April 27, 2017

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महिला कामगारों को कम वेतन क्यों

हम दुनिया के बड़े विकसित देशों की बात करें तो वहां भी हर स्तर पर महिलाओं को पुरुषों के समान वेतन अभी सुनिश्चित नहीं किया जा सका है।

Author December 2, 2016 00:15 am
चित्र का इस्तेमाल सिर्फ प्रतीक के तौर पर किया गया है।

कुछ दिन पहले पेरिस के प्रमुख प्रशासनिक और सांस्कृतिक कार्यालयों की महिला कर्मचारियों ने ठीक साढ़े चार बजे अपना काम रोका। यह विरोध जताने का उनका तरीका था। वे पुरुषों की तुलना में महिलाओं को कम वेतन मिलने की तरफ ध्यान खींचना चाहती थीं। दरअसल, एक नारीवादी न्यूजलेटर ने महिला कर्मचारियों का आह्वान किया था कि वे अपना काम रोक दें। पुरुष व स्त्री कर्मचारियों के बीच वेतन संबंधी असमानता को देखते हुए न्यूजलेटर ने कहा था कि 7 नवंबर के आगे बाकी बचे साल तक महिलाएं काम करती भी रहें तो यह एक तरह से ‘स्वैच्छिक काम’ होगा, क्योंकि उन्हें उतना वेतन कम मिलता है। जगह-जगह महिलाएं सड़कों पर उतरीं और उन्होंने समान वेतन की मांग की। यह बात भी रेखांकित करने वाली है कि फ्रांस में हुए ये प्रदर्शन आईसलैंड में 24 अक्तूबर को हुए ऐसे ही प्रदर्शनों की तर्ज पर थे, जहां हजारों महिलाओं ने उस दिन ठीक 2.38 बजे अपना काम रोका था ताकि उनके देश में पुरुषों व महिलाओं के वेतन के बीच चौदह फीसद की विषमता को उजागर किया जा सके।

यूरोप के देशों में समान काम के लिए समान वेतन नए सिरे से मुद््दा बन रहा है। अगर हम दुनिया के बड़े विकसित देशों की बात करें तो वहां भी हर स्तर पर महिलाओं को पुरुषों के समान वेतन अभी सुनिश्चित नहीं किया जा सका है। याद रहे कि बराक ओबामा ने अमेरिका का राष्ट्रपति बनने के बाद जिस पहले विधेयक पर हस्ताक्षर किए थे, वह था ‘इक्वल पे बिल’ अर्थात समान वेतन कानून, और इसके लिए उन्होंने वाहवाही भी लूटी। उनका कार्यकाल समाप्ति की ओर है, मगर बताया जाता है कि अमेरिका में अब भी कई स्तरों पर गैर-बराबरी कायम है। वहां हाल यह है कि शुरुआत में यदि किसी नौकरी में बराबर के वेतन पर स्त्री-पुरुष की नियुक्ति हुई भी, तो बाद में धीरे-धीरे औरत का वेतन कम हो जाता है। वहां पुरुषों के मुकाबले महिलाओं की कमाई 74 से 77 फीसद बताई जाती है। हार्वर्ड में एसोसिएट प्रोफेसर मारिको चांग के मुताबिक आमतौर पर महिलाएं तुलनात्मक रूप से कम वेतन वाले क्षेत्रों में काम करती हैं, लेकिन कहीं-कहीं समान हैसियत वाले क्षेत्रों में भी अंतर दिखाई देता है। यहां तक कि जिस काम में पारंपारिक रूप से महिलाओं का वर्चस्व रहा है उसमें भी जब पुरुषों ने अपना रजिस्ट्रेशन कराया हो तो उन्हें अधिक पैसे मिलने लगे, जैसे नर्स।

अगर यूरोप व अमेरिका के पुरुषों तथा स्त्रियों में वेतन की इतनी गहरी असमानता है तो तो अंदाजा लगाया जा सकता है कि भारत में स्थितियां कैसी होंगी। अगर वैश्विक स्तर पर ‘जेंडर के आधार पर वेतन के अंतराल’ की सूची में भारत ऊपर से छठे नंबर पर है तो अमेरिका सोलहवें नंबर पर। पिछले दिनों एक संस्था की तरफ से किए गए आॅनलाइन सर्वेक्षण के नतीजे भी इस मामले में गौरतलब हैं जिसमें उसने 16,500 कर्मचारियों से आॅनलाइन संपर्क किया था जिसमें 13,729 पुरुष थे तथा बाकी महिलाएं थीं और इन आंकड़ों को 2006 से 2011 के बीच इकट्ठा किया गया। सर्वेक्षण के मुताबिक इस कालखंड में वेतन में अंतराल चौवन फीसद था। सर्वेक्षण में यह भी पाया गया कि यह अंतराल शिक्षा, पेशों, अधिक वेतन के साथ बदलता है। मसलन, स्वास्थ्य सेवा में यह अंतराल सबसे अधिक है, जबकि क्लीनर या ऐसे अन्य कामों में सबसे कम है। संविधान की विभिन्न धाराएं पुरुषों व महिलाओं के समान अधिकार और समान अवसर की बात कहती हैं। इतना ही नहीं, भारत सरकार ने कई अधिनियम बनाए हैं ताकि समान वेतन और कार्यस्थल पर सभी के साथ समान व्यवहार को सुनिश्चित किया जा सके। चाहे आप 1948 में बना न्यूनतम वेतन कानून देखें या कारखाना अधिनियम, 1948 पर गौर करें या या श्रमिक मुआवजा अधिनियम 1923 को देखें। इन सभी अधिनियमों के पीछे पुरुष व स्त्री कामगारों के बीच भेदभाव मिटाना ही रहा है। आप 1976 में बना समान वेतन अधिनियम देखें, जो सभी की खातिर समान काम के लिए समान वेतन की बात करता है, जिसे इसी खास मकसद से बनाया गया, क्योंकि बच्चों के प्रजनन और पालन में महिलाओं को असमान शारीरिक व सामाजिक दायित्व उठाना पड़ता है।

संविधान जो भी कहे, अब भी हम समान काम के लिए समान वेतन के लक्ष्य से दूर खड़े हैं। दरअसल, अब जरूरत इस बात को सुनिश्चित करने की है कि इसका कार्यान्वय न होना अपराध माना जाए, चाहे नियोक्ता निजी कंपनी हो या सरकार। हालांकि श्रम कानून के अंतर्गत बराबरी का प्रावधान है, लेकिन हर जगह जेंडर भेदभाव के लिए रास्ते निकाल लिये जाते हैं। दरअसल, ऐसे हालात तैयार करना भी सरकार और नियोक्ता की जिम्म्ोदारी बनती है जिनमें महिलाएं बराबर का काम कर भी सकें और उन्हें बराबर की सारी सुविधाएं मिलें। हमारे संविधान का अनुच्छेद 15 यह व्यवस्था देता है कि भारत का हर नागरिक लैंगिक तथा जातीय भेदभाव से मुक्त जीवन जीने का अधिकारी है। लेकिन यहां की महिलाएं आसानी से और धड़ल्ले से आर्थिक शोषण का शिकार होती आई हैं। असंगठित क्षेत्र में यह भेदभाव अधिक देखने को मिलता है। आज भी कुशल श्रमिक के रूप में महिलाएं कुल श्रमशक्ति में बराबर का हिस्सेदार नहीं बन पाई हैं। श्रम मंत्रालय की एक रिपोर्ट इस बात का खुलासा करती है। पिछली जनगणना के अनुसार महिला श्रमिकों की संख्या 12 करोड़ 72 लाख है जो उनकी कुल संख्या 49 करोड़ 60 लाख का चौथा (25.60 प्रतिशत) हिस्सा ही हुआ। इनमें भी अधिकांशत: ग्रामीण क्षेत्रों में हैं और उनका प्रतिशत ऊपर दी हुई कुल महिला श्रमिकों की संख्या के तीन हिस्से से भी ज्यादा (87 प्रतिशत) कृषि संबंधी रोजगार में है। रिपोर्ट के अनुसार शहरी क्षेत्र के रोजगार में अस्सी फीसद महिला श्रमिक घरेलू उद्योग, लघु व्यवसाय सेवा तथा भवन-निर्माण में लगी हैं। यों सरकार ने महिला श्रमिकों की स्थिति बेहतर बनाने के लिए कई कानून बनाए हैं, लेकिन व्यवहार में उनकी स्थिति में अपेक्षित सुधार नहीं हो पाया है। महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश तथा उत्तर प्रदेश को छोड़ कर, जहांं क्रमश: महिला श्रमिकों की संख्या 11.90, 10.34 और तथा 10.07 फीसद है, अधिकतर राज्यों में कुल श्रमिकों की तुलना में महिला श्रमिक एक फीसद से भी कम हैं।

हर देश में पारिवारिक जिम्मेदारियां भी औरत के कैरियर में रोड़ा बनती रही हैं। यह भी कई बार कहा जाता है कि महिलाएं बाहर का चुनौतीपूर्ण कार्य करने के लिए तैयार नहीं होतीं। आखिर किन कारणों से ऐसा होता है या क्या वाकई ऐसा होता भी है, यह पड़ताल का विषय है।महिलाओं के लिए सार्वजनिक दायरे में रोजगार उपलब्ध कराने की बात जब भी चलती है, तो एक अन्य अहम मुद््दा सामने आता है और वह है रात की पाली में स्त्री के काम करने का। निश्चित ही इस पर समाज में एकमत नहीं है। कुछ की राय होती है कि जब तक समाज में पूर्ण सुरक्षा का माहौल न बन जाए तब तक यह खतरा बना रहेगा, तो कोई अगर-मगर के साथ इस प्रस्ताव को स्वीकार करता दिखता है। रात की पाली में स्त्री के काम न करने के पीछे जो सबसे बड़ा तर्क दिया जाता है वह सुरक्षा का है। और यह हकीकत भी है। लेकिन तथ्यों की पड़ताल करें तो स्त्री के लिए सार्वजनिक दायरा ही नहीं बल्कि निजी दायरा भी असुरक्षा-भरा है। पेरिस में समानता के लिए उठी आवाज की क्या भारत में भी प्रतिक्रिया हो सकेगी? इसका जवाब भविष्य के गर्भ में छिपा है।

 

 

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First Published on December 2, 2016 12:15 am

  1. D
    DR.RAMJILAL PRINCIPAL(RETD.)
    Dec 5, 2016 at 2:28 pm
    The discrimination against women exists in all walks of life.The women world should unite and struggle against
    Reply

    सबरंग