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वक्त की नब्जः वे वादे वे ईरादे!

अधिकतर भारतवासी मोदी को एक काबिल, ईमानदार और अच्छा राजनेता मानते हैं। उनकी कुछ नीतियों पर जिनको शक है वे भी मानते हैं कि उनकी नीयत साफ है। इस लोकप्रियता के बावजूद अगर अर्थव्यवस्था में बहार लाकर नहीं दिखा पाते हैं मोदी, तो 2019 का आम चुनाव जीतना इतना आसान नहीं होगा।
Author September 17, 2017 02:43 am
राहुल गांधी

सच पूछिए तो मेरा बिल्कुल इरादा नहीं था राहुल गांधी का भाषण सुनने का। मालूम था कि कैलिफोर्निया के बर्कले विश्वविद्यालय में भारतीय छात्रों को संबोधित करने वाले थे कांग्रेस के युवराज, लेकिन सोचा कि वही घिसी-पिटी बातें करेंगे, जो अक्सर करते हैं। सो, टीवी को मैंने चालू तक नहीं किया था। फिर ट्विटर से मालूम पड़ा कि राहुल के इस भाषण ने स्मृति ईरानी को इतना नाराज किया था कि बतौर सूचना प्रसारण मंत्री वे युद्धभूमि में दुर्गा का रूप धारण करके उतरी हैं। टीवी चलाया तो देवीजी कांग्रेस के उपाध्यक्ष को ऐसे लताड़ रही थीं जैसे अमेठी में उनकी प्रतिद्वंद्वी फिर से बन गई हों। तब तक राहुल अपना भाषण दे चुके थे, सो मुझे गूगल करना पड़ा पूरा भाषण और उसको बहुत ध्यान से मैंने सुना।

मंगलवार का दिन था और शाम तक भारतीय जनता पार्टी के प्रवक्ता भी टीवी के मैदान-ए-जंग में पहुंच गए थे। आसानी से उन्होंने राहुल के उस आरोप का खंडन किया, जिसमें उन्होंने कहा था कि मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद भारत में हिंसा और नफरत का माहौल बन गया है। इन प्रवक्ताओं ने याद दिलाया कि कांग्रेस के दौर में कितने बेगुनाह सिख और मुसलमान मारे गए थे। याद दिलाया राहुलजी को कि कश्मीर की समस्या उनके परनाना की देन है, मोदी की नहीं। यानी जितने भी राजनीतिक आरोप राहुल ने मोदी पर थोपे थे, उनका खंडन करना बहुत आसान था। लेकिन मोदी सरकार की आर्थिक नीतियों पर जो आरोप लगाए ‘शहजादा साहब’ ने बर्कले में, उनका खंडन आसान नहीं था।

राहुल ने नोटबंदी के बारे में कहा कि इसकी वजह से छोटे कारोबारों को गहरी चोट पहुंची थी और इस सदमे से उबर ही रहे थे छोटे कारोबार कि अब जीएसटी का बोझ उठाना पड़ रहा है। सो, कई छोटे कारोबार पूरी तरह तबाह हो चुके हैं और अर्थव्यवस्था में वृद्धि दर भी कम हो गई है गलत नीतियों के कारण। नतीजा यह है कि रोजगार पैदा नहीं कर पाई है मोदी सरकार और भारत को जरूरत है तीस हजार नई नौकरियां रोज पैदा करने की।
क्या यह आरोप सच नहीं है? मैं राहुल की कोई प्रशंसक न कभी रही हूं और न आज हूं, लेकिन फिर भी कहने पर मजबूर हूं कि उन्होंने मोदी सरकार की आर्थिक नीतियों पर जो टिप्पणी की, वह बिल्कुल सही है। मेरी जानकारी में कई छोटे कारोबारी हैं, जो अपने कारोबार बंद करना चाहते हैं, क्योंकि जो कसर बाकी थी नोटबंदी के बाद, वह जीएसटी ने पूरी कर दी है।

पिछले हफ्ते मेरे जानकार एक छोटे कारोबारी ने मुझे अपना दुखड़ा सुनाया इन शब्दों में- ‘हम निर्यात करते हैं बहुत छोटे तौर पर। लकड़ी के कुर्सी-मेज हम यहां से भेजते हैं यूरोप में, जहां ये चीजें बहुत महंगी होती हैं। इस बार जब हम कस्टम्स में पहुंचे अपना सामान लेकर तो बताया गया कि हमको उससे जो पंद्रह फीसद मुनाफा मिलता है, उसको फिक्स्ड डिपॉजिट में जमा करना पड़ेगा और यह पैसा हमको अगले साल ही मिलेगा। हमने जब कस्टम्स अधिकारियों से पूछा कि मुनाफे के बिना हम अपना एक्स्पोर्ट बिजनेस कैसे चलाएंगे तो उन्होंने कहा कि वे हमारी कोई मदद नहीं कर सकते, क्योंकि नए नियम यही हैं। हम इतने मायूस हो गए हैं कि अपना कारखाना बंद करने का सोच रहे हैं।’

वित्तमंत्री अगर अपने जासूस भारत के छोटे शहरों में भेजने का कष्ट करेंगे, तो इस तरह के कई किस्से उनको सुनने को मिलेंगे। बड़े उद्योगपति भी प्रभावित हैं जीएसटी से, लेकिन नए नियमों को समझने के लिए वे वकील और अन्य विशेषज्ञों को नियुक्त कर सकते हैं। छोटे कारोबारी ऐसा करने की गुंजाइश नहीं रखते, सो बुरी तरह पिट रहे हैं। ऐसा नहीं कि जीएसटी अपने आप में गलत किस्म का कर है, लेकिन नोटबंदी का असर थोड़ा कम होने के बाद लागू किया जाता, तो शायद लोगों को इतनी तकलीफ नहीं होती।

जिस उत्साह से अमदाबाद के लोगों ने पिछले सप्ताह जापान के प्रधानमंत्री शिंजो आबे और प्रधानमंत्री मोदी का स्वागत किया, उससे स्पष्ट होता है कि व्यक्तिगत तौर पर नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता में कोई कमी नहीं आई है। सर्वेक्षण भी कहते हैं कि तीन वर्षों के कार्यकाल के बाद भी अधिकतर भारतवासी मोदी को एक काबिल, ईमानदार और अच्छा राजनेता मानते हैं। उनकी कुछ नीतियों पर जिनको शक है वे भी मानते हैं कि उनकी नीयत साफ है। इस लोकप्रियता के बावजूद अगर अर्थव्यवस्था में बहार लाकर नहीं दिखा पाते हैं मोदी तो 2019 का आम चुनाव जीतना इतना आसान नहीं होगा। उनको पूर्ण बहुमत मिला ही इस उम्मीद से था कि वे भारत में संपन्नता लाकर दिखाएंगे। इस उम्मीद से भी लोगों ने उनको वोट दिया कि भ्रष्टाचार और भ्रष्ट सरकारी अधिकारियों से उनको निजात मिलेगी।

सो, अपने कार्यकाल के बाकी दो वर्षों में अगर मोदी प्रशासनिक और आर्थिक सुधार ला पाते हैं, तो 2019 में उनकी जीत पक्की है। लेकिन ऐसा नहीं कर पाते हैं तो कांग्रेस का पुनर्जीवन तब तक संभव है। बर्कले में कांग्रेस के युवराज ने जो तीर छोड़ा वह अपने निशाने तक न पहुंचा होता, तो मोदी सरकार के प्रवक्ता इतने परेशान न दिखते। न ही मैदान-ए-जंग में दिखते वरिष्ठ मंत्री सफाई देते हुए। भारत के नौजवानों की सबसे बड़ी समस्या है बेरोजगारी। इस बात को प्रधानमंत्री मोदी अच्छी तरह जानते हैं, क्योंकि जब मुख्यमंत्री थे गुजरात के, उन्होंने देहातों के अपने दौरों में देखे होंगे जवान लड़कों के वे झुंड, जो बेकार बैठे दिखते हैं गांव-गांव में। इनके लिए कहां से पैदा होंगे रोजगार के अवसर अगर अर्थव्यवस्था की वार्षिक वृद्धि फिर से छलांग मार कर आठ फीसद तक नहीं पहुंचती है?

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  1. R
    raj kumar
    Sep 17, 2017 at 3:30 pm
    उम्मीद अभी भी है और gst के पूरी तरह रंगत में आने के बाद कारोबार और गति पकड़ेगा
    (0)(1)
    Reply
    1. Sidheswar Misra
      Sep 17, 2017 at 12:15 pm
      आप की सोच आप को मुबारक .दुनिया के किसीभी अर्थशस्त्री ने नॉट बंदी को ी नहीं माना .९९पर्तिशत नॉट बैंको में जमा हुई .मोदी जी को वही लोग छह रहे है जो इन तीन वर्षो में लुटा .यू ा के पूर्व राष्ट्रपति इडोअमीन की तरह सपना देखते है .जो नेबुल पुरुस्कार को नकारे ,जो हार्ड वर्क बनाम हार्वर्ड कहे .अपने को सर्व ज्ञानी .
      (0)(2)
      Reply