December 02, 2016

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राजनीतिः किसके हित में है यह आत्म बलिदान

आखिर क्यों फौजी अब भी पूरी तरह संतुष्ट नहीं हैं। असहमति के स्वर कहां से उपज रहे हैं? समझने का प्रयत्न करने पर दीखता है कि सरकार ने दरियादिली तो दिखाई, पर कुछ छोटी-छोटी कटौतियों के लालच में हाथी निकल गया, मगर दुम अटक गई। इस अटकी हुई दुम में कुछ छोटे-छोटे पेच हैं।

सभी राजनीतिक दलों को अपनी रोटी सेंकने का पूरा मौका दे, ऐसी आग कम ही लगती है। तीस साल देश की सेवा के लिए तत्पर रहे सूबेदार रामकिशन ग्रेवाल ने आत्महत्या को देश और अपने फौजी साथियों के लिए बलिदान समझा, इससे बड़ी विडंबना क्या होगी! काश, उन्हें अनुमान होता कि इस आत्मबलिदान के बाद बड़े-बड़े नेता आएंगे। काश, उन्हें ध्यान आया होता कि फोन पर आत्महत्या के प्रयास की सूचना जब वे अपने परिवार को देंगे, उस समय उनके साथ धरने पर बैठे हुए उनके साथी उनकी जान बचाने के बजाय उनका संदेश रिकार्ड करने में अधिक दिलचस्पी लेंगे! इन सारे प्रश्नों के बीच एक रैंक एक वेतन का मुद्दा कहीं गुम हो गया है। एक रैंक एक वेतन की मांग के प्रतिदान में सरकार की तरफ से की हुई तमाम घोषणाओं के बाद आम फौजी की प्रतिक्रया से यह समझ पाना कठिन हो गया है कि आखिर ये फौजी अब चाहते क्या हैं। सरकार का दावा है कि उसने वह वादा पूरा कर दिया है, जो प्रधानमंत्री पद के प्रत्याशी मोदीजी ने 2013 में रेवाड़ी में भूतपूर्व सैनिकों से किया था। लगभग चौदह हजार करोड़ रुपए का नया बोझ उठा कर सरकार मानती है कि उसने वह समस्या सुलझा दी है, जो पिछले तैंतालीस वर्षों में कोई सरकार नहीं सुलझा पाई।


अब आखिर कौन-सी मांगें हैं, जिन्हें लेकर फौजी असंतुष्ट हैं और सरकार की सदाशयता में विश्वास खो बैठे हैं। यह समझना आवश्यक हो गया है कि क्या भूतपूर्व सैनिकों की मांग एक ऐसा खाली घड़ा है, जिसे कोई भी सरकार कितने भी यत्न से भरे वह रीता ही रहेगा! क्या फौजियों की अपेक्षाओं की कोई सीमा नहीं है? दिवंगत सूबेदार रामकिशन को पेंशन तो बाईस हजार रुपए मिल ही रही थी। बैंक की गलती से यह देय राशि से लगभग पांच हजार रुपए कम थी। क्या बैंक की इस गलती को सुधार पाना इतना दुष्कर था कि उसके लिए आत्महत्या अकेला विकल्प बचा? तो फिर क्या है वह पीड़ा, जो फौजियों को साल रही है? पेंशन में बढ़त पाकर भी वे संतुष्ट क्यों नहीं हैं? क्यों उनका कहना है कि समस्या चंद रुपयों की नहीं, उनकी इज्जत और मर्यादा की है। उन्हें क्यों लगता है कि समाज में उनका स्थान दिनों-दिन नीचा हो रहा है। ऐसी सोच उपजी कहां से?
फौजियों की ‘एक रैंक एक वेतन’ की चाहत एक ऐसी समस्या थी, जिसे किसी भी सरकार को न निगलते बनता था, न उगलते। सरकारों की नीतिगत परंपरा रही है कि समस्याओं को सुलझाने का कष्ट न किया जाए, तो वे विस्मृति की धूल में दब कर स्वयं सुलझ जाती हैं। पर 2013 में रेवाड़ी में भूतपूर्व सैनिकों की इस मांग को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पूरा समर्थन देने का वादा किया तो उनके नेतृत्व में भाजपा सरकार बनने के बाद अवकाशप्राप्त सैनिकों के आंदोलन की अनदेखी असंभव हो गई। अंत में वह दिन भी आया कि रक्षामंत्री ने आंदोलन करने वालों को बताया कि उनकी मुख्य मांगें मान ली गई हैं। अपनी सेनाओं पर अभिमान करने वाले इस देश के सभी राजनीतिक दलों और नागरिकों ने चैन की सांस ली।
एशिया में लगभग सारे छोटे-बड़े देशों में गणतांत्रिक व्यवस्थाओं पर हावी हो जाने वाली सैनिक सरकारों की आंधी के बीच भारत में स्वतंत्रता प्राप्ति से आज तक सशस्त्र सेनाओं ने गणतंत्र की मशाल को जलाए रख कर देश पर आने वाली हर आपदा का दृढ़ता और लगन से सामना किया है। एकनिष्ठ कर्तव्य पालन में जुटे रह कर राजनीति से खुद को अलग रखा है। इसी निष्ठा के सम्मान में हर छोटे-बड़े मुद्दे पर सैकड़ों स्वरों में बोलने वाली भारत की जनता और राजनीतिक दलों ने फौजियों की ‘एक पद एक वेतन’ की मांग का समर्थन किया था। वैसे भी सैद्धांतिक तौर पर इस मांग का विरोध किसी सरकार ने नहीं किया, केवल क्रियान्वयन की कठिनाइयां और उसका बड़ा आर्थिक बोझ उन्हें विचलित करता रहा है।
पर चौदह हजार करोड़ रुपए का अतिरिक्त बोझ उठा कर भी सरकार फौजियों को संतुष्ट नहीं कर पाई! अवकाशप्राप्त सैनिकों में से बहुतों ने ‘प्राप्त को ही पर्याप्त’ समझ कर स्वीकार किया। पर उनके एक बड़े वर्ग ने सरकार के निर्णय को ठुकराते हुए अपना संघर्ष जारी रखा। आज इस संघर्ष की कटुता किस सीमा पर पहुंच गई है इसी का खुलासा भूतपूर्व सैनिक रामकिशन ग्रेवाल की आत्महत्या से हुआ है।
आखिर क्यों फौजी अब भी पूरी तरह संतुष्ट नहीं हैं? असहमति के स्वर कहां से उपज रहे हैं? समझने का प्रयत्न करने पर दीखता है कि सरकार ने दरियादिली तो दिखाई, पर कुछ छोटी-छोटी कटौतियों के लालच में हाथी निकल गया, लेकिन दुम अटक गई। इस अटकी हुई दुम में कुछ छोटे-छोटे पेंच हैं। 2014 से सत्ता में आने वाली सरकार चाहती थी कि इस व्यवस्था को उसी साल से लागू किया जाए और सब गणना 2013 के कैलेंडर साल में लागू दरों पर हो। फौजियों ने इस पर आपत्ति तो की पर अड़े नहीं, हालांकि यह सवाल अनुत्तरित ही रह गया कि एक अप्रैल से इकतीस मार्च तक के आर्थिक साल के आधार पर काम करने वाली सरकार ने यह कैलेंडर साल का चक्कर क्यों चलाया।
फिर सरकार ने घोषणा की कि हर पांच साल पर इस व्यवस्था पर पुनरावलोकन किया जाएगा। फौजी चाहते हैं कि ऐसा हर साल किया जाए। पर सरकार का कहना है कि इतनी सारी गणना हर साल या हर तीन साल पर करना दुष्कर है। इस पेंशन की गणना में ऐसी कौन-सी मुसीबत है, जो आज के कंप्यूटर युग में हल नहीं हो सकती? क्या इसका सॉफ्टवेयर बना पाना असंभव है?
अगला असहमति का कारण है सरकार का यह निर्णय कि पेंशन निर्धारण में किसी पेचीदगी या शिकायत पर व्यवस्था देने का प्रश्न उठे तो उसे किसी अवकाशप्राप्त न्यायाधीश की अध्यक्षता वाला एक सदस्यीय आयोग सुन कर अपना फैसला छह महीने में दे दे। पर फौजियों का आग्रह है कि यह आयोग पांच सदस्यों वाला हो, जिनमें तीन अवकाशप्राप्त फौजी, एक सरकारी सदस्य और एक कानूनी विशेषज्ञ हो और आयोग फैसला एक महीने के अंदर सुना दिया करे। इस प्रश्न पर सरकार के अड़ने का कोई कारण समझ में आना कठिन है। क्या वाकई इस आयोग के तीन फौजी सदस्य होंगे, तो वे रेवड़ी बांटने वाले अंधे की तरह सारी रेवड़ियां अपनी जेब में डालने लगेंगे? क्या एक सदस्यीय आयोग सारे मामलों को अकेले संभाल लेगा!
सरकार ने समान रैंक समान वेतन की घोषणा करके भी भूतपूर्व सैनिकों को रुष्ट और असंतुष्ट रखने का कोई अवसर छोड़ा नहीं। समय पूर्व सेवानिवृत्ति लेने वाले फौजियों की पेंशन को लेकर सरकारी घोषणाओं में अचानक घुस आए सवाल ने बहुत असंतोष पैदा किया। रक्षामंत्री की औपचारिक घोषणा में जब कहा गया कि स्वैच्छिक अवकाश ग्रहण करने वाले इस व्यवस्था से बाहर रहेंगे, तो हडकंप मच गया। बाद में खुद प्रधानमंत्री ने स्थिति स्पष्ट की कि युद्ध में घायल होकर या शारीरिक मजबूरी के कारण किसी को स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति लेनी पड़ी, तो उसे इसके लिए दंडित करना देश कभी गवारा नहीं करेगा। यही उनके संदर्भ में भी कहा गया, जो आगे तरक्की न मिल पाने के कारण फौज से समयपूर्व बाहर आ गए थे।
भूतपूर्व सैनिकों को उद्विग्न करने वाले निर्णय करने में इधर हाल में अफसरों ने अनोखी प्रतिभा का प्रदर्शन किया है। वेतन आयोग में भारतीय प्रशासनिक सेवा से आने वाले प्रमुख अधिकारी को लगा कि ग्रुप ए अफसर तो केवल वे हो सकते हैं, जो अखिल भारतीय सेवाओं के अधिकारी हों, भला ‘कमीशन अफसर’ इस उच्च प्रजाति के समकक्ष कैसे हो सकते हैं। गुवाहाटी में किसी नागरिक सेवा के अधिकारी की नियुक्ति को सियाचिन में तैनात जवान के जैसी कठिन नियुक्ति माना जाए, यह भी एक विडंबना है। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद से ही केंद्र सरकार ने लगातार सैनिक अधिकारियों को नागरिक सेवा के अधिकारियों की तुलना में पदावनति का ही तोहफा दिया है।
सैन्य सेवाओं के सदस्यों को अपने ताबूत में आखिरी कील ठोंके जाने की अनुभूति उस दिन हुई जब तीस सितंबर को सर्जिकल स्ट्राइक का जश्न मनाते हुए उन्हें पूरा देश बधाई देने में जुटा हुआ था। उसी शुभ अवसर को चुना गया यह घोषणा करने के लिए कि युद्ध या सैन्यसेवाजन्य कारणों से उत्पन्न विकलांगता के लिए दी जाने वाली राशि में इतनी जबर्दस्त कटौती हुई है कि अगर उसी सर्जिकल स्ट्राइक में कोई जवान शत-प्रतिशत विकलांग हो जाता, तो उसकी पेंशन में अठारह हजार रुपए की कटौती होती। यानी पहले मिलने वाले 45200 रुपए की जगह उसे 27200 रुपए मिलते। दस वर्ष की सेवा कर चुके किसी मेजर रैंक के अधिकारी के मामले में यह कटौती एक आकलन के अनुसार सत्तर हजार रुपए तक होती। सरकारी सूत्रों के अनुसार मिलने वाले आकलन में यह मात्रा काफी कम दिखाई गई है, पर इसे हर स्रोत ने सही बताया कि विकलांगता पेंशन में कमी हुई है और खासी हुई है। जले पर नमक छिड़कते हुए गैर-सैनिक कर्मचारियों के मामले में यह राशि बढ़ा दी गई है।
इन्हीं सब विसंगतियों का नतीजा है कि समान रैंक समान वेतन के सिद्धांत को मानने के बाद सरकार की घोषणाएं सैन्य कर्मचारियों को संतुष्ट करने में विफल रही हैं। भूतपूर्व सैनिक खुलेआम कहते हैं कि उनके प्रति सरकार का सौतेला व्यवहार उन्हें आर्थिक क्षति का कम एहसास दिलाता है और समाज में घटती हुई अपनी प्रतिष्ठा के प्रति अधिक सचेत करता है।

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First Published on November 5, 2016 1:48 am

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