ताज़ा खबर
 

राजनीतिः क्यों गुम होते हैं बच्चे

पुलिस का यह मानना रहता है कि कमजोर तबकों के गायब हुए बच्चे या तो कहीं भाग गए हैं या भटक गए हैं और कुछ समय बाद खुद लौट आएंगे। पर हकीकत कुछ और है, क्योंकि विभिन्न शोध, मानवाधिकार आयोग और गैर-सरकारी संगठनों के अध्ययन बताते हैं कि लापता हुए ज्यादातर मासूम तस्करी के शिकार हो जाते हैं।
Author May 20, 2016 03:23 am
(फाइल फोटो)

मानव तस्करी को बड़ी चुनौती बताते हुए केंद्रीय गृहमंत्री ने हाल ही में कहा कि यौन पर्यटन और बाल पोर्नोग्राफी समेत अन्य मुद््दे बच्चों के लिए बड़ी चुनौती के तौर पर उभरे हंै। बच्चों के खिलाफ हिंसा समाप्त करने के लिए दक्षिण एशियाई पहल (एसएआइइवीएसी) की चतुर्थ मंत्रिस्तरीय बैठक को संबोधित करते हुए गृहमंत्री ने कहा कि बच्चों की सुरक्षा सबकी जिम्मेदारी है। इसलिए जितने भी संभव पक्ष हैं- जैसे माता-पिता, शिक्षक, बच्चे और समुदाय- उन सबको मिल कर काम करना चाहिए। मानव तस्करी हम सब के लिए एक अन्य बड़ी चुनौती है।
उल्लेखनीय है कि बाल तस्करी को लेकर उच्चतम न्यायालय ने बीते वर्षों में कठोर रुख अपनाते हुए, समय-समय पर केंद्र सरकार और राज्य सरकारों को फटकार लगाई है। वर्ष 2014 में उच्चतम न्यायालय ने छत्तीसगढ़ और बिहार सरकार को फटकार लगाते हुए पूछा था कि उन्होंने लापता बच्चों के मामले में 2013 में दिए गए दिशा-निर्देशों का पालन क्यों नहीं किया। गौरतलब है कि इन दोनों राज्यों में बच्चों के लापता होने के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं। उच्चतम न्यायालय ने कहा कि मशीनी तरीके से जवाब दाखिल करने और जमीन पर कुछ नहीं करने का तमाशा बंद होना चाहिए। न्यायालय ने अपनी खिन्नता प्रकट करते हुए यह भी स्पष्ट कर दिया था कि केंद्र और राज्य सरकारें यह सुनिश्चित करें कि यदि बच्चे गायब होते हैं तो वे राज्य के डीजीपी और मुख्य सचिव की जवाबदेही मानते हुए उनसे जवाब-तलब करें।

यह स्थिति इसी बात को दर्शाती है कि गुमशुदा बच्चों को ढूंढ़ना किसी की भी प्राथमिकता में नहीं है। उच्चतम न्यायालय ने निर्देश दिए थे कि लापता बच्चों के संबंध में एफआइआर पंजीकरण के साथ ही साथ राज्य में विशेष किशोर पुलिस इकाई स्थापित की जाए। न्यायालय ने यह भी निर्देश दिया कि कम से कम पुलिस स्टेशन में तैनात एक अधिकारी को यह शक्ति दी जाए कि वह विशेष किशोर इकाई के रूप में कार्य करे। इस सबंध में राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग से आग्रह किया गया कि वह देखे कि इस संबंध में क्या कार्रवाई हो रही है।

न्यायालय की संवेदनशीलता को पुलिस प्रशासन दरकिनार करता प्रतीत होता है, वरना क्या यह संभव है कि निरंतर चेतावनियों के बाद भी लापता बच्चों के आंकड़ों में बढ़ोतरी होती जा रही है। जुलाई 2014 मेंगृह मंत्रालय की तरफ से संसद में जो आंकड़े पेश किए गए थे उनके अनुसार देश में 2011 से जून 2014 के बीच 3.25 लाख बच्चे लापता हुए। औसतन प्रतिवर्ष एक लाख बच्चे लापता हो रहे हैं। एक गैर-सरकारी संगठन की रिपोर्ट के अनुसार देश में हर घंटे करीब ग्यारह बच्चे लापता हो जाते हैं। ‘बचपन बचाओ आंदोलन’ के अनुसार जनवरी 2008 से जनवरी 2010 के बीच देश भर के 392 जिलों में 1,14,480 बच्चे लापता हुए। ये आंकड़े सरकारी एजेंसियों से प्राप्त किए गए हैं। बचपन बचाओ आंदोलन ने अपनी किताब ‘मिसिंग चिल्ड्रेन आॅफ इंडिया’ में कहा है कि उसने ये आंकड़े 392 जिलों में आरटीआइ दायर कर हासिल किए हैं। ये वे आंकड़े हैं जो कि पंजीकृत हैं। फिर इस तरह के बच्चों की संख्या हजारों में है जिनके अभिभावक अपनी परिस्थितियों के चलते उन्हें स्वयं छोड़ देते हैं; ऐसे में उनकी गुमशुदगी की रिपोर्ट संभव ही नहीं।

संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत में हर साल औसतन साढ़े चौवालीस हजार बच्चे गुम हो जाते हैं। उनमें से में कई यौन-शोषण के अड््डों, भीख मंगवाने वाले या मानव अंगों की तस्करी करने वाले गिरोहों के पास पहुंचा दिए जाते हैं। गैर-सरकारी आंकड़ों के मुताबिक दुनिया में हर साल बहत्तर लाख बच्चे बाल दासता के शिकार होते हैं। इनमें एक तिहाई बच्चे दक्षिण एशियाई देशों के होते हैं। भारत में स्थिति की गंभीरता का अनुमान इस तथ्य से लगाया जा सकता है कि देश के विभिन्न थानों में हर साल कुल करीब सात लाख बच्चों की गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज कराई जाती है। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग हर वर्ष ‘एक्शन रिसर्च आॅन ट्रैफिकिंग इन वुमेन ऐंड चिल्ड्रेन’ रिपोर्ट जारी करता है जिसमें कहा जाता है कि जिन बच्चों का पता नहीं लगता वास्तव में लापता नहीं होते बल्कि उनका अवैध व्यापार किया जाता है। इनमें से एक बड़ी संख्या को यौन पर्यटन के नृशंस कारोबार में फेंक दिया जाता है।

इस भयावह स्थिति को जानते हुए भी बच्चों के संदर्भ में दिल्ली पुलिस के एक उच्चपदस्थ अधिकारी की ओर से एक परिपत्र भेजा गया था कि गायब या अपहृत मामलों में अंतिम रिपोर्ट लगाने की समयावधि तीन साल के बजाय एक साल कर दी जाए। स्पष्ट है कि पूर्व में किसी बच्चे के गायब या अपहृत होने के बाद कम से कम तीन साल तक उसका मामला पुलिस रिकॉर्ड में दर्ज रहता था। इस परिपत्र पर दिल्ली बाल अधिकार संरक्षण आयोग ने आपत्ति दर्ज की और रेखांकित किया गया कि अनसुलझे मामलों की संख्या कम करने के लिए पुलिस ऐसा मनमाना आदेश नहीं निकाल सकती क्योंकि बच्चों के यौन व्यापार में लिप्त गिरोह के चुंगल में फंसे होने की प्रबल आशंका होती है। ऐसे में पुलिस ने फाइल बंद कर दी तो जांच अधूरी रह जाएगी। आयोग के एतराज के बाद अपने उस परिपत्र को दिल्ली पुलिस ने रद््द कर दिया।
गुमशुदा बच्चों के प्रति पुलिस की लापरवाही के सदंर्भ में उच्चतम न्यायालय ने फरवरी 2013 में स्पष्ट कर दिया था कि बच्चों के गायब होने के हर मामले को संज्ञेय अपराध के तौर पर दर्ज करना होगा और उसकी जांच करनी होगी। ऐसे तमाम लंबित मामले जिनमें बच्चा अब भी गायब है, मगर एफआइआर दर्ज नहीं की गई है उनमें एक माह के भीतर रिपोर्ट दायर करनी होगी। गायब होने वाले बच्चों के हर मामले में माना जाएगा कि बच्चा अपहृत हुआ या अवैध व्यापार का शिकार हुआ है।

यह सर्वविदित है कि प्रशासन बच्चों से जुड़े मामलों को लेकर असंवेदनशील और अकर्मण्य है। ऐसी घटनाओं पर दिल्ली उच्च न्यायालय ने दिल्ली पुलिस को काफी पहले यह पता लगाने का निर्देश दिया था कि कहीं यह किसी संगठित अपराध के चलते तो नहीं हो रहा है? क्योंकि इतने बड़े पैमाने पर बच्चों का यों लापता होना, अपने आप में यह बताने के लिए काफी है कि इसके पीछे बच्चों की तस्करी में लिप्त लोगों का हाथ हो सकता है। देखने में आया है कि बच्चों के लापता होेने जैसे बेहद चिंताजनक विषय पर पुलिस का यह मानना रहता है कि कमजोर तबकों के गायब हुए बच्चे या तो कहीं भाग गए हैं या भटक गए हैं और कुछ समय बाद खुद लौट आएंगे। पर यह सच नहीं है क्योंकि विभिन्न शोध, मानवाधिकार आयोग और गैर-सरकारी संगठनों के अध्ययन बताते हैं कि लापता हुए ज्यादातर मासूम तस्करी के शिकार हो जाते हैं।
बच्चों के लापता होने की घटनाएं रोकने के लिए एक राष्ट्रीय नेटवर्क की आवश्यकता है जो न केवल लापता होने का ब्योरा गंभीरता से दर्ज करे, बल्कि उनकी वापसी के तकाजे को भी गंभीरता से ले। गौरतलब कि निठारी कांड के बाद राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने पीसी शर्मा की अगुआई में एक समिति का गठन किया था। समिति की सिफारिशों को गंभीरता से लिया जाता तो देश के नौनिहालों की स्थिति इतनी दारुण न होती। समिति का यह सुझाव आज भी प्रासंगिक है कि बच्चों के लापता होने की घटनाएं रोकने के लिए राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो को राष्ट्रीय पहचान तंत्र गठित करना चाहिए। अध्ययन बताते हैं कि बाल-तस्करी का मुख्य केंद्रबिंदु तीन स्तंभों पर टिका है। पहला, पैसे के लिए यौन शोषण, दूसरा, मजदूरी कराने के लिए शोषण, और तीसरा, अंगों की तस्करी, ऊंट जॉकिंग आदि के लिए। भारत में बच्चों की तस्करी के पीछे सामाजिक-आर्थिक कारण ही मुख्य भूमिका निभा रहा है।

इस अवैध कारोबार को रोकने के लिए हमेशा कड़े कानून की बात की जाती रही है। इसके लिए संयुक्त राष्ट्र का ‘यूएन कन्वेंशंस अगेंस्ट ट्रांसनेशनल आॅर्गनाइज्ड क्राइम’ (द पार्लेमो प्रोटोकॉल) है। भारत में अनैतिक व्यापार निरोधक अधिनियम वेश्यावृत्ति तक सीमित है और इस कारण यह बच्चों के लिए व्यापक वैधानिक संरक्षणकर्ता का दायित्व नहीं निभा सकता। अंगों की तस्करी, बच्चों से भीख मंगवाना अपराध की श्रेणी में आता है, पर कड़े कानून, निगरानी व्यवस्था व विभिन्न संबंधित विभागों के बीच समन्वय तथा सहयोग के अभाव में, बाल-तस्करी में तेजी से इजाफा हो रहा है। ऐसी घटनाओं में तब तक कमी नहीं आएगी जब तक न्यायिक तंत्र और कानून लागू करने वाले महकमे ऐसे मामलों को प्राथमिकता नहीं देंगे। कानून क्रियान्वयन की एक मुख्य खामी यह भी है कि मानव तस्करों और शोषण करने वालों के बारे में जानकारी नहीं रखी जाती।

लापता बच्चों का न मिलना पुलिस और प्रशासन की नाकामी मात्र नहीं है बल्कि उन अभिभावकों की अंतहीन पीड़ा है जिन्हें जीवनपर्यन्त अपने बच्चे से अलग हो जाना पड़ता है। इसलिए यह जरूरी हो गया है कि कुछ ऐसे नए आयामों की ओर दृष्टि डाली जाए जो गुमशुदा बच्चों को तलाशने में मददगार हो सकें। इस दिशा में सोशल मीडिया का उपयोग एक निर्णायक भूमिका निभा सकता है। बच्चे किसी देश और समाज की बुनियाद होते हैं और उनके प्रति संवेदनहीनता, देश के भविष्य के लिए घातक है। इसलिए यह जरूरी है कि बच्चों के संरक्षण व उनके अधिकारों की रक्षा को पहली प्राथमिकता दें।

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App

  1. No Comments.
सबरंग