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अंजलि सिन्हा का कॉलम : अकेली औरत की पहचान

जहां तक समस्याओं की रोकथाम या उनसे निजात पाने की बात है, अकेले रह रही महिलाओं को विशेष श्रेणी में डाला जा सकता है, क्योंकि अकेले जीवन बिताने, अपना घर चलाने और किसी के साथ मिल कर चलाने में बहुत बड़ा फर्क है, जिसमें जिम्मेदारियां बंट जाती हैं।
Author नई दिल्ली | June 1, 2016 22:32 pm
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हाल में जारी राष्ट्रीय महिला नीति के मसविदे में एक महत्त्वपूर्ण मुद्दा एकल महिलाओं का उठाया गया है, जिसमें अविवाहित, विधवा और तलाकशुदा आदि श्रेणियां शामिल हैं। इस बदले दौर में अकेले, अपने भरोसे जीवनयापन करने वाली महिलाओं की संख्या बढ़ी है। पर पुरुषप्रधान मानसिकता वाले समाज में उनके साथ उत्पीड़न, गैरबराबरी और उपेक्षा की संभावना भी बनी हुई है। इसलिए ऐसी महिलाओं के बारे में योजना बनाना जरूरी है, लेकिन नीति बनाने से पहले इस पर विचार करना और विमर्श को व्यापक बनाना जरूरी है।

महानगरों में ऐसी महिलाओं की अच्छी-खासी संख्या दिखती है, जो महज सहारे या ‘पूर्णता’ के लिए पुरुष पार्टनर या पति को स्वीकार करने को तैयार नहीं हैं। यह अच्छा बदलाव है कि उन्होंने अपने में आत्मविश्वास बढ़ाया है। इसका यह अर्थ कदापि नहीं कि वे अकेले रहने को प्राथमिकता देने लगी हैं, तालमेल को तैयार नहीं हैं या इस प्रवृत्ति के चलते भविष्य में परिवार बनने की संभावना कमजोर हो जाएगी। कोई अलग ढंग से जी रहा है तो वह ‘अजूबा’ या उसमें असुरक्षा की बात नहीं। दूसरे, परिवार की परिभाषा और तानाबाना भी बदला है। 2001 की जनगणना के अनुसार एकल महिलाओं की संख्या लगभग साढ़े सात करोड़ है, जिनमें गैर-शादीशुदा, तलाकशुदा और विधवाएं शामिल हैं और अगर विगत दशक के साथ तुलना करें तो यह बढ़ोतरी उनतालीस फीसद है।

विदेशों में एकल महिलाओं की समाज में उपस्थिति पहले से रही है और हमारे समाज की तुलना में वे उपेक्षा और उत्पीड़न की शिकार कम रही हैं। हाल में आई किताब ‘आल द सिंगल लेडीज: अनमैरिड वुमन ऐंड द राइज आफ ऐन इंडिपेंडंट नेशन’ की लेखिका रेबेका टेस्टर बताती हैं कि सिंगल महिलाओं की बढ़ती तादाद, जो 2009 में शादीशुदा महिलाओं की संख्या से आगे बढ़ गई, जल्द ही समान तनख्वाह, समानतापूर्ण पारिवारिक छुट्टी, बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं और प्रजनन संबंधी अधिकारों का रास्ता सुगम करेगी।

इस बदलते वातावरण में सबसे महत्त्वपूर्ण यह समझना है कि इस परिघटना को कैसे देखें? भविष्य के समाज में आधी आबादी के बारे में उनका स्थान और हैसियत तय करने के लिए पहले यह देखना होगा कि किस तरह उन्हें विभिन्न पहचानों के जरिए सदियों से समाज ने ऐसे गढ़ा है ताकि पितृसत्तात्मक समाज बना रहे और उसका वर्चस्व कायम रहे। जैसे कि ‘कौमार्य’, शादीशुदा होना या गैर-शादीशुदा रहना, ऐसी पहचानें जो कुमारी और श्रीमती के माध्यम से पुष्ट की गर्इं, विधवा जो ‘अशुभ’ होती है और ‘छोड़ दी गई’ जो तलाक या परित्यक्ता श्रेणी वाली, भद्र और अभद्र की श्रेणी, जो सभ्य घरों या ‘रेडलाइट एरिया’ वाली, मॉडल टाइप या बाजार की जरूरतें पूरी करने वाली मिस इंडिया, मिस वर्ल्ड आदि। ये सारी पहचानें इस तरह गढ़ी गर्इं कि उसमें स्त्री का अपना स्पेस, अपना स्व, अपना व्यक्ति गायब था।

किसी भी आधुनिक समाज का मापदंड जेंडर, जाति, लिंग, नस्ल आदि से इतर एक व्यक्ति को मान्यता देना है। उसके बाद रिश्ते आते हैं, जिससे समाज निर्मित होता है। कहीं एकल होना पहचान के खांचे में औरत को फिट करके देखने की सोच फिर से व्यक्ति से बड़ी न बन जाए।

अक्सर आधुनिकता की आम समझ के तहत उसे पश्चिम से आयातित नकारात्मक धारणा मान लिया जाता है, जिसके अनुसार कोई किसी का खयाल नहीं करता। संवेदना से परे बेरहम समाज आधुनिकता की कसौटी नहीं है, पर यह तो जांचने वाली बात बनती है कि एक व्यक्ति की- जिस भी रूप में वह है- उसकी स्वीकार्यता, उसकी गरिमा की रक्षा कहां, किस समाज में अधिक है। इस जांच और उसके नतीजों में भिन्नता भले हो सकती है, लेकिन सामाजिकता या सामूहिकता को झुंडवाद से अलग कर देखना होगा।

इस तरह हम समझते हैं कि औरत को एकल होने की अलग पहचान की श्रेणी में डालना पूरे स्त्री समुदाय के लिए दूरगामी रूप से बहुत फायदेमंद नहीं होगा। इसका अर्थ यहां यह भी नहीं होना चाहिए कि सभी एक ही पहचान में समा जाएं, बल्कि जैसे यह जानने की जरूरत नहीं कि किसकी शादी हुई है, कौन कितनी उम्र में किस जाति वाले को अपना पार्टनर चुनती है, उसी तरह इसमें भी समाज को अधिक रुचि लेने की जरूरत नहीं है कि कौन अकेले रह रही है और कौन किसके साथ?

इसे रेखांकित करना इसलिए जरूरी है कि हमारे समाज में औरत के संदर्भ में जब बात हो, उससे संबधित किसी मुद्दे या समस्या की चर्चा हो तो उसका दूसरे व्यक्ति से क्या रिश्ता है यह सबसे पहले रेखांकित होता है। वह मां, बहन, बेटी, पत्नी के रूप में पहले होती है। इसीलिए उत्पीड़न के खिलाफ जब कानून बना तो ससुराल के संदर्भ में बना। बाद में घरेलू हिंसा-विरोधी कानून में मायके को भी समेटा गया। इसी तरह कन्याओं के गर्भपात के मसले पर भी पहले नारों में इस बात की प्रधानता देखी जाती थी कि अगर लड़कियों को गर्भ में ही मारा जाएगा, तो समाज में मां बनने का संकट आ जाएगा, लड़के कुंआरे रह जाएंगे, और सृष्टि आगे नहीं बढ़ पाएगी, भाइयों को राखी कौन बांधेगा आदि। रिश्तों में बांध कर देखने-समझने की प्रवृत्ति के कारण ही संपत्ति में बराबरी का हक बेटी के लिए भी हो, यह कानून बनने में दशकों लग गए। यह कानून बनने के बाद भी समाज अभी इसे स्वीकार करने को तैयार नहीं है। दहेज जैसी समस्याएं इसी की उपज हैं।

इसी तरह रिश्तों की पृष्ठभूमि में औरत के मुद्दे को संबोधित करते हुए आज के समय में एकल औरत की पहचान की धारणा प्रचलित हो चली है। पहले इसे विधवा, परित्यक्ता, कुंआरी आदि पहचानों के भीतर देखा गया। लेकिन एकल होने की पहचान भी ऊपर वाली पहचानों से बहुत भिन्न नहीं है। यह एकल होना भी इससे तय होता है कि किसी न किसी रूप में कोई पुरुष आपके साथ है या नहीं। चाहे वह मर चुका हो, आपसे अलग हो चुका हो या अभी साथ हुआ ही न हो। कुल मिला कर इस एकल की पहचान भी पितृसत्तात्मक खांचे के भीतर की पहचान है।

एकल महिला की सामुदायिक पहचान बनाना, उसे किसी निर्मित की गई पहचान की सीमा में बांधने की अपेक्षा ज्यादा जरूरी है व्यक्ति के रूप में उसे मान्यता दिलाना। महिला चाहे शादीशुदा हो, गैर-शादीशुदा, तलाकशुदा या विधवा हो, सबसे पहले वह व्यक्ति और नागरिक है। महिलाओं के मुद्दे को संबोधित करने में हमेशा से रिश्तों को प्रधानता दी गई है। परिवार के अंदर या अकेले रहने वाली महिला की स्थिति में निश्चित ही बहुत बड़ा फर्क आया है, लेकिन पितृसत्ता की शिकार सभी महिलाएं हैं। एकल महिलाओं को अलग से चिह्नित कर ‘एकल’ होने की पहचान अपने आप में पितृसत्तात्मक है।

जहां तक समस्याओं की रोकथाम या उनसे निजात पाने की बात है, अकेले रह रही महिलाओं को विशेष श्रेणी में डाला जा सकता है, क्योंकि अकेले जीवन बिताने, अपना घर चलाने और किसी के साथ मिल कर चलाने में बहुत बड़ा फर्क है, जिसमें जिम्मेदारियां बंट जाती हैं। लेकिन इसी बात को देखने-समझने का दूसरा नजरिया यह हो सकता है कि वह ‘बेसहारा’ है और बेचारी अकेली जान को राहत देने के लिए कुछ योजना होनी चाहिए। इसलिए कम उम्र में भी विधवा होने पर विधवा पेंशन की, भले वह इंतजाम होता नहीं है, बात होती है, न कि उस महिला के रोजगार की।

न सिर्फ सरकार, बल्कि महिलाओं के हकों के लिए काम करने वाले संगठन और महिला आंदोलनों के लोग भी एकल महिला को अलग से संबोधित करते हैं। ऐसी एकल कही जाने वाली महिलाओं के लिए मंच/ संगठन भी बनाए गए हैं यानी किसी औरत का अकेले रहना अभी उसकी मर्जी की बात नहीं हो सकती है और वह पीड़ित ही होगी यह माना गया है, जबकि हकीकत यह है कि कम संख्या में ही सही, लेकिन शादी नहीं करना या तलाक के बाद दूसरे रिश्ते में नहीं जाना औरत अपनी मर्जी से तय करती है। कई बार घर वाले दबाव डालते हैं कि किसी से शादी कर लो, लेकिन वह अपने ढंग से जीने का चुनाव करती है। किसी एक साथी का न होना यानी विधवा या विधुर हो जाना एक संज्ञा हो सकती है, लेकिन उस पहचान को मजबूत बनाना औरत की वैयक्तिक पहचान को कमजोर बनाना भी होता है।

महिला आंदोलन में नारे लगते थे कि न देवी न दासी हैं, हमें चाहिए इंसान का दर्जा यानी बराबर का इंसान मानो और समान नागरिक हक सुनिश्चित करो। देवी या दासी, अच्छी या बुरी औरत की श्रेणी में समाज डालता है तथा सरकार और कानून भी कई बार इस परिधि को लांघ नहीं पाते हैं।

अगर हम बराबरीपूर्ण समाज की कल्पना करते हैं तो हर स्त्री या पुरुष की वैयक्तिक पहचान उस व्यक्ति की स्वीकार्यता है। वह किसी उपेक्षा से निर्मित पहचान नहीं है। किसी भी पीड़ित समुदाय की अपनी एकता और पहचान हो सकती है, लेकिन वह अपने उत्पीड़न, शोषण से मुक्ति का, खुद को संगठित करने का एक रणनीतिक मसला होगा, वह सरकारी नीति का मुद्दा नहीं है। एकल होना या साथ होना किसी सशक्त हो चले समूह के लिए अपने चुनाव का मसला भी हो सकता है। शादी करना या नहीं करना आज लड़कियां खुद भी तय करने लगी हैं, भले उनकी संख्या अभी बहुत थोड़ी है। जिस भी व्यक्ति को चाहे वह किसी रिश्ते में हो या नहीं अगर सरकारी सहायता की जरूरत हो तो उसे मिलनी चाहिए।

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