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मूल से प्यारा सूद

उत्तर प्रदेश में हमने यादव परिवार की कलह को पिछले दिनों नाटकीय अंदाज में देखा ही था। अब कर्नाटक में भी सामने आई है ऐसी ही कलह।
Author July 17, 2017 04:12 am
उत्तराखंड के निवर्तमान मुख्यमंत्री हरीश रावत। (Photo Source: Indian Express)

मूल से प्यारा सूद
क्षेत्रीय दलों के बारे में जगजाहिर है कि ये परिवारवाद से संचालित हैं। परिवार बढ़ेगा तो कलह भी बढ़ेगी ही। उत्तर प्रदेश में हमने यादव परिवार की कलह को पिछले दिनों नाटकीय अंदाज में देखा ही था। अब कर्नाटक में भी सामने आई है ऐसी ही कलह। देश के प्रधानमंत्री रह चुके एचडी देवगौड़ा को उन्हीं के पौत्र ने चुनौती दे डाली। दरअसल देवगौड़ा का मोह अपने छोटे बेटे एचडी कुमारस्वामी में ज्यादा है। जबकि बड़े बेटे एचडी रवन्ना को सियासत में अपेक्षित तरजीह पिता के कुमारस्वामी के प्रति अनुराग के चलते ही नहीं मिल पाने का मलाल है। इसके बावजूद पिता की कार्यप्रणाली पर कभी उंगली नहीं उठाई। कुमारस्वामी को तो देवगौड़ा ने एक वक्त सूबे का मुख्यमंत्री तक बनवा दिया था। बहरहाल, रवन्ना के बेटे प्रजवाल ने पिछले दिनों बयान दिया था कि जनता दल (सेकुलर) में भी सूटकेस संस्कृति हावी है। यानी पैसे के बदले टिकट बिकते हैं। प्रजवाल मैसूर जिले के हंसर सीट से अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव का टिकट चाहते हंै। लेकिन देवगौड़ा ने कांग्रेस के एच विश्वनाथ को जब पिछले दिनों इस सीट से पार्टी के टिकट का भरोसा देकर पार्टी में शामिल किया, तो प्रजवाल आपा खो बैठे। प्रजवाल के बयान ने जैसे आग में घी का काम कर दिया।

पार्टी के कई दूसरे नेताओं ने भी बागी तेवर दिखाते हुए अपने नेता के पौत्र के सुर में सुर मिलाने में देर नहीं लगाई। शुरू में तो देवगौड़ा ने यही कहा था कि अनुशासनहीनता किसी की भी हो, बर्दाश्त नहीं की जाएगी। लेकिन सवाल पौत्र का आया तो लगे कुछ दिन के भीतर ही तेवर बदलने। पौत्र के भ्रमित होने का जिक्र करते हुए पार्टी में सूटकेस संस्कृति के आरोप को नकार दिया। लगे हाथ अपने छोटे बेटे और पार्टी के कर्नाटक के सूबेदार कुमारस्वामी को सलाह दे दी कि वह 26 वर्षीय भतीजे को उसकी नादानी के लिए माफ कर दे। इतना ही नहीं, परोक्ष रूप से तो पौत्र की सराहना तक कर डाली कि हासन में 2014 के लोकसभा चुनाव में उनकी जीत के लिए दिनरात एक किया था प्रजवाल ने। चूंकि वह अपनी गलती मान रहा है और पार्टी में साधारण कार्यकर्ता की हैसियत से काम करेगा। सो, अगली बार वे हासन में अपनी लोकसभा सीट से मौका दे सकते हैं उसे।

कलह अनंत
उत्तराखंड में कांगे्रस की लुटिया पूरी तरह डूब गई लेकिन पार्टी के नेताओं की आपसी गुटबाजी थमने के बजाए और बढ़ गई। यूपीए की राष्ट्रपति पद की उम्मीदवार मीरा कुमार के सामने भी भिड़ने से बाज नहीं आए पार्टी के दो क्षत्रप। पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत और पूर्व सूबेदार किशोर उपाध्याय में जमकर तू तू-मैं मैं हुई। नतीजतन उपाध्याय मीरा कुमार के कार्यक्रम के बीच से ही चलते बने। बाद में पत्रकारों के सामने रावत के खिलाफ खूब भड़ास निकाली। फरमाया कि हरीश रावत कभी आम की पार्टी दे रहे हैं तो कभी चाट पार्टी। जबकि सूबे में उन्होंने पार्टी का बेड़ागर्क कर दिया। आम कार्यकर्ता अभी तक सदमे में है। पार्टियां तो खुशी में दी जाती हैं। किशोर उपाध्याय इकलौते नहीं हैं। रावत से पार्टी के सूबेदार प्रीतम सिंह और विधायक दल की नेता इंदिरा हृदयेश भी कम परेशान नहीं हैं।

बेशक हरिलार के कांगे्रस समर्थक साधू संत हरीश रावत के खिलाफ मोर्चा खोल चुके हैं। केंद्र्र सरकार के खिलाफ किसानों और दलितों के सवाल पर रावत हर की पौड़ी पर दो बार धरना भी दे चुके हैं। जिससे नाराज ब्रहचारी ब्रहमस्वरूप और संजय महंत ने अपने ही नेता के खिलाफ मुख्यमंत्री, राज्यपाल और हरिलार के कलैक्टर को पत्र भेज दिया। हर की पौड़ी का राजनीतिकरण रोकने की गुहार लगा दी। नाम लिए बिना हरीश रावत पर पवित्र धार्मिक स्थल के सियासी इस्तेमाल का आरोप भी जड़ दिया। ब्रहमस्वरूप ब्रहमचारी अपनी विधानसभा चुनाव की हार को भुला नहीं पाए हैं। वे अपनी हार का ठीकरा हरीश रावत के सिर फोड़ रहे हैं। भाजपा के मदन कौशिक ने हराया था ब्रहमचारी को। रही हरीश रावत की बात, तो मीरा कुमार की न तो हवाई अड्डे पर अगवानी करना जरूरी समझा और न बंदोबस्त में कोई दिलचस्पी दिखाई।

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