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हवाई वादे तल्ख हकीकत

वित्तमंत्री ने आत्ममुग्धता के भाव में अपनी पीठ ठोकते हुए बड़ी ठसक के साथ एलान किया है कि आर्थिक माहौल में आई तब्दीली के बावजूद सरकार वित्तवर्ष 2016-17 में राजकोषीय घाटा जीडीपी के 3.5 फीसद स्तर पर बरकरार रखेगी।
वित्‍त मंत्री अरुण जेटली ने सोमवार को बजट 2016 पेश किया। (Source: PIB)

एक अंग्रेजी कहावत के मुताबिक कोई भी असली तथ्य विस्तारित आंकड़ों में छुपा (डेविल इज इन डिटेल) होता है। भाजपा की अगुवाई वाली राजग सरकार का तीसरा बजट पेश करते हुए वित्तमंत्री अरुण जेटली ने संसद में (और संसद के बाहर) जो सुनहरे सपनों का संसार दिखाया, उसमें और बजट दस्तावेजों की पड़ताल से सामने आई वास्तविक तस्वीर के बीच दो दुनियाओं का फर्क है। सरसरी नजर से देखें तो बजट में छोटी-छोटी ‘स्मार्ट’ घोषणाओं की इतनी भरमार है कि एक दफा ‘अच्छे दिनों’ का भ्रम होने लगता है, मगर इन सतही घोषणाओं के नीचे का सच जल्द ही भ्रम दूर कर देता है। वास्तव में, बजट की नजदीकी पड़ताल से पता चलता है कि जिस बजट को गरीब और ग्रामीण भारत को बड़ा सहारा देने वाला ‘पुश फैक्टर’ कह कर प्रचारित किया जा रहा है वह दरअसल नीतियों के स्तर पर बड़ी कंपनियों और निवेशकों का बजट है। खर्च में हुई कटौती पर मामूली वित्तीय आबंटन वाली घोषणाओं की झड़ी लगा कर असलियत को छुपाने का प्रयास किया गया है।

मगर बजट केवल खर्च और वित्तीय अनुमानों का लेखा-जोखा भर नहीं है। बदली आबोहवा में बजट को पूरे वित्तवर्ष के दरम्यान अर्थव्यवस्था को राह दिखाने वाले प्रकाश-स्तंभ के रूप में देखा जाता है। इस पैमाने पर बजट को परखने के लिए उस भंवर पर निगाह डालनी होगी जिसमें भारतीय अर्थव्यवस्था फिलवक्त फंसी हुई है। मोटे तौर पर तीन बड़े संकट इस समय हमारी अर्थव्यवस्था पर छाए हुए हैं। पहला, वैश्विक अर्थव्यवस्था बेहद खराब दौर से गुजर रही है। भारतीय अर्थव्यवस्था का इंजन कहे जाने वाले सेवा क्षेत्र में अहम योगदान देने वाली सूचना प्रौद्योगिकी कंपनियों का कारोबार अमेरिका और पश्चिमी यूरोप में है। ये दोनों ही क्षेत्र आर्थिक सुस्ती से नहीं निकल पा रहे हैं। निर्यात आधारित विकास मॉडल में बुनियादी बदलाव करने की कोशिश कर रही चीनी अर्थव्यवस्था भी रास्ता भटक गई है वहीं जापान भी आर्थिक विकास की पटरी पर नहीं लौट पाया है। सीधे लफ्जों में कहें तो वैश्विक आर्थिक माहौल अनुकूल नहीं है।

ऐसे में अर्थव्यवस्था को गति देने का एक ही रास्ता बचता है कि घरेलू माहौल दुरुस्त कर आंतरिक मांग को बढ़ाया जाए। लेकिन हमारी अर्थव्यवस्था की दूसरी बड़ी दिक्कत यह है कि लगातार दो असफल मानसून के कारण ग्रामीण हिस्सा बुरी तरह चरमरा गया है। उदारीकरण के चलते वैश्विक अर्थव्यवस्था से गुंथे हुए होने के कारण विकसित देशों के आर्थिक संकट ने सेवा क्षेत्र पर टिकी शहरी आबादी की कमर तोड़ रखी है वहीं दशकों से मानसून (भगवान) भरोसे छोड़ दी गई खेतिहर आबादी सूखे के कारण मुसीबत में है। ऊपर से, इस मुश्किल आर्थिक माहौल को और खराब करने का काम किया है तीसरे कारण, यानी बिगड़े हुए राजनीतिक माहौल और कड़वी बहस से उपजी राजनीतिक अस्थिरता ने। ऐसी पृष्ठभूमि में आम बजट से उम्मीद की जा रही थी कि नकारात्मक तिकड़ी को खत्म करने का स्पष्ट खाका देश के सामने रखा जाएगा, मगर अफसोस कि ऐसा नहीं हुआ।

बजट की शुरुआत में वित्तमंत्री ने (और जिसे प्रधानमंत्री समेत कई लोग कई दफा दोहरा चुके हैं) दावा कि अस्थिर आर्थिक माहौल के बावजूद भारतीय अर्थव्यवस्था ‘स्थिरता का गढ़’ बनी हुई है और विकास दर चालू वित्तवर्ष में सात फीसद से ऊपर रहने का अनुमान है। मुश्किल यह है कि कोई भी इस दावे की असलियत पर एतबार करने को तैयार नहीं है क्योंकि इस ऊंचाई की विकास दर से मिलने वाले फायदे धरातल पर नहीं दिख रहे हैं। कुछ अर्थशास्त्री इस विकास दर को ‘कृत्रिम रूप से निर्मित’ करार दे रहे हैं और इस कल्पित तेजी के लिए सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी गणना के तरीके में बीते साल किए गए बदलाव को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं। यहां तक कि भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर रघुराम राजन ने भी इस आंकड़े पर शंका जताई है। मौजूं सवाल यह है कि जो अर्थव्यवस्था सात फीसद से ज्यादा की विकास दर के साथ आगे बढ़ रही है उसमें रोजगार-निर्माण के मोर्चे पर इस कदर निराशा का माहौल क्यों है? जाहिर है, जीडीपी के हवाई दावे की खुशफहमी वास्तविक असर के अभाव में बाकी लोग स्वीकार करने को तैयार नहीं हैं।

बजट में दूसरी बड़ी घोषणा राजकोषीय घाटे के मोर्चे पर हुई है। वित्तमंत्री ने आत्ममुग्धता के भाव में अपनी पीठ ठोकते हुए बड़ी ठसक के साथ एलान किया है कि आर्थिक माहौल में आई तब्दीली के बावजूद सरकार वित्तवर्ष 2016-17 में राजकोषीय घाटा जीडीपी के 3.5 फीसद स्तर पर बरकरार रखेगी। इस घोषणा के गहरे मायने हैं, लिहाजा इस पर थोड़ा तफसील से निगाहें डालते हैं। चूंकि देश के बिगड़ते सियासी माहौल और प्रतिकूल वैश्विक आर्थिक माहौल से आशंकित विदेशी पूंजी का पलायन जारी है, लिहाजा यह घोषणा हुई है।

मगर बड़ी पूंजी के आगे घुटने टेकते हुए भारत जैसी विकासशील अर्थव्यवस्था में राजकोषीय घाटे को इतने कम स्तर तक ले जाने की इस अतार्किक जिद की सबसे बड़ी कीमत आम जनता को चुकानी पड़ेगी। सरकार के पास कोई अलादीन का चिराग नहीं है जिससे राजकोषीय घाटे को इस सीमा के भीतर कर दिया जाएगा। दूसरे शब्दों में कहें तो राजकोषीय घाटे को इस सीमा में रखने का सीधा-सीधा मतलब है कि सरकार किफायतशारी के नाम पर सामाजिक और ग्रामीण विकास की योजनाओं के आबंटन में कटौती करेगी। गरीब और मध्यम वर्ग को अलग-अलग जिंसों पर दी जाने वाली सबसिडी पर भी, ‘तार्किक’ बनाए जाने के नाम पर, कैंची चलाई जाएगी। एक ऐसे समय में, जबकि ग्रामीण अर्थव्यवस्था बुरी तरह संकट में फंसी हुई है, राजकोषीय घाटे को साढ़े तीन फीसद की सीमा में रखने की जिद खेती-किसानी की मुश्किलों की आग में घी का काम करेगी।

असल में राजकोषीय घाटा ऊंचा रहने के कारण कॉरपोरेट समूहों के मालिकों को निवेश पर मिलने वाले प्रतिफल में कमी आती है। आईएमएफ और विश्व बैंक से जब कोई देश कर्ज लेता है तो उस देश को इन संस्थानों का ‘संरचनात्मक सुधार कार्यक्रम’ लागू करना होता है। सरकारी खर्च में कमी करके राजकोषीय घाटे को कम से कम रखना इस कार्यक्रम का अहस हिस्सा है। अचरज नहीं होना चाहिए कि वित्तमंत्री ने अपने बजट का शुरुआती अहम भाग राजकोषीय घाटे को काबू में करने के मुद््दे पर लगा दिया। बड़ी कंपनियों पर ‘पुरानी तिथि से लागू होने वाला कर’ नहीं लगाए जाने की बजटीय घोषणा को भी इसी तारतम्य में देखना चाहिए। दरअसल, एक तरह से यह कंपनियों पर बकाया करोड़ों रुपए के कर्ज की माफी है।

बजट में की गई कर संबंधी घोषणाओं पर गौर कीजिए। वित्तमंत्री ने कहा है कि प्रत्यक्ष कर प्रस्तावों में 1060 करोड़ रुपए की कमी की जाएगी, वहीं अप्रत्यक्ष कर प्रस्तावों में 20,600 करोड़ रुपए का खासा इजाफा किया जाएगा। कहना न होगा कि यह लक्ष्य अधिभार (सैस) लगा कर हासिल किया जाएगा, जिसका सबसे बुरा असर आम आदमी पर पड़ेगा। अप्रत्यक्ष करों की बनावट और अधिरोपण की तरीका ही ऐसा है कि एक सीमा के अधिक होने पर यह मुद्रास्फीति को हवा देता है। ऐसे में पहले से ही नरम घरेलू मांग और कुंद हो जाएगी। एक तरह से, बजट में सरकार ने बड़ी आमदनी वाले लोगों और कंपनियों के हितों को सुरक्षित रखने के फेर में व्यापक अर्थव्यवस्था के हितों की उपेक्षा कर दी है। सौ करोड़ और पांच सौ करोड़ रुपए के मामूली आबंटन वाली छोटी-मोटी घोषणाओं को परे रख कर अगर बड़े तराजू पर इस बजट को तौलें तो कह सकते हैं कि सरकार के कर प्रस्तावों से महंगाई कम होने के बजाय और बढ़ेगी।

रोजगार के मोर्चे पर भी निराशा ही हाथ लगी है। इस मामले में किए गए बजटीय प्रावधान सरकार की ‘जुमला नीति’ को आगे बढ़ाते प्रतीत होते हैं। ‘भारत में निर्माण’ (मेक इन इंडिया) के तमाम हवाई दावों के बावजूद विनिर्माण क्षेत्र में बढ़त का कोई नामो-निशान नहीं है। लगातार ग्यारह महीनों से निर्यात में जबर्दस्त गिरावट जारी है, सेवा क्षेत्र में ठहराव बना हुआ है और कृषि क्षेत्र में गिरावट थमने का नाम नहीं ले रही। क्या कोई समझदार शख्स इस बात पर यकीन करेगा कि पांच सौ करोड़ रुपए के आबंटन से करोड़ों कामकाजी हाथों के लिए रोजगार पैदा हो जाएंगे या खाद्य उत्पादों के उत्पादन और विनिर्माण में सौ फीसद विदेशी निवेश की अनुमति देने से आत्महत्याओं, सूखे व गिरते फसल उत्पादन की जकड़ में फंसे कृषि क्षेत्र का संकट दूर हो जाएगा? वित्तमंत्री ने इस बजट को ‘आकांक्षाओं और उम्मीदों’ को पूरा करने वाला बताया है, लेकिन इसकी कोई ठोस रणनीति बजट में नहीं दिखती।

अगर आवरण को परे रखें तो नीतिगत रूप से इस बजट और यूपीए सरकार के बजटों में कोई खास फर्क नहीं है। मुद्रास्फीति से समायोजित करके देखें तो शिक्षा से लेकर ग्रामीण विकास तक की अधिकतर योजनाओं के आबंटन में कटौती की गई है। अंतर इतना भर है कि बड़ी कंपनियों और उच्च आय वर्ग के लोगों को दी गई राहतों पर छोटी-मोटी कथित ‘बड़ा बदलाव’ लाने वाली योजनाओं की चिप्पी लगा दी गई है। गरीबों के लिए ‘अच्छे दिनों’ का वादा भी काला धन वापस लाने की तरह एक और जुमला भर साबित हुआ है। चूंकि बजट में अर्थव्यस्था की बुनियादी कमजोरियों को दूर करने का उपाय नहीं किया गया है, लिहाजा आने वाले दिनों में खासकर आम आदमी की मुश्किलें और बढ़ने के ही आसार हैं।

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