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एटमी संयंत्रों की सुरक्षा का सवाल

ऊर्जा मंत्रालय की मानें तो देश में तकरीबन छह हजार स्थानों पर लघु पनबिजली परियोजनाएं स्थापित की जा सकती हैं।
प्रतीकात्मक चित्र

पिछले दिनों परमाणु ऊर्जा विभाग द्वारा मुंबई स्थित भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र (बार्क) में आयोजित पांच दिवसीय कार्यशाला में भारत के परमाणु वैज्ञानिकों के इस दावे पर- कि हमारे यहां किसी भी परमाणु हादसे की आशंका बेहद कम है और देश के परमाणु रिएक्टर बेहद सुरक्षित हैं- भरोसा करना इसलिए कठिन है कि न सिर्फ दिल्ली के मायापुरी में हुई विकिरण की घटना में एक व्यक्ति की मौत हुई बल्कि बेहद सुरक्षित समझे जाने वाले देश के एक परमाणु रिएक्टर में चेचक जैसी संक्रमण की खामियां भी उजागर हुर्इं। अब भी भारतीय वैज्ञानिक गुजरात के काकरापार परमाणु ऊर्जा संयंत्र में रिसाव की गुत्थी नहीं सुलझा पाए हैं। गौरतलब है कि 11 मार्च 2016 की सुबह काकरापार में 220 मेगावाट की यूनिट में भारी जल रिसाव शुरू हो गया था और उसे आपातस्थिति में बंद करना पड़ा। परमाणु विशेषज्ञों की मानें तो एक दुर्लभ मिश्रधातु से निर्मित पाइपों पर चेचक जैसा संक्रमण देखने को मिला।यही नहीं, विफल हुए प्रशीतन चैनल में तीन दरारें भी पाई गई हैं।

यहां ध्यान देना होगा कि जिस किस्म के रिएक्टर में काकरापार में रिसाव हुआ है, उस किस्म के कुल सत्रह रिएक्टर भारत संचालित करता है और कुल मिलाकर ऐसे पांच हजार प्रशीतन चैनल हैं। चूंकि काकरापार रिएक्टर से स्वीकार्यता के स्तर से ज्यादा विकिरण का रिसाव नहीं हुआ इसलिए यह ज्यादा खतरनाक साबित नहीं हुआ। पर अहम सवाल है कि परमाणु रिएक्टरों के पास रहने वाले लोगों का जीवन किस तरह सुरक्षित माना जाए और कैसे आश्वस्त हुआ जाए कि अगर रिसाव होता है तो वे कैंसर जैसी घातक बीमारियों की चपेट में नहीं आएंगे?
यह तथ्य है कि परमाणु रिएक्टरों के रिसाव या विस्फोट से इलेक्ट्रान, प्रोट्रॉन के साथ न्यूट्रान तथा अल्फा, बीटा, गामा किरणें प्रवाहित होती हैं, जिनके कारण उस क्षेत्र का तथा उसके आसपास के क्षेत्रों का समस्त पर्यावरण नष्ट हो जाता है। विभिन्न प्रक्रमों में प्रयुक्त होने वाली परमाणु भट्ठियों तथा इनमें प्रयुक्त र्इंधन में रेडियोधर्मी तत्त्व होते हैं।

इनके रिसाव या विस्फोट के कारण तापक्रम इतना अधिक बढ़ जाता है कि धातु तक पिघल जाती है। सोलह किलोमीटर तक चारों ओर के स्थान में विस्फोट से सारी लकड़ी जल जाती है। ऐसे रिसाव से नए-नए रेडियोधर्मी पदार्थ पर्यावरण में मिल जाते हैं जो अपने विकिरणीय प्रभाव द्वारा समस्त जैव मंडल के घटकों को प्रभावित करते हैं। मौजूदा समय में विश्व में चार सौ से अधिक परमाणु संयंत्र कार्यरत हैं जिनमें कई बार भयंकर दुर्घटनाएं भी हो चुकी हैं जिनके कारण पर्यावरण में रेडियोधर्मी पदार्थ फैले हैं। पच्चीस वर्ष पहले यूक्रेन में हुए चेरनोबिल एटमी हादसे से दुनिया हिल गई थी। इस घटना के बाद यूरोप में एक भी परमाणु रिएक्टर नहीं लगा। जापान के फुकुशिमा रिएक्टर में भी विस्फोट हो चुका है। हालांकि इस विस्फोट में किसी की जान नहीं गई, लेकिन इसका विकिरण सैकड़ों किलोमीटर तक फैला। भारत खुद परमाणु दुर्घटना का शिकार हो चुका है। 1987 में कलपक्कम रिएक्टर का हादसा, 1989 में तारापुर में रेडियोधर्मी आयोडीन का रिसाव, 1993 मेंनरौरा के रिएक्टर में आग, 1994 में कैगा रिएक्टर और 11 मार्च, 2016 को काकरापार यूनिट से भारी जल रिसाव की घटना सामने आ चुकी है।

इस समय भारत में तकरीबन बाईस रिएक्टर हैं जिनकी क्षमता 6780 मेगावाट है। अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी यानी आईएईए के मुताबिक विश्व में परमाणु ऊर्जा संयंत्रों की संख्या 774 है। 243 परमाणु संयंत्रों में बिजली का उत्पादन हो रहा है। चौबीस देशों के पास परमाणु पदार्थ हथियार के लिए उपलब्ध हैं। अगर इन परमाणु रिएक्टरों की सुरक्षा का पुख्ता इंतजाम नहीं हुआ तो रिसाव से लाखों लोगों की जिंदगी काल की भेंट चढ़ सकती है। यहां सवाल सिर्फ रिएक्टरों में होने वाले रिसाव तक सीमित नहीं है। अब परमाणु रिएक्टर आतंकियों के निशाने पर भी हैं। ब्रसेल्स में आतंकी हमले के बाद संयुक्त राष्ट्र और आईएईए ने आशंका जताई है कि आतंकी अब परमाणु बिजलीघरों को भी निशाना बना सकते हैं। पूर्व में ब्रिटिश थिंक टैंक चाथम हाउस ने भी इन परमाणु ऊर्जा संयंत्रों पर साइबर हमले का अंदेशा जताया था।
अमेरिकी संस्था ‘न्यूक्लियर थे्रट इनीशिएटिव’ द्वारा पिछले वर्ष जनवरी में जारी परमाणु सुरक्षा सूचकांक में भी कुछ ऐसी ही आशंका जताई गई है।

इस सूचकांक के मुताबिक भारत परमाणु सुरक्षा के लिहाज से फिलहाल बेहतर स्थिति में है। चौबीस देशों की सूची में उसे इक्कीसवां स्थान हासिल है। भारत को सौ में छियालीस अंक मिले हैं। सूचकांक में पहले स्थान पर आस्ट्रेलिया और दूसरे तथा तीसरे स्थान पर क्रमश: स्विट्जरलैंड व कनाडा हैं। भारत अंतरराष्ट्रीय सहयोग की ओर भी अग्रसर है, हालांकि देश में परमाणु सुरक्षा के लिए एक स्वतंत्र नियामक संस्था की कमी है। ऐसा माना जा रहा है कि अगर आतंकी परमाणु रिएक्टरों को निशाना बनाते हैं तो उस स्थिति में संयंत्र से बेहद खतरनाक रेडियोधर्मी विकिरण होगा और वातावरण में इनके मिलने से बड़ी संख्या में लोगों की जान जा सकती है। इसलिए कि संयंत्रों में आमतौर पर यूरेनियम और प्लूटोनियम का प्रयोग र्इंधन के रूप में होता है। परमाणु वैज्ञानिकों का मानना है कि परमाणु संयंत्रों के कंप्यूटरों को साइबर हमले से बचाने के लिए इंटरनेट की सार्वजनिक सुविधा से दूर रखा जाना चाहिए। परमाणु वैज्ञानिकों द्वारा रेडियाधर्मी प्रदूषण से निपटने के लिए कई अन्य महत्त्वपूर्ण उपाय भी सुझाए गए हैं।

मसलन, परमाणु बिजलीघरों तथा रिएक्टरों की स्थापना नगरों तथा आबादी से दूर की जानी चाहिए। रिएक्टर संयंत्र के रखरखाव में सतर्कता बरती जानी चाहिए। किसी भी प्रकार की संभावित दुर्घटना से सुरक्षा व बचाव के उपायों की व्यवस्था आवश्यक है। रेडियोधर्मी तत्त्वों का प्रयोग शांति, आर्थिक व औद्योगिक विकास के लिए किया जाना चाहिए। रेडियोधर्मी तत्त्वों का प्रयोग सैनिक तथा युद्ध संबंधी उद््देश्यों के लिए पूरी तरह प्रतिबंधित होना चाहिए। परमाणु बिजलीघर में उत्पन कचरे को ऐसे क्षेत्रों में दफनाना चाहिए जहां से रेडियोधर्मी विकिरण से मानवजाति, जीव-जंतुओं और वनस्पतियों को नुकसान न पहुंचे। अंतरराष्ट्रीय कानून बना कर भूमिगत, वायुमंडल और जलमंडल में परमाणु परीक्षणों पर प्रतिबंध लगाया जाना चाहिए।

आंकड़ों के मुताबिक 1945 के बाद से दुनिया में कम से कम 2060 ज्ञात परमाणु परीक्षण हो चुके हैं जिनमें से पचासी फीसद परीक्षण अमेरिका और रूस ने किए हैं। भारत हमेशा परमाणु शक्ति का उपयोग लोगों के जीवन-स्तर को सुधारने के लिए करने का पक्षधर रहा है, न कि उसके सामरिक उपयोग का। भारत का तीन स्तरीय स्वदेशी परमाणु विकास का कार्यक्रम शांतिपूर्ण उद््देश्यों के लिए ही है। यह ऊर्जा उत्पादन का एक अहम अंग है। चूंकि शीतयुद्धोत्तर युग के आर्थिक सुधारों तथा विश्व में भूमंडलीकरण के बाद आए नए बदलावों ने परमाणु कार्यक्रमों को बहुत महत्त्वपूर्ण बना दिया, लिहाजा भारत को भी अपनी बढ़ती ऊर्जा जरूरतें पूरी करने के लिए परमाणु संयंत्रों की स्थापना करना आवश्यक था। लेकिन साथ-साथ सुरक्षा का भी पुख्ता बंदोबस्त हो।

परमाणु रिएक्टर ऊर्जा के एकमात्र स्रोत नहीं हैं। अन्य स्रोतों से भी ऊर्जा हासिल की जा सकती है। अकेले पवन ऊर्जा से ही 48500 मेगावाट बिजली बनाई जा सकती है। ऊर्जा मंत्रालय की मानें तो देश में तकरीबन छह हजार स्थानों पर लघु पनबिजली परियोजनाएं स्थापित की जा सकती हैं। इसी तरह सौर ऊर्जा से भी पांच हजार खरब यूनिट बिजली का उत्पादन हो सकता है। बेहतर होगा कि भारत परमाणु रिएक्टरों की सुरक्षा को और पुख्ता करने के साथ-साथ पवन तथा सौर ऊर्जा के विस्तार की दिशा में भी तेजी से कदम बढ़ाए।

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