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राजपाट : बुरे दिन चालू

उत्तर-पूर्व के सात में से छह राज्यों में सरकार थी कांग्रेस की। पर उलटी गिनती ऐसी शुरू हुई कि वजूद बचाने के लिए जूझ रही है यह पार्टी। असम में पिछले पंद्रह साल से था उसका एक छत्र राज।
Author नई दिल्ली | June 13, 2016 02:37 am
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (पीटीआई फाइल फोटो)

पूर्वोत्तर में दुर्दिन चल रहे हैं देश की सबसे पुरानी पार्टी के। उत्तर-पूर्व के सात में से छह राज्यों में सरकार थी कांग्रेस की। पर उलटी गिनती ऐसी शुरू हुई कि वजूद बचाने के लिए जूझ रही है यह पार्टी। असम में पिछले पंद्रह साल से था उसका एक छत्र राज। लेकिन पिछले महीने सूबे के मतदाताओं ने उसे करारी पटखनी दे दी। इससे पहले अरुणाचल में अपने ही विधायकों की बगावत से सत्ता से बेदखल होना पड़ा था। अब वाम मोर्चा के राज वाले त्रिपुरा में भी बगावत से टूट गई पार्टी। आधा दर्जन विधायक कांग्रेस छोड़ ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस में चले गए। सदन में विपक्षी दल का दर्जा भी छिन गया। बागियों में पूर्व मुख्यमंत्री समीर रंजन बर्मन के विधायक पुत्र सुदीप राय बर्मन भी शामिल हैं। सुदीप ने ही अगला चुनाव ममता की अगुाई में लड़ने की दुहाई दी है। पश्चिम बंगाल में माकपा के साथ तालमेल के विरोध में हुई है पड़ोस के सूबे में यह बगावत। बागियों का तर्क है कि त्रिपुरा में कांग्रेस की बची-खुची साख भी जाती रही। इन विधायकों की बगावत से एक दिन पहले तृणमूल कांग्रेस के महासचिव मुकुल राय ने अगरतला पहुंच कर की थी पूरी व्यूहरचना। इससे पहले सुदीप राय बर्मन ने पार्टी अध्यक्ष सोनिया गांधी को पत्र भेज कर अपनी पीड़ा का रोना रो दिया था। पूर्वोत्तर में ही है मेघालय। इस पर्वतीय राज्य को स्काटलैंड कहते हैं पूर्वोत्तर वाले। मेघालय में भी संकट मंडरा रहा है मुकुल संगमा के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार पर। असम की सत्ता पर काबिज होते ही भाजपा ने तो अपने मंसूबे जाहिर कर ही दिए थे कि पूर्वोत्तर राज्यों में अब मजबूती से पैर जमाएगी। मेघालय में चुनाव दो साल बाद होंगे। पीए संगमा के निधन के कारण उनकी तुरा लोकसभा सीट के उपचुनाव में पिछले महीने मुकुल संगमा की पत्नी को करारी हार का सामना करना पड़ा था पीए संगमा के बेटे के हाथों। तभी से मुकुल संगमा की हनक और धमक में कमी आ गई। लिहाजा मेघालय के कांग्रेसी सूबेदार डीडी लपांग ही बागी हो गए। वैसे भी साठ सदस्यीय विधानसभा में कांग्रेस के तीस ही विधायक ठहरें। राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के दो और 11 निर्दलियों का उसे मिल रहा समर्थन भविष्य में किस करवट बैठेगा, कौन जाने। फिलहाल तो संकट में ही नजर आ रहे हैं मुकुल संगमा।


असर जयपुर में
गुरुदास कामत ने सियासत से संन्यास लेने की घोषणा तो मुंबई में की पर हलचल मच गई राजस्थान कांग्रेस में। दरअसल इसी सूबे के पार्टी प्रभारी थे कामत। सूबेदार सचिन पायलट की जंबो टीम में ज्यादातर पदाधिकारी भी कामत ने ही बनवाए थे। चूंकि राजस्थान में वे काफी समय से चले आ रहे हैं पार्टी के प्रभारी। लिहाजा सूबे का हर छोटा-बड़ा कांग्रेसी उनसे बखूबी वाकिफ भी रहा है। ज्यादा निराशा तो उन नेताओं को हुई है जो अगले विधानसभा चुनाव में टिकट की आस लगा कर कामत की निरंतर परिक्रमा रहे थे। अब कोई और बनेगा सूबे का पार्टी प्रभारी तो समीकरण भी बदल ही जाएंगे। जो कामत के दरबारी थे उन्हें नया आका तलाशना होगा। कांग्रेस की सियासत में प्रभारी माई-बाप की तरह होता है। तभी तो सूबे के तमाम नेता उसी की आरती उतारते हैं। राजस्थान में कहने को कांग्रेस के फिलहाल दो ही धड़े हैं। एक पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत का तो दूसरा मौजूदा सूबेदार सचिन पायलट का। सुनने में भले अजीब लगे पर तीसरा खेमा कामत ने बना लिया था अपना। प्रदेश कांग्रेस की एक बैठक में तो उन्होंने मर्यादा की सीमाएं तोड़ दी थी। मौजूद पदाधिकारियों से हाथ उठवा कर सचिन पायलट के समर्थन की कसम खिलाई थी। पायलट विरोधी खेमे ने इसे मुद्दा बनाया तो कामत को दिल्ली दरबार में सफाई देनी पड़ी थी। अब तो भाई लोग राहुल गांधी के कांग्रेस अध्यक्ष बनने की राह तक रहे हैं। राहुल के अध्यक्ष बनने पर राजस्थान कांग्रेस को भी कोई नया प्रभारी ही मिलना तय माना जा रहा है।


बिछ गई बिसात
हरीश रावत के अच्छे दिन अब गए। विपक्ष ही नहीं अपनों के भी निशाने पर लगातार बने हैं उत्तराखंड के मुख्यमंत्री। पार्टी के आठ विधायकों की बगावत के कारण किस मुश्किल से नहीं गुजरे। सीबीआइ अभी तक पीछे पड़ी है। अब अपने ही सूबेदार किशोर उपाध्याय भी आंखें तरेर रहे हैं। पार्टी आलाकमान से रावत की शिकायत की है। पार्टी के लोगों की लगातार उपेक्षा का रोना रोया है। हरीश रावत को किशोर उपाध्याय से बगावत की उम्मीद नहीं रही होगी। आखिर उपाध्याय को उन्होंने ही तो बनवाया था पार्टी का सूबेदार। उपाध्याय की पीड़ा है कि हरीश रावत कांग्रेस में होकर भी जातिवादी सियासत कर रहे हैं। राज्यसभा की इकलौती सीट का उम्मीदवार अपने चंपू प्रदीप टमटा को बना दिया। दूसरी शिकायत दिनेश धनै को ज्यादा भाव मिलने से भी सामने आई है। धनै ने निर्दलीय उम्मीदवार की हैसियत से टिहरी में पिछले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के उपाध्याय को ही शिकस्त दी थी। रावत ने धनै को कैबिनेट मंत्री बना रखा है। उपाध्याय खुद भी राज्यसभा की हसरत पाल रहे थे। टमटा से किसी भी तरह उन्नीस नहीं मानते वे अपना व्यक्तित्व। उपाध्याय खुलकर न सही अपनों के बीच तो गुबार निकाल ही रहे हैं कि ठाकुर होने के कारण ज्यादा तवज्जो देते हैं धनै को हरीश रावत। गढ़वाल में सतपाल महाराज और हरक सिंह रावत के मुकाबले उन्हें स्थापित करने की मंशा है उनकी। परोक्ष रूप से तो हरीश रावत को ब्राह्मण विरोधी साबित करने पर तुले हैं किशोर उपाध्याय।

सब डाल-डाल तो नीकु पात-पात। बिहार के मुख्यमंत्री नीकु यानी नीतीश कुमार किसी की परवाह नहीं कर रहे हैं। गया में कार को आगे निकालने के चक्कर में हुए आदित्य सचदेव हत्याकांड के असली अभियुक्त राकी की मां मनोरमा देवी को भी अभियुक्त बना दिया पुलिस ने। जबकि मनोरमा नीकु की अपनी पार्टी जद (एकी) की विधान परिषद ठहरीं। उन पर शराब रखने का आरोप लगा। गया की अदालत ने तो जमानत भी नहीं दी। लिहाजा उन्हें पटना हाईकोर्ट में दस्तक देनी पड़ी। वहां से जमानत मिल गई। मनोरमा ने दलील दी थी कि घर में शराब रखना अपराध नहीं है। घटना के बाद नीतीश ने उन्हें पार्टी से भी निलंबित कर दिया। लेकिन मनोरमा को जमानत मिलना नीतीश सरकार के लिए एक तरह का झटका ही माना जा रहा है। इससे साफ हुआ कि कानून बनाने में चूक रह गई। इसके बाद भी नीकु पहुंच गए गया। वहां महिलाओं की सभा में शराबबंदी की कामयाबी का बखान किया। फिर माना कि कानून में कुछ कमी है। विधानसभा के अगले सत्र में उसे दूर करेंगे। यानी घर में शराब रखना भी कानूनन अपराध हो जाएगा। मंत्रिमंडल की पिछले दिनों हुई बैठक में भी शराब बंदी को कामयाब बनाने के लिए 40 करोड़ रुपए की रकम मंजूर की गई। इससे सीमा पर चौकसी बढ़ाने, चेक पोस्ट बनाने, एनलाइजर्स खरीदने, सीसी टीवी कैमरों के बंदोबस्त और मोबाइल ट्राली खरीदी जाएंगी। शराब बंदी को नीकु सामाजिक बदलाव का बड़ा मुद्दा मान कर चल रहे हैं। उन्हें पक्का भरोसा है कि उनके अभियान का असर दूसरे राज्यों पर भी देर-सबेर जरूर पड़ेगा। यानी प्रधानमंत्री की कुर्सी की दौड़ में दूसरों पर भारी पड़ने में सहायक होगी शराब बंदी।


गुरबत का वैभव
लालू यादव की बेबाकी बेजोड़ है। पिछले दिनों बेहिचक फरमाया कि उन्हें अपना सही जन्मदिन मालूम नहीं। वे नहीं जानते कि किस साल के कौन से महीने में किस तारीख को पैदा हुए थे। मां-बाप गरीब थे और तारीख महीने की जानकारी रखते ही नहीं थे। तमाम गरीबों और मजदूरों के साथ ऐसा ही होता है। एक तरफ गरीबी का बखान तो दूसरी तरफ अपना जन्मदिन लालू पूरी शान से शौकत से मनाते हैं। शनिवार को राबड़ी देवी के सरकारी आवास पर मनाया उन्होंने अपना 69वां जन्म दिवस। इस हिसाब से तो 68 के हो गए राजद सुप्रीमो। जन्मदिन समारोह में भला नीकु कैसे शिरकत न करते। लालू की बदौलत ही तो बिहार के मुख्यमंत्री बने हैं। खुद को समाजवादी बताने में लालू कभी पीछे नहीं रहते। अवसर मिलते ही लोहिया, जेपी और कर्पूरी ठाकुर के पक्के अनुयायी भी बन जाते हैं। उनकी दिखाई राह पर चलने का दम भरते हैं। खांटी समाजवादियों को इस अंदाज में लालू का जन्मदिन मानना अखरता है। अगर असली जन्मदिन का पता ही नहीं तो फिर जन्मदिन मनाने की तुक क्या है? वैसे भी जन्मदिन मनाने की कोई अनिवार्यता तो है नहीं। जन्मदिन मनाना तो आजकल शक्ति प्रदर्शन का उपक्रम बन चुका है। लालू भी इस मानसिकता से शायद उबर नहीं पाए हैं। वे अपने जन्मदिन पर बधाई देने वालों को तो बधाई देते ही हैं, जो उन्हें बधाई नहीं देते उनके जन्मदिन पर उन्हें भी बधाई देने में कोई कंजूसी नहीं बरतते।


खतरे की घंटी
हरियाणा में राज्यसभा चुनाव ने गजब ढा दिया। मुसीबत की घंटी बेचारे हुड्डा के गले में आ लटकी। अब पूर्व मुख्यमंत्री खुद ही मांग कर रहे हैं कि चुनाव आयोग 14 वोट रद्द होने की जांच कराए। साथ ही स्याही की भी फोरेंसिक जांच हो। निर्दलीय आरके आनंद को समर्थन देने के पक्ष में नहीं थे हुड्डा। होते भी क्यों? इनेलोद ने अपना समर्थन देकर मैदान में उतारा था आनंद को। कांग्रेस शुरू में तो दुविधा में ही रही। पर मतदान से एक दिन पहले भाजपा विरोध के नाम पर फैसला सुना दिया आनंद के समर्थन का। इसके बावजूद आनंद हार गए। कांग्रेस के चौदह वोट रद्द होने पर तो हारना ही था। बाद में हुड्डा के वोट को लेकर भी विरोधियों ने खबर उड़ा दी कि वे भी आलाकमान के फरमान के खिलाफ बगावत करने वालों में हैं। किसी ने उनकी अलग पार्टी बनाने तक की भविष्यवाणी कर डाली। बेचारे हुड्डा की सिट्टी-पिट्टी ही गुम हो गई। तभी तो लग रहा है कि कोई साजिश हुई। चुनाव आयोग से जांच की मांग कर अपने निर्दोष होने का संकेत देना चाहा है। आलाकमान के हुकुम की नाफरमानी को मामूली घटना नहीं माना जा सकता। तभी तो चिंतित आलाकमान ने रविवार के दिन ही बदल दिया सूबे का पार्टी प्रभारी। अब कमलनाथ देखेंगे हरियाणा में पार्टी का रंग-ढंग। हुड्डा के बागी हो जाने को लेकर अटकलें अभी थमी नहीं हैं। देखना यही है कि हुड्डा की जांच की मांग को किस हद तक तवज्जो देगा चुनाव आयोग। जांच हुई भी तो नतीजा क्या निकलेगा, यह जानना भी कम दिलचस्प नहीं होगा।


कमलनाथ का कमाल
हरियाणा में अपने समर्थन वाले निर्दलीय उम्मीदवार सुभाष चंद्रा की जीत पर इठला रही भाजपा के मंसूबे मध्यप्रदेश में धरे रह गए। यहां अपने ही एक नेता को निर्दलीय हैसियत से राज्यसभा में भेजने का उसका मंसूबा मायावती ने ध्वस्त कर दिया। अनिल दवे और एमजे अकबर की जीत पर तो किसी को संदेह था ही नहीं, पर तीसरे उम्मीदवार को जिताने की भाजपा के रणनीतिकारों की हेठी धरी रह गई। अपने प्रदेश महामंत्री विनोद गोटिया को निर्दलीय हैसियत में उतारा था भाजपा ने बतौर तीसरे उम्मीदवार मैदान में। लेकिन कांग्रेस के विवेक तन्खा उन पर इक्कीस साबित हुए। पहली वरीयता के तन्खा को जहां 62 वोट मिले वहीं गोटिया 50 पर ही सिमट गए। इसे कमलनाथ की रणनीति का कमाल बता रहे हैं मध्यप्रदेश के कांग्रेसी। एक तरफ उन्होंने पार्टी के विधायकों को एकजुट किया और दिग्विजय सिंह को भी पटा लिया। सुरेश पचौरी भी साथ आ गए। अपने विधायकों को साथ लेकर पहुंचे ये धुरंधर विधानसभा। नतीजतन पार्टी छोड़ कर भाजपा में जाने को आतुर दिनेश अहिरवार ने भी तन्खा को ही वोट दिया। मुंबई के अस्पताल में इलाज करा रहे नेता प्रतिपक्ष सत्यदेव कटारे का वोट भी डाक से मंगवा लिया। इससे पहले यह अधिकार हासिल करने के लिए हाईकोर्ट पहुंचे थे कांग्रेसी। दो दिन पहले ही भोपाल में डेरा डाल दिया था कमलनाथ ने। पार्टी के सूबेदार अरुण यादव भी उनके सामने पैंतरेबाजी नहीं दिखा पाए। बसपा सुप्रीमो मायावती ने भी अपने चारों विधायकों से तन्खा को ही वोट डलवा दिए। कांग्रेसी दोपहर बाद अचानक परेशान हो गए थे जब बसपा के विधायक नजर नहीं आए। बाद में बसपा के दफ्तर से खबर मिल गई कि सब एक साथ पहुंच कर मतदान करेंगे। भाजपा का मंसूबा भले ध्वस्त हो गया पर निर्दलियों और राजनीतिक दलों सभी विधायकों के अच्छे दिन जरूर रहे इस दौरान।


बढ़ गया संकट
संकट में दिख रहे हैं वीरभद्र सिंह। हिमाचल के मुख्यमंत्री से सीबीआइ ने दिल्ली में पूरे दो दिन सवाल-जवाब किए। पंद्रह घंटे की पूछताछ मजाक नहीं होती। हिमाचल में कांग्रेस की चूलें हिला दी इस खबर ने। किसी कांग्रेसी को बचाव का तरीका नहीं सूझ रहा। उधर, इतनी गहरी पूछताछ के बाद भी सीबीआइ यही फरमा रही है कि वीरभद्र सहयोग नहीं कर रहे। यानी अगली तैयारी उनकी गिरफ्तारी के लिए अदालत में अर्जी देने की हो सकती है। उस सूरत में वीरभद्र तो यही दलील देंगे कि दो दिन तक दिल्ली में रह कर सवालों के जवाब देने से ज्यादा और क्या सहयोग दे सकते हैं केंद्र की एजंसी को वे जांच में। जो भी हो संकट को नकार नहीं सकते वीरभद्र। मुश्किल यह है कि सूबे में तत्काल मध्यावधि चुनाव के लिए न कांग्रेस तैयार है न भाजपा। यानी वीरभद्र फंसे तो कांग्रेस मुख्यमंत्री बदलने की राह चुनेगी। भाजपाई तो इतने भर से भी घी के दीये ही जलाएंगे। प्रेम कुमार धूमल के प्रति बदले की वैसी भावना से दूसरा कोई कांग्रेसी तो पेश आने से रहा।


दाल में काला
नितिन गडकरी का हिमाचल में कार्यक्रम कराया जगत प्रकाश नड्डा ने। दोनों मोदी मंत्रिमंडल के सितारे ठहरे। एक कार्यक्रम में नड्डा ने सूबे के कांग्रेस परिवहन मंत्री जीएस बाली को भाजपा में शामिल होने का न्योता दे डाला। वीरभद्र सिंह से खटपट जगजाहिर है बाली की। बाली ने तो कुछ नहीं कहा पर प्रतिक्रिया देने में वीरभद्र ने देर नहीं लगाई। फरमाया कि भाजपा को बाली चाहिए तो बेशक ले ले। बेचारे बाली ने सफाई दी कि नड्डा तो मजा कर रहे थे। इससे पहले भाई लोग बाली पर धूमल का शुभचिंतक होने का मुलम्मा चढ़ाते थे। अब नड्डा से जोड़ दिया उनको। इस नजरिए से तो कौल सिंह ठाकुर भी हैं भाजपा के निशाने पर। केंद्रीय मंत्री वीरंद्र सिंह के करीबी रहे हैं ठाकुर। जब वीरेंद्र सिंह कांग्रेस में थे तो हिमाचल के प्रभारी महासचिव का जिम्मा था उन पर। तभी कौल सिंह और बाली दोनों को मुख्यमंत्री पद का सपना दिखाया था। यह बात अलग है कि थोड़े दिन बाद खुद ही पाला बदल कर भाजपाई चोला पहन लिया। बाली और कौल सिंह को झटका लगा था इससे। वीरभद्र ने मंत्री तो आलाकमान के दबाव में दोनों को जरूर बनाया पर सरकार में औकात नहीं बढ़ने दी उनकी। शायद इसीलिए अटकलें तेज हैं कि वीरेंद्र सिंह का अनुसरण करते हुए कहीं यह जोड़ी भी भाजपाई न हो जाए अगले चुनाव से पहले। नड्डा का बाली को न्योता देना दाल में काले की आशंका तो जताता ही है।


नजरिया एक सा
जगद्गुरू शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती पर अचानक मेहरबान हो गई मध्यप्रदेश सरकार। जबकि भाजपाई उन्हें खुलेआम कांग्रेसी साधू कह कर उनकी खिल्ली उड़ाते रहे हैं। फिर भी शिवराज मंत्रिमंडल ने उन्हें एक करोड़ 62 लाख रुपए की लक्जरी बस खरीदने पर टैक्स की छूट दे दी। शायद यह संदेश देना मंशा होगी कि रियायतों के मामले में साधू-संतों को अलग-अलग चश्मे से नहीं देखती भाजपा सरकार। अगर अवधेशानंद को मान-सम्मान मिलता है तो स्वरूपानंद भी उतने ही सम्मान के हकदार हैं। सार्इंबाबा के खिलाफ देशव्यापी अभियान चला कर सुर्खियों में रहे थे पिछले दिनों स्वरूपानंद। मथुरा के जवाहरबाग कांड को उन्होंने यादव-यादव प्रतिस्पर्धा का नतीजा बता दिया। मंत्रिमंडल की बैठक में जब स्वरूपानंद के वाहन को कर मुक्त करने के एजंडे पर गौर कर रहे थे मंत्री तो माहौल मजाकिया था। बाबू लाल गौर ने यह छूट मंत्रियों को दिए जाने का सुझाव रख दिया पर मुख्यमंत्री ने साफ कर दिया कि 12 लाख रुपए की छूट सरकार सिर्फ शंकराचार्य को दे रही है। इससे पहले भी शंकराचार्य के वाहन को 2004 में करमुक्त किया था भाजपा की सरकार ने।

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