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राजपाट: नीतीश कुमार के दोनों हाथों में आ गए लड्डू

एक जमाने में समाजवादी सरकारी पद और पार्टी के पद दोनों को एक साथ रखना अच्छा नहीं मानते थे। एक व्यक्ति-एक पद की दुहाई देते थे। पर अब वह दौर लौट कर आने से रहा।
Author October 10, 2016 09:22 am
बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार (FILE PHOTO)

नीकु के अच्छे दिन आ रहे हैं। नीकु यानी बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार। अपनी पार्टी जनता दल (एकी) के फिर अध्यक्ष चुन लिए गए। दूसरे किसी नेता ने पर्चा ही नहीं भरा। किसी की हिम्मत भी कैसे होती। उनका निर्विरोध चुना जाना पहले ही तय हो गया था। इससे समर्थकों ने हवा बनाई है कि पार्टी में नीकु के प्रति आस्था बढ़ी है। उन्हें कौन याद दिलाए कि एक जमाने में समाजवादी सरकारी पद और पार्टी के पद दोनों को एक साथ रखना अच्छा नहीं मानते थे। एक व्यक्ति-एक पद की दुहाई देते थे। पर अब वह दौर लौट कर आने से रहा। अब तो हर पार्टी में अंदरुनी लोकतंत्र खत्म हो रहा है। दबंगई और तानाशाही की व्यवस्था को ही लोकतंत्र के नाते पेश किया और देखा जाने लगा है। अगर राष्ट्रीय पार्टियों का यह हाल है तो जद (एकी) में तो ऐसा होना स्वाभाविक ही है। नीतीश के ही अपने जिले नालंदा के राजगीर में पार्टी की राष्ट्रीय परिषद की बैठक 16 अक्तूबर को बुलाई गई है। दो दिन चलने वाली इसी बैठक में नीकु के दोबारा अध्यक्ष चुने जाने पर आखिरी मुहर लग जाएगी। बस रस्म अदायगी समझिए। उधर, मुख्यमंत्री के नाते अपने शराबबंदी के फैसले को ज्यादा कारगर और कड़ाई से लागू करने के लिए नीकु ने कुछ कानूनी बदलाव किए थे। पर पिछले दिनों पटना हाईकोर्ट ने उन्हें खारिज कर दिया। विरोधियों ने इसे नीकु के लिए करारा झटका बताकर उनकी खिल्ली उड़ाने की कोशिश की। पर नीकु भी किसी से कम नहीं। दोबारा मंत्रिमंडल की बैठक बुला हाईकोर्ट की आपत्तियों के मद्देनजर नया कानून बना दिया। दो अक्तूबर यानी गांधी जयंती के दिन उसे लागू भी कर दिया। इस तरह हाईकोर्ट के आदेश का एक दिन भी असर नहीं होने दिया। इतना ही नहीं हाईकोर्ट के आदेश को सुप्रीम कोर्ट में भी चुनौती दे डाली। किस्मत के धनी निकले। पटना हाईकोर्ट के आदेश पर सुप्रीम कोर्ट ने रोक भी लगा दी। इस तरह नीकु के दोनों हाथों में लड्डू आ गए।

बाबा का छक्का

बिहार में एक खांटी समाजवादी हैं-बाबा। यह उनका असली नाम नहीं है। पर वे चर्चित इसी से हैं। उनके पिता भी कद्दावर समाजवादी नेता थे। बाबा इन दिनों किसी पार्टी में नहीं हैं। हालांकि सियासत का अनुभव लालू और नीतीश से ज्यादा ही होगा। पिछले दिनों वे जद (एकी) के राज्यसभा सदस्य थे। नीतीश के साथ रहने का इनाम थी उनकी यह हैसियत। हालांकि वे पहले लालू के प्रबल समर्थक थे। उनकी पार्टी राजद के बडेÞ नेताओं में होती थी गिनती। लालू की सरकार में मंत्री भी थे। पर एक बड़ी खासियत भी है बाबा की। साथ किसी के भी रहें पर जिस बात को अहम समझ लेते हैं, उठाने से चूकते नहीं। बेशक कुछ भी खमियाजा क्यों न भुगतना पड़े। पिछले दिनों मीडिया में एक खबर आई। बाबा ने नीकु को सलाह दे डाली कि वे कश्मीर की समस्या पर भी गौर करें। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर दबाव बनाएं। इस समस्या का समाधान जरूरी है। दरअसल, नीतीश ने सेना द्वारा केंद्र सरकार की स्वीकृति के बाद पीओके में की गई सैनिक कार्रवाई का समर्थन किया है। बाबा ने नीतीश के इस कदम को स्वागत योग्य बताया है। नीतीश को कश्मीर समस्या पर गौर करने और समाधान के लिए केंद्र पर दबाव बनाने की सलाह बाबा के अलावा किसी ने नहीं दी। पाठकों को बता दें कि ये बाबा कोई साधू-संत नहीं बल्कि शिवानंद तिवारी ठहरे।

वजूद पर संकट

पश्चिम बंगाल की सियासत भी अनूठे दौर से गुजर रही है। तृणमूल कांग्रेस का सूबे में डंका बज रहा है। तभी तो कांग्रेस और माकपा दोनों ही पार्टियों में खलबली है। दोनों के नेता ही नहीं कार्यकर्ता भी तृणमूल कांग्रेस में जाने को बेताब हैं। बेताब क्या होड़ सी लगी है उनमें ममता का समर्थक बनने की। विधानसभा चुनाव के बाद यह भगदड़ तेज हुई है। कांग्रेस के सूबेदार रहे मानस भुइंया भी तृणमूल कांग्रेस के दुर्ग में घुस गए। कांग्रेस और माकपा का शिखर नेतृत्व इस बदलाव से हैरान है। विधानसभा चुनाव की हार के बाद संगठन की मजबूती के लिए मंथन शुरू हुआ था। पर उपाय तलाश कर लागू किए जाते इससे पहले ही बची-खुची जमीन भी पैरों तले से खिसकने लगी। मुख्यमंत्री के भतीजे सांसद अभिषेक बनर्जी का तो यहां तक दावा है कि अगले कुछ महीने बीतने दीजिए, विपक्ष का वजूद भी नजर नहीें आएगा। कांग्रेस के अब तक पांच और माकपा का एक विधायक तृणमूल कांग्रेस में आ चुका है। नतीजन विपक्ष के पास अब 76 के बजाय 70 विधायक ही बचे हैं। ऊपर से ममता की पार्टी के उपाध्यक्ष मुकुल राय ने फरमाया है कि अभी दोनों दलों के और भी कई विधायक उनके संपर्क में हैं। ममता के नेतृत्व में हो रहे विकास का वे हिस्सा बनना चाहते हैं। हैरानी की बात तो यह है कि एक भी दलबदलू विधायक ने अभी तक अपने पद से इस्तीफा नहीं दिया हैै। कांग्रेस और माकपा का नेतृत्व भी दुविधा में हैं। कार्रवाई करे या न करें। काश वे समझ जाएं कि इस पलायन पर काबू नहीं किया तो सूपड़ा साफ हो जाएगा उनका।

कुनबे का कलह

सूबा छोटा है तो क्या नेताओं में कलह तो बड़े सूबे से भी बड़ी है। बात हम उत्तराखंड की कर रहे हैं। भाजपा के क्षत्रपों की आपसी रार थमने का नाम ही नहीं ले रही। कपास न सूत, जुलाहों में लठ्ठम लठ्ठा वाली हालत है पार्टी की। अभी तो चुनाव का एलान तक नहीं हुआ, पर हर नेता मुख्यमंत्री पद का ख्वाब देख रहा है। रुड़की में पार्टी की प्रदेश कार्य समिति की बैठक भी गुटबाजी से बच नहीं पाई। दो पूर्व मुख्यमंत्रियों भगत सिंह कोश्यारी और भुवनचंद खंड़ूड़ी ने आलाकमान के दूतों को खूब खरी खोटी सुनाई। खंड़ूड़ी तो अपने भाषण में पार्टी के नेताओं को नसीहत देने से भी नहीं हिचके। फरमाया कि अगर इस बार हरीश रावत को सत्ता से हटाने में नाकाम रहे तो ब्रह्महत्या का पाप लगेगा उन्हें। कोश्यारी के निशाने पर केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जगत प्रकाश नड़डा आ गए। उन्हें ही सूबे का चुनाव प्रभारी बनाया है अमित शाह ने। कोश्यारी संघ के प्रचारक थे। फिर सियासत में आए। अपनी ईमानदारी और वफादारी को लेकर इठलाते हैं। पर उनके तेवर नड्डा को अटपटे लगे। तभी तो नड्डा दूसरे दिन बैठक में गए ही नहीं। वे तो बंद कमरे में हरक सिंह रावत और सुबोध उनियाल से ही बतियाते रहे। ये दोनों कांग्रेस छोड़ भाजपा में आए हैं। सतपाल महाराज भी नाराज ही दिखे। तभी तो न भाषण दिया और न मंच पर बैठे। हां, बैठक में पिछली कतार में मौजूद जरूर रहे। कोश्यारी, खंड़ूड़ी और सतपाल महाराज इसी तरह मुंह फुलाए घूमते रहे तो चुनाव में महंगी पड़ सकती है उनकी नाराजगी। आलाकमान तो जान ही चुका है कि उत्तराखंड के उसके नेता झगड़ालू ठहरे। वे एक दूसरे की सिर फुटव्वल से बाज आएंगे नहीं। तभी तो कांग्रेस का सूपड़ा साफ कर देने वाले सूबे से किसी को मंत्री बनाना जरूरी नहीं समझा मोदी ने।
सहारा नड्डा का

कभी प्रेम कुमार धूमल के हनुमान कहलाते थे राकेश पठानिया। कांगड़ा के पूर्व विधायक ठहरे। तभी तो अपने बुजुर्ग नेता शांता कुमार से कभी पटी नहीं। लेकिन धूमल का वरदहस्त रहा सो नैया पार लगती ही रही। यह बात अलग है कि धूमल भी रूठ गए उनसे। ऐसे में ले-देकर आशा के केंद्र बचे जगत प्रकाश नड्डा। सो उन्हीं का दामन थाम लिया। अपने इलाके में नड्डा की एक रैली भी करा दी। रही उनसे धूमल की नाराजगी की बात तो वह बेवजह नहीं। कुछ दिन पहले बीसीसीआइ के खिलाफ प्रेस कांफ्रेंस कर बैठे थे। इसका मतलब तो यही हुआ कि उन्होंने वार धूमल के सांसद पुत्र अनुराग ठाकुर पर किया। धूमल को भला क्यों न अखरता। लिहाजा कांगड़ा में पार्टी की मंडलीय समिति से पठानिया के खिलाफ प्रस्ताव पास हो गया। हुआ क्या, धूमल ने करा दिया। यही कि पठानिया को पार्टी से बाहर किया जाए। पर नड्डा की रैली करा पठानिया ने उनका दिल जीत लिया। सो पार्टी की प्रदेश कार्यसमिति में जगह भी पा गए। यह तो एक तरह से झटका हो गया धूमल के लिए। खासियत यह है कि नड्डा ने पहली बार अपने किसी चहेते की इस तरह पीठ थपथपाई। इसे बदलते सियासी समीकरणों की बानगी के रूप में देख रहे भाई लोग। तो क्या सचमुच नड्डा अब मुख्यमंत्री पद का ख्वाब पाल चुके हैं। पठानिया को तरजीह दिए जाने का निहितार्थ तो यही है कि धूमल और शांता के खेमों से मुक्त पठानिया जैसे लोगों की जरूरत उन्हें मुख्यमंत्री पद की अपनी हसरत को पूरा करने के लिए ही पड़ी होगी।

सोफ्त का ठौर

आम आदमी पार्टी ने हिमाचल का मोह छोड़ा नहीं है। अब महेंद्र नाथ सोफ्त मिल गए हैं उसे। कभी शांता कुमार के करीबी थे। उनकी सरकार में ताकतवर मंत्री की हैसियत भी पाई थी। पर जैसे ही नरेंद्र मोदी भाजपा के राष्ट्रीय सचिव के नाते हिमाचल के प्रभारी बने, धूमल ने शांता समर्थकों को हाशिए पर पहुंचा दिया। सोलन के सोफ्त भी उसी का शिकार हुए। एक बार अपनी हार को सुप्रीम कोर्ट तक ले गए थे। कम अंतर से हुई थी विधानसभा चुनाव में उनकी हार। सुप्रीम कोर्ट ने सोलन का चुनाव दोबारा कराने का आदेश भी दे दिया था। पर किस्मत ने धोखा दे दिया। भाजपा ने उन्हें टिकट ही नहीं दिया। हालांकि सोफ्त की तब हवा थी। निर्दलीय लड़ जाते तो भी जीत सकते थे। पर अपने नेता शांता कुमार के समझाने पर पार्टी से बगावत नहीं की। हालांकि धूमल ने उसके बाद कभी उन्हें उभरने भी नहीं दिया। सो मौका मिलते ही वे महेश्वर सिंह के साथ हिमाचल लोकहित पार्टी में चले गए। आजकल तो महेश्वर भाजपा में हैं। सोफ्त फिर भी नहीं छुपे। भाजपा में वापसी के बजाए समर्थकों सहित अरविंद केजरीवाल की पार्टी को चुन लिया। कुछ समर्थकों ने सोशल मीडिया पर उनके इस फैसले की आलोचना भी की। पर उसी मीडिया पर सोफ्त ने जवाब दे दिया कि आने वाले दिनों में वे साबित कर देंगे कि आम आदमी पार्टी में जाने का उनका फैसला सही था।

सिद्धू का तिलिस्म

नित नए सियासी घटनाक्रम दिख रहे हैं पंजाब में। अब नवजोत कौर सिद्धू के भाजपा से इस्तीफे की घटना सामने आ गई। अमृतसर के तीन बार लोकसभा सदस्य रह चुके क्रिकेट खिलाड़ी नवजोत सिद्धू की पत्नी हैं वे। न केवल भाजपा की विधायक हैं बल्कि प्रकाश सिंह बादल की सरकार में संसदीय सचिव का ओहदा भी था उनका। इस्तीफे के एलान के वक्त ही मोतरमा ने फरमाया कि नए दल में जाएंगी। पर यह खुलासा जानबूझ कर नहीं किया कि वह दल आखिर कौन सा है। तो भी सियासत में कयास तो शुरू हो ही जाते हैं। कभी अरविंद केजरीवाल की पार्टी में जाना तय दिख रहा था मियां बीबी का। लेकिन बात बन नहीं पाई तो सिद्धू ने गैरराजनीतिक मोर्चा बना लिया। हद तो तब हो गई जब दिल्ली में सिद्धू की कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी से गुप्त मुलाकात की खबर फैली। सिद्धू दंपत्ति तय ही नहीं कर पा रहे कि जाएं तो जाएं कहां? कांग्रेस में जाएंगे तो वहां भी मुख्यमंत्री का पद तो मिलने से रहा। शायद कुर्सी के फेर में ही केजरीवाल के साथ भी बात नहीं बनी। बेशक करीबियों ने तो दंपत्ति को यही समझाया है कि मौजूदा हालात में उनके लिए सबसे बेहतर विकल्प कांग्रेस ही है। आम आदमी पार्टी के भीतर तो पहले ही सिर फुटव्वल चल रही है। अटकल तो यह भी लग रही है कि राहुल गांधी ने पिछले दिनों कैप्टन अमरिंदर को दिल्ली बुलाया था तो चर्चा सिद्धू दंपत्ति के पार्टी में दाखिले को लेकर ही हुई। रही बात परगट सिंह और दो निर्दलीय विधायकों की तो वे सब अभी तक तो सिद्धू के पीछे हैं। हफ्ते दस दिन के भीतर तो खोलने ही पड़ेंगे सिद्धू को अपने पत्ते।

घर की आग

गुजरात को लेकर प्रधानमंत्री की चिंता बढ़ी है। आनंदी बेन पटेल को हटाने से समस्या का समाधान हो गया हो, ऐसा नहीं है। इसी वजह से चौकस भी हुए हैं अपने गृहराज्य को लेकर वे। विजय रूपाणी को अमित शाह ने मुख्यमंत्री तो जरूर बनवा दिया, पर वे पटेल समुदाय को भाजपा के पक्ष में कर पाएंगे, इसमें अब मोदी को संदेह है। राजकोट में जिस तरह रूपाणी और अमित शाह को सभा बीच में छोड़ कर भागना पड़ा था, उस घटनाक्रम ने प्रधानमंत्री की बेचैनी बढ़ाई है। तभी तो वे अब गुजरात के उप मुख्यमंत्री नितिन पटेल को भी अहमियत दे रहे हैं। पिछले दिनों सूबे के विकास की बाबत मुख्यमंत्री से चर्चा में उपमुख्यमंत्री को न देख प्रधानमंत्री ने बैठक टाल दी थी। बाद में दोनों आए तभी हुई चर्चा। गुजरात में भी बात फैल गई। खासकर उस कैबिनेट बैठक के बाद जिसमें उपमुख्यमंत्री के लिए भी मुख्यमंत्री जैसी ही कुर्सी की व्यवस्था दिखी। तो क्या मोदी इसे अमित शाह का गलत फैसला मान रहे हैं। जो भी हो आनंदी बेन पटेल को लेकर विजय रूपाणी के शिकवे शिकायत बरकरार हैं। जिन्होंने मुख्यमंत्री पद भले छोड़ दिया हो पर सक्रिय राजनीति से अलग होने को कतई तैयार नहीं। प्रधानमंत्री ने राजकोट की घटना के बाद उन्हें दिल्ली बुलाकर मंत्रणा भी की थी। सूत्रों पर भरोसा करें तो प्रधानमंत्री ने उन्हें राज्यपाल पद की पेशकश की। पर वे तैयार नहीं हुईं। हो गई होती तो मध्यप्रदेश उनका स्वागत करता। जहां राम नरेश यादव का कार्यकाल पूरा हो जाने के बाद राजभवन गुजरात के राज्यपाल ओपी कोहली के हवाले है।

जुलाहों में लठ्ठम-लठ्ठा

राजस्थान की भाजपा सरकार की छवि खराब हो तो भला क्यों न इठलाएं कांग्रेसी। दो ही तो पार्टियां हैं दमखम वाली इस सूबे में। यों कांग्रेस खुद भी कई गुटों में बंटी है। पर भाजपा सरकार के खिलाफ माहौल बनने से फायदे में तो कांग्रेस ही रहेगी। और तो कोई विकल्प है नहीं। हालांकि आलाकमान गुटबाजी को लेकर चौकस है। पार्टी के प्रभारी महासचिव गुरुदास कामत ने गुजरात में गुटबाजी को काबू किया था। अपने पुराने अनुभव को वे राजस्थान में भी आजमाने के चक्कर में हैं। वैसे भी विधानसभा चुनाव में अभी दो साल का वक्त है। यह बात हास्यास्पद लगती है कि कांग्रेसी फिर भी अभी से कुर्सी की दौड़ में शरीक हो गए हैं। हर नेता मुख्यमंत्री पद का ख्वाब देख रहा है। सचिन पायलट, सीपी जोशी, जितेंद्र सिंह, गिरिजा व्यास और अशोक गहलोत सभी दौड़ में हैं। रही सक्रियता की बात तो अशोक गहलोत इस मोर्चे पर औरों से आगे दिख रहे हैं। वसुंधरा सरकार के खिलाफ सूबे में अभियान चला रखा है। इस मामले में कसर सूबेदार सचिन पायलट ने भी नहीं छोड़ी है। युवाओं की फौज है उनके पीछे। हां, गिरिजा और जोशी ठहरे आलाकमान के भरोसे। सूझबूझ भी तो यही कहती है। आलाकमान की मर्जी के बिना तो कांग्रेस में पत्ता भी नहीं हिलता। अशोक गहलोत को प्रभारी कामत भी अहमियत दे रहे हैं। तभी तो भोज उन्हीं के घर रखवाया। जिसमें तमाम कद्दावर नेता जुटे और पार्टी की एकता का राग अलापते रहे। भोज देने की अगली बारी सूबेदार सचिन पायलट की होगी। कामत का सोचना है कि नेता अगर लगातार एक साथ बैठते रहेंगे तो उनके मतभेद किसी हद तक तो दूर होंगे ही।

गुटबाजी बेमिसाल

कांग्रेस भी वाकई विचित्र पार्टी है। कम से कम मध्यप्रदेश में तो ऐसा ही है पार्टी का चेहरा और चरित्र। एक तरफ 2018 के विधानसभा चुनाव में सत्ता का सपना पाल रखा है तो दूसरी तरफ अंदरूनी कलह शिखर पर है। इस हद तक कि भाजपा सरकार की तमाम नाकामियों को ढक ले। सांसद ज्योतिरादित्य सिंधिया की सक्रियता ने विरोधियों को ईर्ष्या से सरोबार कर दिया है। तभी तो अंबात में उनकी गाड़ी पर काले झंडे फेंके गए। ऊपर से पार्टी के लहार के विधायक गोविंद सिंह ने कटाक्ष कर दिया। नतीजन दिग्विजय सिंह और ज्योतिरादित्य गुट आमने-सामने आ गए। पिछले दिनों भी कसा था गोविंद सिंह ने तंज। तब सिंधिया मुरैना प्रवास पर थे। गोविंद सिंह ने सिंधिया के वाहन का घेराव करने की खबर की खिल्ली उड़ाई थी। फरमाया था कि घेराव करने वाले कार्यकर्ता को शायद पता नहीं था कि गाड़ी में रियासत के महाराज बैठे हैं। इसके विरोध में मुख्य सचेतक रामनिवास रावत ने न केवल सोनिया गांधी से शिकायत की बल्कि गोविंद को पार्टी से निकालने की मांग भी कर डाली। तुलसी सिलावट, प्रद्युमन सिंह तोमर, गोविंद राजपूत और इमरती देवी ने भी किया इस मांग का समर्थन। गोविंद सिंह भी चुप रहने वाले कहां थे। पलटवार किया कि उन्हें पार्टी से बाहर निकालने की मांग करने वाले चापलूस और छुटभैए नेता हैं।

उनकी बात का जवाब देकर मैं अपना कद छोटा नहीं करना चाहता। इस कलह पर प्रदेश कांग्रेस ने चुप्पी ही साधे रखी। हालांकि मुंह सिंधिया ने भी नहीं खोला। और तो और सूबे के पार्टी प्रभारी मोहन प्रकाश भी मौन रहे। इससे पहले भी जब गोविंद सिंह ने सिंधिया को नसीहत दी थी तब जरूर सिंधिया ने जवाब दिया था कि वे जानते ही नहीं कि कौन है गोविंद सिंह। लगता है कि आलाकमान ने खिंचाई की होगी तभी तो शनिवार को गोविंद सिंह ने यूटर्न ले लिया। अपने कहे का गलत मतलब निकालने की सफाई दी। उधर सिंधिया की कार पर जूता फेंकने की घटना के मद्देनजर युवक कांग्रेस के सूबेदार कुणाल चौधरी ने दीपक शर्मा और सौरव सोलंकी को पार्टी से निलंबित कर दिया। इस बीच पूर्व सांसद सज्जन सिंह वर्मा ने अरुण यादव की जगह कमलनाथ को पार्टी का सूबेदार बनाने की मांग कर डाली। उनका तर्क है कि अकेले कमलनाथ दस शिवराज चौहान के बराबर हैं।
ऊपर से सोशल मीडिया पर चल रहे एक खुले पत्र के खूब चर्चे हैं। जिसमें कहा गया है कि अपने ही नेताओं को हटाने की जगह कभी शिवराज हटाओ की बात भी तो होनी चाहिए।

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