह हसरत पाल सकते हैं तो भला ममता क्यों नहीं? चुनाव सुधारों पर राष्ट्रीय बहस की मांग यों ही नहीं उठाई है। नई विधानसभा में अपने पहले ही संबोधन में राष्ट्रीय एजंडा तय कर दिया। चुनाव सुधारों, वित्तीय सुधारों और चुनाव लड़ने के लिए सरकारी खजाने से धन देने जैसे मुद्दों पर बहस की जरूरत प्रतिपादित कर दी। सुझाव नया नहीं है। दूसरे चिंतक और विचारक भी मानते आए हैं कि सरकारी खजाने से चुनावी खर्च मिलने लगेगा तो चुनाव में कालेधन के इस्तेमाल पर किसी हद तक अंकुश लग जाएगा।

चुनाव आयोग पर भी ममता ने परोक्ष रूप से हमला बोल दिया। फरमाया कि लोकतंत्र के उत्सव का मकसद तभी चरितार्थ हो सकता है जब तमाम लोग इसमें खुलकर शिरकत कर सकें। कर्फ्यू लगा कर भला इस मकसद को कैसे हासिल किया जा सकता है? इस बार विधानसभा चुनाव से पहले से ही चुनाव आयोग के साथ ममता के रिश्तों में तल्खी सारी सीमाएं लांघ गईं। चुनाव के दौरान भी खूब हमला कर रही थीं ममता और चुनाव निपटा तो भी दूर नहीं हुआ उनका गिला-शिकवा। पर करीबी बताते हैं कि ममता की निगाह अब अगले लोकसभा चुुनाव पर है।

भाजपा का विकल्प तैयार करने की चिंता नीतीश से कम उन्हें भी नहीं लगतीं। तभी तो अपने शपथ ग्रहण समारोह में चुन-चुन कर समान विचारधारा वाले दलों के नेताओं को न्योता भेजा था। राजद के मुखिया लालू यादव इस मौके पर संघीय मोर्चे की वकालत कर ममता के मन की बात कह भी तो आए।


धोबीपाट संघी का
ओम प्रकाश माथुर के राज्यसभा उम्मीदवार बनते ही राजस्थान में भाजपा के समीकरण अचानक बिगड़ गए। आरएसएस के प्रचारक हैं माथुर। फिलहाल भाजपा के उपाध्यक्ष हैं और इसी नाते देश के सबसे बड़े सूबे यूपी के प्रभारी भी। गुजरात के प्रभारी थे तो नरेंद्र मोदी से मधुर रिश्ते थे उनके। पर अपने सूबे राजस्थान में तो मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे से छत्तीस का ही आंकड़ा माना जाता है माथुर का।

यों कोई मानने को तैयार नहीं कि उनके नाम पर अमित शाह ने वसुंधरा की सहमति न ली हो। पर वसुंधरा खुलकर विरोध करती भी कैसे-मोदी और अमित शाह के फरमान का। वसुंधरा के करीबी पार्टी के सूबेदार अशोक परनामी ने तो चुप्पी ही साध ली। अलबत्ता स्वास्थ्य मंत्री राजेंद्र राठौड़ ने न केवल माथुर को सबसे पहले बधाई दी बल्कि विधायक दल की बैठक में भी उनकी तारीफ में जमकर कसीदे पढ़े।

राजनीति में रिश्ते कभी एक जैसे नहीं रहते। राठौड़ कभी वसुंधरा की आंख के तारे बन गए थे। अब भाव नहीं मिल रहा तो दूसरे खेमे से नजदीकी क्यों न बढ़ाएं। वसुंधरा विरोधियों को ओम माथुर का कद्दावर बन कर उभरना राहत की सांस देगा। आलाकमान ने राजस्थान के चार उम्मीदवारों में से इकलौते बाहरी वेंकैया नायडू को थोपा। बाकी तीनों तो राजस्थानी ही ठहरे। चार में से दो तो फिर भी वसुंधरा अपनी पसंद के ले ही आईं।

डूंगरपुर के राजघराने से जुड़े हर्षवर्धन सिंह बड़े होटल कारोबारी हैं तो दूसरे राम कुमार वर्मा बैंक के अफसर रहे हैं और दलित हैं। दोनों का ही पार्टी से कोई लेना-देना नहीं रहा। तभी तो संघी खेमा हैरान है। पर माथुर को राज्यसभा भेजने की इस खेमे की हसरत तो पूरी हो ही गई। राजस्थान में संगठन मंत्री भी रहे हैं माथुर और पार्टी के सूबेदार भी। इसीलिए उनकी गणेश परिक्रमा करने वालों की भी कमी नहीं। नामजदगी के वक्त यह दिख भी गया। हैरानी की बात तो यह रही कि जमावड़े में वसुंधरा समर्थक भी कम नहीं थे।


राजा का बाजा
आखिर वीसी फारका हिमाचल के मुख्य सचिव बन ही गए। कम विरोध नहीं था उन्हें सूबे की नौकरशाही का मुखिया बनाने के प्रस्ताव का। लेकिन मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह ने किसी की परवाह नहीं की। उलटे विनीत चौधरी, उपमा चौधरी, अजय मित्तल, आशाराम सिहाग और दीपक सानन की वरिष्ठता को लांघ कर सौंप दिया उन्हें सबसे बड़ा ओहदा। जिनकी अनदेखी हुई उनमें कुछ तो डेपुटेशन पर केंद्र सरकार की सेवा कर रहे हैं।

फारका को मुख्यमंत्री से नजदीकी का फायदा तो मिला ही, साफ-सुथरी छवि भी कारगर साबित हुई। जो फारका के मातहत काम करने को अपनी तौहीन बता रहे थे वे छुट्टी पर चले गए हैं। फारका से ज्यादा वरिष्ठता वाले कुछ अफसरों को तो भाजपा का करीबी होना नुकसानदेह साबित हुआ। पी मित्रा की जगह ली है फारका ने। पूर्व पुलिस महानिदेशक आइडी भंडारी ने पानी पी-पीकर कोसा था मित्रा को। रिटायर होने पर भी पौबारह हो गई उनकी।

वीरभद्र सिंह ने अपने चहेते मित्रा को सूबे का स्थानिक चुनाव आयुक्त बना दिया। टीजी नेगी की जगह मिल गया मित्रा को यह संवैधानिक ओहदा। नेगी की भी लाटरी खुल गई है। उन्हें वीरभद्र ने अपना प्रधान सलाहकार बना लिया है। प्रमुख सचिव वाला जिम्मा सौंपा उन्हें। बुजुर्गों ने ठीक ही फरमाया है कि जो सत्ता के करीबी होते हैं, मलाई वे ही खाते हैं।


अथ श्री धूमल कथा
पूर्व मुख्यमंत्री प्रेम कुमार धूमल को अब अपनी ही पार्टी के भीतर से चुनौती मिलने लगी है। नितिन गडकरी अपने मंत्रिमंडल सहयोगी जगत प्रकाश नड्डा को लेकर सूबे में आ धमके। रविवार को रैलियों का जो सिलसिला शुरू किया वह सोमवार को भी जारी रहेगा। कहने को धूमल भी शिरकत कर रहे हैं इन रैलियों में। मोदी सरकार के दो साल के कामकाज की उपलब्धियों का बखान करना है गडकरी और नड्डा का एजंडा।

इसी से अटकलें तेज हो गईं कि धूमल को अब सूबे की सियासत से वनवास देने की तैयारी है। राज्यपाल का पद थमाया जा सकता है उनको। लगातार पांचवी बार एक ही नेता को मुख्यमंत्री के तौर पर पेश करने के पक्ष में नहीं है आरएसएस का खेमा। नए नेतृत्व को उभारना भी जरूरी है। जगत प्रकाश नड्डा संघ और पार्टी आलाकमान दोनों की पसंद बन कर उभरे हैं।

नड्डा अगर केंद्र से सूबे की सियासत में वापसी को रजामंद नहीं हुए तो जयराम ठाकुर और सतपाल सिंह सत्ती में से किसी एक को आगे बढ़ाएगा आला कमान। ठाकुर मंत्री तो रहे ही हैं पार्टी के सूबेदार भी रह चुके हैं। नड्डा से निकटता भी जगजाहिर है उनकी। जबकि सत्ती थोड़े उस्ताद हैं। दोनों ही नेताओं के साथ समान दूरी बरकरार रखी है। हालांकि इस बार सूबेदारी मिलने के बाद से धूमल से खफा बताए जा रहे हैं। असली वजह तो वे ही जाने पर चर्चा यही है कि सूबेदारी पर नजर धूमल की भी थी।

कुर्सी तो जरूर बचा ली पर मुश्किलें पहले से कई गुना बढ़ गई हैं उत्तराखंड के मुख्यमंत्री हरीश रावत की। जिसे देखो वही दबाव में लेने पर आमादा है। यहां तक कि उनके मंत्रिमंडल के सहयोगी और भरोसेमंद पार्टी सूबेदार भी अब उन्हें आंखें दिखाने लगे हैं। राज्यसभा की इकलौती सीट को लेकर खूब घमासान हुआ। तरुण विजय का कार्यकाल पूरा हो जाने के चलते खाली हुई है यह सीट। किशोर उपाध्याय विधानसभा चुनाव हार गए थे। सो राज्यसभा पहुंचने की हसरत पाल बैठे। लेकिन हरीश रावत भला किसी दूसरे नेता को ताकतवर क्यों होने देते।

दलित कार्ड खेलते हुए प्रदीप टमटा का नाम आगे बढ़ा दिया। इससे उनके मंत्रिमंडलीय दलित सहयोगी यशपाल आर्य रूठ गए। उनकी जगह दूसरे किसी दलित नेता को पार्टी में तरजीह मिले, वह भी चुनाव हार चुके नेता को तो भला वे मुंह क्यों न फुलाते। मंत्री पद से इस्तीफा भेज दिया। भाजपा में शामिल होने की धमकी अलग दे डाली। हरीश रावत की हालत पतली हुई। आनन-फानन में सहयोगी मंत्री प्रीतम सिंह को सरकारी उड़न खटोले से हल्द्वानी भेजा।

मिन्नतें कर आर्य को देहरादून बुलवाया। अपने जिले ऊधम सिंह नगर में अपनी पसंद के कलेक्टर और पुलिस कप्तान की तैनाती की शर्त पर ही नाराजगी दूर की आर्य ने अपनी। उधर प्रदीप टमटा को उम्मीदवार बनाने पर पीडीएफ के विधायक रूठ गए। उन्होंने दिनेश धनै को अपनी तरफ से उम्मीदवार घोषित कर अपने समर्थन की एवज में कांग्रेस का समर्थन मांग लिया। धनै ने धमकी भी दे डाली कि वे किशोर उपाध्याय को किसी कीमत पर बर्दाश्त नहीं करेंगे।

इसी से इस अटकल को बल मिला कि पीडीपी के विधायकों के खेल के खिलाड़ी तो हरीश रावत थे। बहरहाल भाजपा ने सत्तारूढ़ खेमे की फूट का फायदा उठाने के लिए अनिल गोयल और गीता ठाकुर दोनों निर्दलियों से नामांकन करा दिया। दोनों में ऐसी तकरार हुई कि कोई नाम वापस लेने को रजामंद नहीं दिखा। इससे हरीश रावत ने राहत की सांस ली होगी। अब कांग्रेस के प्रदीप टमटा के मुकाबले एक के बजाए दो निर्दलीय हैं मैदान में। भाजपा किसका साथ देगी पता नहीं। दोनों ही तो उसके अपने ठहरे।


अंतर्कलह
पंजाब में सत्ता में है अकाली दल। संगठन से लेकर सरकार तक में पूरी धाक है बादल परिवार की। लेकिन विधानसभा चुनाव करीब है और अकाली दल को राजनीतिक रूप से कठिन पिच पर चुनावी बल्लेबाजी करने की संभावना दिख रही है तो बागी सुर भी उभरने लगे हैं। पार्टी से जुड़े मुद्दों को मीडिया की बजाय पार्टी मंच पर रखने की चेतावनी दे चुके हैं मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल। बेशक यह चेतावनी बेअसर ही साबित हो रही है। करतारपुर हलके में दल का एक धड़ा खुलेआम केबिनेट मंत्री अजीत कोहाड़ का विरोध कर रहा है।

आरोप है कि कोहाड़ दल के लिए काम करने वालों को दरकिनार करने और अपनों को पदाधिकारी बनाने में जुटे हैं। लंबड़ा क्षेत्र में विरोध के ऐसे होर्डिंग्स लगे जिन में कोहाड़ से अपने खास समर्थकों को पदाधिकारी बनाने पर सवाल पूछे गए हैं। शिअद के सर्किल अध्यक्ष गुरदयाल सिंह की नियुक्ति का कुछ लोग विरोध कर रहे हैं। करतारपुर हलके का प्रतिनिधित्व पूर्व मंत्री और पार्टी विधायक स्वर्णसिंह फिल्लौर करते हैं। विरोध का स्वर बुलंद करने वालों में उनके बेटे दमनवीर प्रमुख हैं। जो दोआबा क्षेत्र में युवा शिअद के उपाध्यक्ष भी हैं।

दमनवीर फरमाते हैं कि कोहाड़ ऐसे लोगों को पार्टी संगठन में अहम पद दे रहे हैं जिनका अरसे से पार्टी से कोई नाता नहीं रहा। जबकि निष्ठावान और कर्मठ कार्यकर्ताओं की उपेक्षा हो रही है। जवाब में कोहाड़ समर्थकों ने दल से जुड़े मामलों को मीडिया के माध्यम से प्रचारित करने को गलत बता इसकी निंदा की है। पार्टी विरोधी गतिविधियों के चलते विधानसभा चुनाव में फिल्लौर को टिकट न देने की दलील भी दी है इस खेमे ने। ऊपर से यह धमकी अलग कि वे पार्टी के शीर्ष नेताओं को देंगे हालात का ब्योरा।


मंत्री बेमिसाल
अतर सिंह आर्य मध्यप्रदेश के श्रम मंत्री हैं। सेंधवा के नादिया गांव से वन बचाओ वृक्ष लगाओ योजना शुरू की थी उन्होंने पर हरियाली बचाने की नसीहत का अंदाज निराला था। भरी दुपहरी में पंडाल में बैठे लोग जम्हाई लेने लगे तो आर्य ने मंच पर एक लोटे में पानी और एक तौलिया मंगवाया। लोटे का पानी चिकने घड़े जैसी अपनी चांद पर डलवा कर तौलिए से पोंछा। चांद पर बाल होते तो तौलिया गीला भी होता। फिर घने बालों वाले एक आदमी को मंच पर बुलाया।

उसके सिर पर भी वही प्रयोग दोहराया गया। लेकिन उसका तौलिया गीला निकला। मंच पर मौजूद लोगों से मंत्री ने दोनों तौलिए निचोड़ने को कहा। पहला सूखा था और दूसरा गीला। फिर शुरू हुआ मंत्री का उपदेश। फरमाया कि पेड़ नहीं लगाओगे तो हालत मेरी चांद जैसी हो जाएगी। मेरे सिर पर बाल नहीं होने के कारण ही तो नहीं ठहरा पानी। सारा बेकार बह गया। इसी तरह जहां पेड़ नहीं होते, वहां न अच्छी बारिश होती है और न धरती में पानी ही ठहरता है।

इस बीच रविवार को विश्व पर्यावरण दिवस को दमोह से 45 किलोमीटर दूर जेवरी गांव में साढ़े चार हजार साल पुराने एक कल्पवृक्ष की पहचान जगत गुरु शंकराचार्य आत्मानंद सरस्वती ने कर दी। बुंदेलखंड में अब ऐसे छह पेड़ चिन्हित हो चुके हैं। देवरी और आसपास के लोग अब कल्पवृक्ष की पूजा कर रहे हैं। खास बात यह है कि कल्पवृक्ष केवल अफ्रीका, आस्ट्रेलिया और भारतीय महाद्वीप के तेरह देशों में ही मिलता है।


सूझबूझ का अंजाम
प्याज के किसान तो वाकई बर्बाद हो गए इस बार मध्यप्रदेश में। मजबूरी में सड़क पर फेंकनी पड़ी उन्हें अपनी खून-पसीने से उगाई फसल। इस तबाही का मीडिया में हल्ला मचा तो सरकार ने समर्थन मूल्य पर खुद खरीदारी शुरू कर दी। एक जून को मुख्यमंत्री ने ग्रामोदय से भारत उदय अभियान का समापन प्याज की छह रुपए किलो के भाव खरीदारी के एलान से ही किया। अन्यथा मंडियों में तो किसान को एक-डेढ़ रुपए से ज्यादा भाव मिल ही नहीं रहा था।

उसमें भी मंडी शुल्क, आढ़ती का कमीशन, तुलाई और ढुलाई का खर्च काटने के बाद अठन्नी किलो ही मिल रहा था हथेली पर। 39 जिलों में 71 खरीद केंद्रों पर सरकार ने खरीद शुरू की तो बाजार में भी फौरन दिखा असर। अब तो आठ-दस रुपए किलो तक हो गया है प्याज का भाव। 30 जून तक करेगी सरकार प्याज की खरीद। राज्य सरकारी विपणन संघ को जिम्मा सौंपा है शिवराज चौहान ने। पचास करोड़ रुपए के बजट के साथ शुरू की गई इस पहल ने बचा लिया सूबे के प्याज किसानों को। अपनी ऐसी ही सूझबूझ और सरोकार से किसानों के प्रिय नेता बन गए हैं चौहान।

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