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कामगार महिलाओं की फिक्र

दिल्ली के महरौली इलाके में एक ऐसा क्रेच है जो चौबीस घंटे खुला रहता है। कई बार रात में काम करने वाले माता-पिता सिर्फ अपनी नींद पूरी करने के लिए बच्चे को यहां छोड़ते हैं।
Author नई दिल्ली | January 18, 2016 21:22 pm
तस्वीर का इस्तेमाल प्रतीकात्मक तौर पर (फाइल फोटो)

डे केयर सेंटर की एक परिभाषा कहती है- माता-पिता या किसी कानूनी अभिभावक के अलावा बच्चे की देखभाल। वे माताएं जिनका एकल परिवार है, छोटा बच्चा है, जिन्हें काम पर भी जाना है, उनके लिए डे केयर सेंटर या क्रेच कितना जरूरी है, यह वे ही जानती हैं। अक्सर हमारे यहां प्रोफेशनल किस्म के ऐसे डे केयर सेंटर्स का अभाव है जहां बच्चे की उचित देखभाल हो। देखभाल करने वाली आयाएं प्रशिक्षित हों। बच्चे के खान-पान और पोषण का पूरा ध्यान रखा जाए। खेल-कूद की सुविधाएं हों। जरूरत पड़ने पर डॉक्टर की सेवाएं ली जा सकें। रात में काम करने वाली माताओं की और भी मुसीबत है, क्योंकि रात में अक्सर क्रेच बंद हो जाते हैं। दिल्ली के महरौली इलाके में एक ऐसा क्रेच है जो चौबीस घंटे खुला रहता है। कई बार रात में काम करने वाले माता-पिता सिर्फ अपनी नींद पूरी करने के लिए बच्चे को यहां छोड़ते हैं।

हमारे यहां जहां औरतें नौकरी करती हैं, चाहे वे सरकारी दफ्तर हों, या निजी क्षेत्र, वहां अब तक इस समस्या पर ध्यान ही नहीं दिया गया है कि मां के कार्यस्थल पर या उसके आसपास डे केयर सेंटर की सुविधा होनी चाहिए। क्योंकि अब तक तो माना ही यह जाता रहा है कि औरतें नौकरी क्यों करें। वे तो घर में ही रहें। इस सोच और क्रेच की सुविधा न होने के कारण बच्चे की जिम्मेदारी और उसकी सही देखभाल हो सके इसके लिए माताएं नौकरी छोड़ देती हैं। और कोई उपाय नहीं है। चाहे औरत नौकरी छोड़े या आदमी, घर की आय अगर घटती है तो उसका असर घर के खर्चों में कटौती के अलावा बच्चे की देखभाल पर भी पड़ता है। मगर होता यह है कि अगर कोई एक बार नौकरी छोड़ दे तो दोबारा उसी पद और तनख्व्वाह पर वापस जाना मुश्किल होता है।

इसके अलावा छोटे बच्चों की माताओं को नौकरी देने में कंपनियां भी आनाकानी करती रही हैं। वे सोचती हैं कि ये औरतें तो अपने बच्चे की देखभाल में ही लगी रहेंगी, काम कब करेंगी। कार्यस्थलों पर क्रेच न होने का एक कारण यह सोच भी है कि अगर बच्चा आसपास होगा तो मां उसी के बारे में सोचती रहेगी। उसे ही देखने जाती रहेगी और काम के घंटों का नुकसान होगा। जबकि अध्ययन बताते हैं कि मां को यदि यह भरोसा हो कि उसके बच्चे की उचित देखभाल हो रही है, वह सुरक्षित हाथों में है तो इसका सकारात्मक असर उसके काम पर भी पड़ता है। बच्चे की चिंता से मुक्त होकर वह अच्छा प्रदर्शन करती है।

शायद यही कारण है कि अब सोच और स्थिति बदल रही है। एक समय था जब कंपनियां किसी माता के मुकाबले किसी अविवाहित लड़की को लेना पसंद करती थीं। शादीशुदा लड़कियों से साफ-साफ पूछ लिया जाता था कि कहीं वे गर्भवती तो नहीं हैं। या जल्दी ही उनका मां बनने का इरादा तो नहीं है। जो लड़कियां अविवाहित होती थीं, उनसे शादी के बारे में सवाल किए जाते थे कि कहीं वे जल्दी ही शादी तो नहीं कर लेंगी। जिन लड़कियों ने मातृत्व अवकाश लिया होता था, उन्हें कई बार वेतन बढ़ोतरी और तरक्की आदि से वंचित कर दिया जाता था। यह एक बहुत ही अमानवीय सोच थी, जो अक्सर सामने भी नहीं आ पाती थी। एक तरफ तो गला-फाड़ यह विचार कि दुनिया में मां बनना सबसे महत्त्वपूर्ण है। पूजनीय है। दूसरी तरफ मां बनते ही नौकरी के स्तर पर तरह-तरह की प्रताड़ना।

लेकिन बदले वक्त ने कंपनियों को भी सोचने पर मजबूर किया है कि महिलाओं के प्रति उनका यह रवैया ठीक नहीं है। महिलाओं की नौकरियों में बढ़ती उपस्थिति तथा उनसे जुड़े गहरे सामाजिक सरोकारों, यह विचार कि औरतों की आत्मनिर्भरता भी जरूरी है, आदि बातों ने समाज के बने-बनाए मानकों में भारी परिवर्तन किया है। इसलिए कंपनियों को भी अपना रवैया बदलना पड़ा है। इस समझ ने जोर पकड़ा है कि आखिर मां बन कर महिलाएं कोई अपराध नहीं कर रही हैं। साथ ही कंपनियों में यह सोच भी बढ़ी कि सिर्फ मां बनने के कारण किसी भी औरत को नौकरी से वंचित क्यों किया जाए। आखिर एक बच्चे को पाल कर वह देश के एक नागरिक को ही बड़ा कर रही है।

फिर मां बनना औरत का नैसर्गिक अधिकार भी है। इसलिए अब बहुत-सी कंपनियां उन महिला कर्मचारियों को प्राथमिकता देती हैं, जिन्होंने मां की जिम्मेदारी पूरी करने के लिए कंपनी से नौकरी छोड़ दी थी। इसका एक कारण यह भी बताया जा रहा है कि जिन कर्मचारियों ने पहले काम किया होता है, उन्हें पता होता है कि कंपनी की नीति क्या है, कंपनी का वातावरण कैसा है, कर्मचारियों से क्या उम्मीदें हैं। महिलाएं भी इस अवसर का भरपूर लाभ उठा रही हैं। बहुत-सी कंपनियां अब डे केयर की सुविधा भी दे रही हैं। जिनके यहां डे केयर नहीं हैं, वे इस सुविधा को जुटाने पर विचार कर रही हैं।

आज बहुत-से शहरों में क्रेच सुविधाओं के बारे में ऑनलाइन जानकारी भी ली जा सकती है। हालांकि छोटे शहरों में इस तरह की सुविधाएं कम दिखाई देती हैं। गरीब औरतें जो खेतिहर मजदूर हैं, अथवा भवन-निर्माण के काम में लगी हैं, उनके बच्चे अक्सर धूल में लोटते दिखाई देते हैं। इनके लिए क्रेच उतने ही जरूरी हैं जितने कि किसी मध्यम वर्ग के बच्चे के लिए। इन महिलाओं से जो ठेकेदार या खेतों के मालिक काम लेते हैं, उन्हें इस बारे में ध्यान देना चाहिए। इनके लिए सरकार को भी पहल करने की जरूरत है।

हालांकि सरकार अब माताओं को सुविधा देने के लिए नया कानून बनाने पर विचार कर रही है। प्रस्तावित कानून के अनुसार जिस भी कंपनी में पचास से अधिक कर्मचारी काम करते होंगे, वहां कंपनी को क्रेच की सुविधा देनी होगी, चाहे उस कंपनी में सिर्फ एक औरत काम करती हो। कंपनी से अधिकतम एक किलोमीटर के दायरे में क्रेच बनाना पड़ेगा, जिससे माताओं को बच्चों को लाने, ले जाने में दिक्कत न हो। यदि चाहें तो एक से अधिक कंपनियां पांच सौ मीटर के दायरे में क्रेच पूल की व्यवस्था भी कर सकती हैं। केंद्र सरकार ने छह महीने के सवैतनिक मातृत्व अवकाश और दो साल घर से काम करने की सुविधा देने का प्रस्ताव भी किया है।

संयुक्त परिवार में तो बड़े-बूढ़ों तथा परिवार के अन्य सदस्यों की मदद से बच्चे पल जाते थे। मगर अब जब संयुक्त परिवार खत्म होते जा रहे हैं और औरतें घर से बाहर काम पर निकल पड़ी हैं, तो उनके बच्चे कैसे पलें। उनका सहारा कौन बने। आयाओं के सहारे बच्चे छोड़ना अक्सर सुरक्षित नहीं माना जाता। बहुत-सी ऐसी घटनाएं प्रकाश में आती रहती हैं जहां आयाओं ने बच्चों के हिस्से का खाना उन्हें नहीं दिया अथवा बच्चे से हिंसा की। बच्चा अगर बहुत छोटा है तो वह इस तरह की घटनाओं को कभी बता भी नहीं सकता। इसके अलावा बच्चों को उठा कर ले जाने और घर में चोरी की वारदातों को अंजाम देने के किस्से भी सुनाई देते रहते हैं। यही नहीं, बहुत बार परिवार की आर्थिक स्थिति भी ऐसी नहीं होती कि पूरे दिन की आया रखी जा सके, उसका खर्चा आसानी से उठाया जा सके। न ही इतने बड़े घर होते हैं कि चौबीस घंटे की आया के आवास, रहने-सहने की व्यवस्था की जा सके।

महिलाओं के लिए काम करने वाले संगठन, एनजीओ और मीडिया अक्सर सरकार से इस बारे में ठोस नीति बनाने की मांग करते रहे हैं। सरकार में भी इस बारे में विचार होता रहा है। इसीलिए अब सरकार की कामगार महिलाओं के लिए की गई पहल अच्छी मानी जाएगी। इससे महिलाओं को बच्चों की चिंता से मुक्त होकर नौकरी करने का अवसर मिलेगा। उनकी कार्यक्षमता बढ़ने की उम्मीद भी की जा सकती है। सिर्फ मां नहीं, मां आसपास है, इससे बच्चे के ऊपर भी अच्छा प्रभाव पड़ता है। इसके अलावा आजकल सरकारी विज्ञापन और डॉक्टर कहते हैं कि बच्चे के लिए छह महीने तक मां के दूध के अलावा कोई और आहार नहीं होना चाहिए। पानी भी नहीं। लेकिन अगर मां बच्चे को छोड़ कर दूर काम करने जाती है तो आखिर बच्चे को मां का दूध कैसे मिलेगा। बहुत-सी माताएं मशीन से दूध निकाल कर छोड़ जाती हैं। मगर यह हमेशा नहीं हो सकता। लेकिन अगर कार्यस्थल के आसपास ही क्रेच होगा तो बच्चे को मां का दूध मिलना आसान होगा। इससे मां और बच्चे का स्वास्थ्य भी अच्छा रहेगा।

मगर जैसा कि ऊपर कहा गया है, कहीं यह पहल महानगरों और बड़े नगरों तक सीमित होकर न रह जाए। छोटे शहरों में उन माताओं को मदद की बेहद दरकार है जो गरीब हैं। पढ़ी-लिखी भी नहीं हैं। मेहनत-मजदूरी करके काम चला रही हैं। जिन्हें अपनी रोजी-रोटी के लिए काम करना जरूरी है, मगर जिनके बच्चों को देखने के लिए कोई नहीं है। एक समय में इनके लिए मोबाइल क्रेच की वकालत की जाती थी। लेकिन फिर से यही कहना होगा कि सरकारी नियम किसी हद बड़े शहरों में तो क्रियान्वित कर लिये जाते हैं, छोटे शहरों में इन पर ध्यान नहीं दिया जाता। छोटे शहरों में कितनी माताएं कामगार हैं, इसकी ठीकजानकारी अगर हासिल की जाए तो उनके लिए लाभप्रद नीतियां बनाना आसान होगा। वे क्रियान्वित हों, इसकी व्यवस्था भी की जा सकेगी।

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