December 10, 2016

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राजनीतिः आलू में छिपे खजाने को कब पहचानेंगे

सरकार गेहूं व धान की भांति आलू के लिए भी खरीद व भंडारण की सुविधाएं सृजित करे। भुखमरी मिटाने में पेरू से लेकर आयरलैंड तक इसका शानदार रिकार्ड रहा है। तभी तो कार्ल मार्क्स के सहयोगी एंगेल्स की नजर में आलू की वही भूमिका है जो औद्योगिक क्रांति में लोहे की थी। अत: भारत को भी आलू में छिपे खजाने का भरपूर दोहन करना सीखना होगा।

अपने राजनीतिक बयानों को लेकर जब-तब चर्चा में रहने वाले कांग्रेस पार्टी के उपाध्यक्ष राहुल गांधी के आलू की फैक्टरी लगाने वाले बयान ने खासी सुर्खियां बटोरीं। कोई इसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ‘मेक इन इंडिया’ मुहिम पर व्यंग्य बता रहा है तो कोई राहुल गांधी की राजनीतिक अपरिपक्वता करार दे रहा है। यदि राजनीति से परे हट कर देखा जाए तो भारत में आलू की चर्चा नकारात्मक संदर्भों में ही ज्यादा की जाती है। आलू को लेकर राजनेताओं की नींद तभी टूटती है जब मध्य वर्ग से लेकर मीडिया तक आलू की कीमत बढ़ने पर हाय-तौबा मचाने लगता है। हालांकि प्याज की तरह आलू में तख्तोताज बदलने की कुव्वत नहीं है, कम से कम अभी तक नहीं दिखी है। फिर भी आम आदमी की रसोई का बजट बिगाड़ने की हैसियत रखने के कारण राजनेता आलू की कीमतों पर पैनी निगाह बनाए रखते हैं। इस साल भी यही हुआ। सरकार ने आने वाले त्योहारों पर आपूर्ति बढ़ाने और कीमतों को नियंत्रित करने के लिए आलू आयात पर लगे तीस फीसद शुल्क को घटा कर दस फीसद कर दिया। आलू के साथ दूसरी राजनीतिक विडंबना यह है कि जब लागत न निकल पाने के कारण किसान उसे सड़कों पर बिखेरते या फेंकते हैं तब राजनेता उनकी चिंता नहीं करते हैं क्योंकि देश में आलू उगाने वाले किसानों की मजबूत राजनीतिक लॉबी नहीं है।


अगर आलू की वैश्विक स्थिति को देखें तो दूसरी तस्वीर नजर आएगी। पेरू (लैटिन अमेरिका) में सबसे पहले पाई गई इस फसल की खासियत है कि इसे किसी भी मौसम और कितनी भी ऊंचाई पर उगाया जा सकता है। आलू की 99 फीसद प्रजातियां लैटिन अमेरिका में पेरू-चिली के एंडीज पर्वतीय क्षेत्र से निकली हैं। जहां तक जंगली आलू का सवाल है तो यह अमेरिकी महाद्वीप में चिली से संयुक्त राज्य अमेरिका तक उगाया जाता है। लेकिन अमेरिकी महाद्वीप से बाहर इसकी मौजूदगी तकरीबन न के बराबर है। थोड़े-से पानी और महज साठ-सत्तर दिनों में तैयार होने के चलते ही पूरी दुनिया में आलू भोजन के साथ-साथ रोजगार देने में अव्वल है।
इसके साथ-साथ आलू की एक बहुत बड़ी खासियत यह मानी जाती रही है कि यह कम कीमत में सारी दुनिया में आसानी से सुलभ होने वाला एक खाद्य पदार्थ है। इसलिए आलू को गरीबों का आहार कहा जाता रहा है। इसके बावजूद आलू की खपत में भारी क्षेत्रीय विषमता पाई जाती है। कई यूरोपीय देशों में आलू को खाद्यान्न के बराबर अहमियत मिली हुई है तो अफ्रीकी देशों में आलू को आहार का हिस्सा बनने के लिए जद््दोजहद करनी पड़ रही है। आलू की एक खामी यह है कि यह शीघ्र नष्ट हो जाता है। इसीलिए आलू की कुल वैश्विक पैदावार के महज पांच फीसद का कारोबार होता है। आलू की वैश्विक कीमतों के कमोबेश एक जैसी बने रहने की वजह भी यही है।
मक्का, गेहूं, धान के बाद आलू दुनिया की चौथे नंबर की फसल है। विश्व की सबसे ज्यादा उपभोग की जाने वाली सब्जियों में आलू का महत्त्वपूर्ण स्थान है। दुनिया का शायद ही कोई ऐसा देश होगा जहां के रसोईघर में आलू की खपत न होती हो। दुनिया भर में आलू की सैकड़ों प्रजातियां उगाई जाती हैं और हर साल कई नई प्रजातियों का विकास होता है। आलू के संबंध में सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह है कि यह अधिकांशत: छोटे किसानों द्वारा उगाया जाता है और उन्हीं के द्वारा तथा अन्य कमजोर तबकों के द्वारा अधिक उपभोग किया जाता है। दुनिया भर में इसे विविध रूपों में खाया जाता है। पोषक तत्त्वों से भरपूर आलू सरलता से पचता है। इसमें सोलह प्रतिशत कार्बोहाइड्रेट, दो प्रतिशत प्रोटीन, एक प्रतिशत खनिज, उच्च गुणवत्ता का पाचन योग्य रेशा और विटामिन पाया जाता है।
पानी के संकट से जूझ रही दुनिया के लिए आलू की फसल एक राहत के रूप में है। जहां एक किलो धान उगाने में पांच हजार लीटर पानी की जरूरत होती है वहीं आलू के मामले में यह पांच सौ लीटर में ही निपट जाता है। फिर इसे किसी भी परिस्थिति में उगाया जा सकता है और फसल तैयार होने में भी महज दो-ढाई महीने लगते हैं। प्रति हेक्टेयर उत्पादन भी गेहूं व धान की तुलना में दो से चार गुना अधिक होता है। किसी भी अन्य अनाज व सब्जी की तुलना में आलू में प्रोटीन तथा कार्बोहाइड्रेट का अनुपात अधिक पाया जाता है। इसके बावजूद भुखमरी से लड़ने और गरीबों के भोजन के रूप में इसकी जो भूमिका होनी चाहिए वह अभी तक नहीं बन पाई है। यह भूमिका तभी बनेगी जब आलू के आटे का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल शुरू हो जाए।
जहां तक भारत का सवाल है तो आलू के संदर्भ में सबसे दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति यह है कि देश में आलू को गेहूं व चावल के विकल्प के रूप में नहीं देखा गया है। आलू अब भी परंपरागत रूप से सब्जी के रूप में उगाया व खाया जाता है, न कि प्रमुख आहार के रूप में। यही कारण है कि चीन के बाद दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा आलू उत्पादक देश होने के बावजूद भारत में आलू की प्रति व्यक्ति सालाना खपत महज छब्बीस किलो है। जब से मधुमेह का प्रकोप बढ़ा है तब से भारतीयों में आलू की खपत में गिरावट दर्ज की गई है। ताजा वैश्विक भूख सूचकांक ने एक बार फिर यह बताया है कि भारत की गिनती दुनिया के सबसे भूखे देशों में होती है। इसे एक हद तक रूढ़िवादिता ही कहेंगे कि जहां एक ओर भारत दुनिया की सबसे बड़ी भूखी आबादी का घर बना हुआ है वहीं आलू अब भी मुख्य खाद्य फसल के रूप में जगह नहीं बना पाया है। वह सब्जी के अतिरिक्त दक्षिण भारत के डोसे, महाराष्ट्र के पाव बड़े या दिल्ली की आलू कचौड़ी जैसे नाश्ता-पानी में ही मौजूद है।
आलू के साथ दूसरी विडंबना इसके उत्पादकों के साथ जुड़ी है। जिस साल आलू की बंपर पैदावार होती है उस साल यह किसानों के लिए अभिशाप बन जाती है, क्योंकि नई फसल के आते ही कीमतें धड़ाम से नीचे गिर जाती हैं और किसानों को अपनी लागत निकालना कठिन हो जाता है। कई बार तो आलू की कीमतें इतना नीचे गिर जाती हैं कि किसान उसे कोल्ड स्टोरेज से नहीं निकालते हैं। ऐसे में कोल्ड स्टोरेज मालिक अपनी लागत पर आलू को सड़कों पर डंप करने लगे हैं क्योंकि उन्हें आलू की नई फसल को स्टोर करने के लिए तैयारी करनी होती है। हर साल आलू सीजन में घटने वाली इस त्रासदी से किसानों को बचाने का एक तरीका यह है कि उत्पादकक्षेत्रों में आलू आधारित उद्योग स्थापित किए जाएं। इस क्षेत्र में लगी बहुराष्ट्रीय कंपनियां भारी मुनाफा कमा रही हैं। उदाहरण के लिए, आलू के दस ग्राम का पैकेट (वैफर्स) दस रुपए में बिकता है, अर्थात एक हजार रुपए किलो।
आलू की बरबादी का एक बड़ा कारण प्रसंस्करण सुविधाओं की कमी है। भारत में अभी कुल उत्पादित आलू का महज पांच फीसद प्रसंस्कृत किया जाता है, जबकि अमेरिका में छप्पन फीसद, नीदरलैंड में पचपन फीसद, जर्मनी में चालीस फीसद और ब्रिटेन में तीस फीसद आलू प्रसंस्कृत किया जाता है। फिर आलू जैसी शीघ्र नष्ट होने वाली फसल के लिए भंडारण एक बड़ी चुनौती है। देश में कोल्ड स्टोरेज की भारी कमी है व उनकी लागत भी अधिक है। इसका कारण है कोल्ड स्टोरेज की पिछड़ी हुई तकनीक। देश ने सूचना प्रौद्योगिकी क्षेत्र में भले दुनिया भर में अपना लोहा मनवाया हो लेकिन कोल्ड स्टोरेज के मामले में हम पचास साल पीछे हैं। फिर, देश में कोल्ड स्टोरेज का वितरण भी असमान है। यह समस्या तभी दूर होगी जब इस क्षेत्र में नई तकनीक अपनाने के साथ-साथ यह भी हो कि किसानों की सहकारी समितियां कोल्ड स्टोरेज खोलें।

इस चुनौती का दूसरे तरीके से भी सामना किया जा सकता है। उदाहरण के लिए, आलू की ऐसी किस्में तैयार की जाएं जो प्रसंस्करण योग्य हों और उनमें आवश्यक पोषक तत्त्व विद्यमान हों तथा उनकी ‘सेल्फ लाइफ’ अधिक हो। भारतीय कृषि वैज्ञानिकों ने आलू की ऐसी किस्मों को विकसित कर लिया है जिनमें प्रोटीन की भरपूर मात्रा है लेकिन जमीनी परीक्षण यानी फील्ड ट्रायल नहीं होने के कारण इनका व्यावसायिक उत्पादन नहीं हो रहा है।
कुल मिला कर, भारतीय आहार में आलू को वह जगह नहीं मिली जिसका वह हकदार है। यही कारण है कि कभी किसान उसे सड़कों पर फेंकने के लिए मजबूर हो जाता है तो कभी सब्जियां बिना आलू के बेनूर हो जाती हैं। इसका उपाय है कि आलू का उपभोग बढ़ाया जाए और सरकार गेहूं व धान की भांति आलू के लिए भी खरीद व भंडारण की सुविधाएं सृजित करे। आलू भोजन के साथ-साथ रोजगार भी देता है। भुखमरी मिटाने में पेरू से लेकर आयरलैंड तक इसका शानदार रिकार्ड रहा है। तभी तो कार्ल मार्क्स के सहयोगी एंगेल्स की नजर में आलू की वही भूमिका है जो औद्योगिक क्रांति में लोहे की थी। अत: भारत को भी आलू में छिपे खजाने का भरपूर दोहन करना सीखना होगा। ऐसा करने से न केवल गेहूं-चावल के पहाड़ से मुक्ति मिल जाएगी बल्कि पानी की किल्लत का भी समाधान होगा। इतना ही नहीं, इससे आलू किसानों और उपभोक्ताओं का दर्द सदा के लिए दूर हो जाएगा।े

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First Published on October 21, 2016 1:52 am

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