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चिंगारी सोशल मीडिया की

यह बात अलग है कि हिंसा फैलते ही सरकार को इंटरनेट पर बंदिश लगानी पड़ी। पर फर्जी तस्वीरें और वीडियो तो फिर भी वायरल होते ही रहे। गनीमत है कि अब हिंसा थमी है तो पुलिस भी सक्रिय हुई है।
Author July 17, 2017 04:21 am
पश्चिम बंगाल में हिंसा के बाद की तस्वीर। (Photo Source: PTI)

चिंगारी सोशल मीडिया की
पश्चिम बंगाल को भी भुगतना पड़ रहा है अब सोशल मीडिया का खामियाजा। पिछले दिनों बांग्लादेश से सटे उत्तर चौबीस परगना जिले में एक आपत्तिजनक फेसबुक पोस्ट कर किसी खुराफाती ने हिंसा भड़काने का अपना मकसद पूरा कर दिया। भाजपा और आरएसएस से जुड़े लोगों पर है इस खुराफात का ममता बनर्जी को शक। सोशल मीडिया पर लोड की गई तस्वीरों और वीडियो की सच्चाई की तो किसी ने पड़ताल की नहीं अलबत्ता आग में घी डालने की भूमिका चुन ली। यह बात अलग है कि हिंसा फैलते ही सरकार को इंटरनेट पर बंदिश लगानी पड़ी। पर फर्जी तस्वीरें और वीडियो तो फिर भी वायरल होते ही रहे। गनीमत है कि अब हिंसा थमी है तो पुलिस भी सक्रिय हुई है। एक हफ्ते के दौरान तीन लोग पकड़े गए। भाजपा की आइटी सेल के सचिव तरुण सेन गुप्ता भी चपेट में आ गए। दिल्ली की भाजपा नेता नुपुर शर्मा ने भी गुल खिलाया।

गुजरात दंगे की तस्वीर को बशीर हाट का बता फेसबुक पर पोस्ट कर दिया। उनके खिलाफ भी कोलकाता के दो थानों में गंभीर धाराओं में मामले दर्ज हुए हैं। दक्षिण चौबीस परगना जिले के एक युवक ने भी भोजपुरी फिल्म की किसी तस्वीर को बादुड़िया की हिंसा की तस्वीर के तौर पर पेश कर दिया। उसके बाद भाजपा के नेताओं में लग गई इस भड़काऊ तस्वीर को अपनी वाल पर शेयर करने की होड़। मुख्यमंत्री तो पहले ही दे चुकी हैं बशीर हाट की हिंसा की न्यायिक जांच के आदेश। भाजपा पर सोशल मीडिया के जरिए सांप्रदायिकता भड़काने के अपने आरोप को तरुण सेन गुप्ता की गिरफ्तारी के बाद साबित हो जाने का दम भी भर रही हैं। लेकिन भाजपाई फिर भी ममता पर अल्पसंख्यकों के तुष्टिकरण के आरोप लगाने से बाज नहीं आ रहे।
चेहरे बवाल
मध्य प्रदेश में चुनाव के पहले ही कांग्रेस में मुख्यमंत्री प्रोजेक्ट करने की मांग में पार्टी की अंदरूनी राजनीति को गरमा दिया है। पूर्व केंद्रीय मंत्री और ज्योतिरादित्य सिंधिया ने गुरुवार को भोपाल प्रवास के दौरान कहा कि देश और प्रदेश में चेहरा प्रोजेक्ट करना जरूरी है। उन्होंने कहा कि आलाकमान को अब इस बारे में फैसला लेना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि प्रदेश की भाजपा सरकार को उखाड़ फेंकने के लिए पूरी कांग्रेस एकजुट है और आगे भी मिलकर संघर्ष करेगी। गुरुवार को सिंधिया पूर्व केंद्रीय मंत्री सुरेश पचौरी से उनके निवास पर मिले थे। बाद में दोनों नेता सीहोर-रायसेन में उन परिवारों के घर पहुंचे, जिनके सदस्यों ने खेती में हुए नुकसान के कारण आत्महत्याएं की। इसके पहले सिंधिया नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह के रीवा जिले के चुरहट में भी पार्टी के कार्यक्रम में पहुंचे थे। अपनी सक्रियता की वजह से स्वाभाविक रूप से पार्टी के चेहरे के रूप में प्रोजेक्ट हो रहे सिंधिया ने मुख्यमंत्री का चेहरा प्रोजेक्ट करने की जरूरत बता कर पार्टी की गुटीय राजनीति में गरमाहट तो ला ही दी है। सूत्रों के मुताबिक सिंधिया के बयान के बाद सूबे के अध्यक्ष अरुण यादव के खेमे में भी सरगर्मी बढ़ गई है। यादव खेमे की मंशा है कि विधानसभा चुनाव पार्टी की नीतियों और घोषणा पत्र के आधार पर लड़ा जाए, जिससे यादव खुद भी विकल्प के तौर पर मैदान में रह सकेंगे। वैसे प्रदेश अध्यक्ष अरुण यादव और नेता प्रतिपक्ष दोनों अच्छा तालमेल बनाकर पार्टी के कार्यक्रमों में शिरकत कर रहे हैं।

कांग्रेस ने चुनाव लड़ने की शैली में परिवर्तन कर पंजाब के कैप्टन अमरिंदर सिंह को चेहरा बनाकर चुनाव लड़ा था। सिंधिया मध्य प्रदेश में भी इसी शैली के पक्षधर हैं। लेकिन यहां तीन चार बड़े नेताओं के गुटों के चलते मामला टेढ़ा हो जाता है। हालांकि सिंधिया सभी बड़े नेताओं के क्षेत्र में जाकर मंच साझा कर रहे हैं लेकिन दिक्कत वही है कि कांग्रेस के लिए बाहर से बड़ी लड़ाई कांग्रेस के भीतर की है। एक चेहरे के सामने आने के बाद क्षत्रपों का रवैया क्या होगा? सिंधिया का सुझाव गलत नहीं है। शिवराज की लोकप्रियता का ग्राफ डगमगाया हो या नहीं, डगमगाता हुआ दिखाई तो दे रहा है। वैसे शिवराज के मुकाबले के लिए चेहरा तो यकीनन चाहिए। ठीक वैसे जैसे लोहा लोेहे को काटता है। बाकी दिग्विजय सिंह तो पिछले दिनों कह चुके हैं कि नेता तो दस पंद्रह मिनट में तय हो जाता है। सीधा सा मतलब है कि यदि चेहरा भी यहीं तय हो जाएगा तो हाईकमान को करने के लिए क्या बचेगा? उधर कमलनाथ भी मध्य प्रदेश में सक्रिय होना चाहते हैं लेकिन समर्थकों को भी उनकी शैली समझ में नहीं आ रही। दो कदम आगे बढ़ते हैं तो एक कदम पीछे खींच लेते हैं। प्रदेश कांग्रेस के मुख्य प्रवक्ता केके मिश्रा का कहना है कि फिलहाल तो कार्यकर्ताओं की भावना है कि पहले तो चुनाव जीता जाए, बाकी बातें बाद में हों। वहीं भाजपा प्रवक्ता रजनीश अग्रवाल का कहना है कि कांग्रेस को चेहरा नहीं आईना देखने की जरूरत है। उसका कोई भी नेता शिवराज सिंह के मुकाबले नहीं है। बहरहाल सिंधिया का सुझाव गलत नहीं है। उनका कथन और विचार एकदम काल और परिस्थितियों के अनुकूल कहा जा सकता है। यदि कांग्रेस की पूरी कमान एक चेहरे पर सिमट जाए तो बाजी पलट भी सकती है।

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