April 28, 2017

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राजनीतिः गुजारे के लिए पलायन की पीड़ा

हमारे नीति नियंता पलायन को आर्थिक विकास के लिए जरूरी मानते हैं। लेकिन पलायन करने वाले श्रमिकों के अधिकारों की रक्षा करने में उनकी कोई दिलचस्पी नहीं है। इससे गांव का आर्थिक और सामाजिक ताना-बाना तेजी से टूट रहा है। खेती और किसानी आज अंतिम सांसें गिन रहे हैं। विकास के कथित एजेंडे में गांवों के लिए कोई ठोस योजना नहीं है।

Author April 8, 2017 04:34 am
(फाइल फोटो)

हरे राम मिश्र

आदिवासी बहुल और खनिज संपन्न झारखंड के मूल निवासियों की कितनी फिक्र यहां की राज्य सरकार को है, इसकी असलियत ग्रामीण इलाकों में जाकर देखी जा सकती है। झारखंड के गठन के बाद, अगर कु छ बदला है तो के वल लूट का तरीका बदला है। इससे आम झारखंडी को कोई लाभ नहीं हुआ है। गौरतलब है कि चेरो और खरवार बहुल आदिवासियों वाला लातेहार जिले का मनिका ब्लॉक इन दिनों पलायन की विभीषिका से बुरी तरह जूझ रहा है। गांव के गांव सूने हो चुके हैं। ऐसा लगता है जैसे यहां कि सी महामारी ने अपने पैर फै लाए थे और सबको समेट क रके लौट गई हो। क ई घरों में ताले लटके हुए हैं। इन गांवों में कु छ बच्चे दिखते हैं जो कि क क्षा छह-सात में पढ़ते हैं। साथ में बुजुर्ग दादा-दादी भी उनकी देखरेख के लिए यहीं गांव में रह रहे हैं। लेकि न इन बच्चों के माता-पिता, इनके छोटे भाई-बहनों के साथ र्इंट- भट्ठों में काम क रने के लिए दूसरे राज्यों में पलायन क र चुके हैं। अब इनक ी वापसी जून के अंतिम सप्ताह में तब होगी जब बरसात आएगी और र्इंट- भट्ठे के काम खत्म हो जाएगा। इस इलाके में पलायन की विभीषिका का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सक ता है कि यहां

के प्राथमिक स्कू लों में बच्चे ही नहीं हैं। ये स्कू ल इसलिए खाली हैं कि इनमें पढ़ने वाले बच्चे अपनी मां के बिना रह ही नहीं सक ते। चंकि बिना पूरे परिवार के पलायन कि ए इनके अभिभावकों का काम नहीं चल सक ता था, इसलिए साथ में बच्चों को रखना भी इनकी मजबूरी थी। इस तरह से क ई गांवों में के वल बूढ़े, अशक्त और बीमार लोग ही बचे हुए थे। शिक्षा का अधिकार कानून की असलियत अगर देखनी हो तो इस इलाके का रु ख जरू र क रना चाहिए। ऐसा नहीं है कि पलायन क रने वाले लोगों के पास खेती के लिए जमीन नहीं है। चेरो राजवंश इस इलाके में शासन क र चुका है और खरवार इस क्षेत्र में क भी सामंत थे। इनके पास जमीनें हैं लेकि न सिर्फ खेती से इनका काम नहीं चल पाता। इस इलाके में धान ही मुख्य फ सल के रू प में उगाया जाता है और यह सब पूरी तरह से वर्षा आधारित होता है। खेतों से अनाज को समेट लेने के बाद, इस क्षेत्र के लोगों के पास कोई ऐसा रोजगार नहीं होता जो उन्हें साल के बारह महीने क्र यशक्ति दे सके । लिहाजा, रोजगार की तलाश में बाहर जाना जरू री होता है। स्थानीय स्तर पर रोजगारहीनता की इस स्थिति में, इस इलाके के लोग ज्यादातर श्रमप्रधान असंगठित क्षेत्र जैसे -भट्ठा और विनिर्माण उद्योग में काम क रने के लिए अन्य राज्यों में सपरिवार पलायन क रते हैं। जो परिवार कि सी कारणवश पलायन नहीं क र पाते हैं उनके पुरु ष-सदस्यराजधानी रांची में रिक्शा चलाते हैं।

श्रम-प्रधान कार्यों के लिए मजदूर उपलब्ध क राने के मामले में यह इलाका ठेके दारों के लिए पसंदीदा स्थल बन चुका है। यहां से श्रमिक बंगाल, बिहार, उत्तर प्रदेश पंजाब, बंगलुरु तथा हैदराबाद तक काम करने के लिए सपरिवार जाते हैं। बहरहाल, अब सवाल यह है कि पलायन की इस त्रासदी की असल वजहें क्या हैं? और इसके लिए कौन जिम्मेवार है? इसका हल क्या है और राज्य तथा केंद्र सरकार इस दिशा में ठोस पहल क्यों नहीं क र रही हैं? दरअसल, इस इलाके में पलायन की मुख्य वजह स्थानीय स्तर पर रोजगार का अभाव है। आज जिन आर्थिक नीतियों पर केंद्र और राज्य की सरकारें आगे बढ़ रही हैं वहां गांव के वल श्रम उपलब्ध क रवाने की एक मंडी भर रह जाएंगे। हमारे नीति नियंता पलायन को आर्थिक विकास के लिए जरू री मानते हैं। लेकि न पलायन क रने वाले मिकों के अधिकारों की रक्षा क रने में उनकी कोई दिलचस्पी नहीं है। इससे गांव का आर्थिक और सामाजिक ताना-बाना तेजी से टूट रहा है। खेती और कि सानी आज अंतिम सांसें गिन रहे हैं। विकास के क थित एजेंडे में गांवों के लिए कोई ठोस योजना नहीं है। भले ही पलायन को हतोत्साहित क रने और स्थानीय स्तर पर रोजगार उपलब्ध क राने की योजना के रू प में मनरेगा की सफ लता का ढिंढोरा पीटा गया हो, लेकि न सच्चाई है कि यह योजना अपने मक सद में फे ल हो चुकी है। इसमें भ्रष्टाचार की अनगिनत शिकायतें हैं।

सबसे पहले मामूली मजदूरी, फिर काम मिलने का संकट, और उसके बाद मजदूरी भुगतान में महीनों का विलंब और भ्रष्टाचार ने इस पूरी योजना को एक बोझ में तब्दील क र दिया है। इस योजना से जुड़े क ई सामाजिक कार्यकर्ता मानते हैं कि मनरेगा अपने उद्देश्य में विफ ल हो चुकी है और पलायन के सिलसिले को रोक नहीं पाई है। यही नहीं, सरकार की अनिच्छा यह बताती है कि वह इस योजना की क मियों को दूर क रने को लेक र तनिक गंभीर नहीं है। इस क्षेत्र से पलायन की दूसरी सबसे बड़ी वजह आदिवासियों से उनकी वन उपजों को छीन लिया जाना है। तेंदूपत्ता हो या फिर कीमती लकड़ियां और अन्य वन उपज- सब कु छ वन विभाग के माध्यम से कु छ शक्तिशाली लोगों के पास गिरवी हो गया है। कीमती वन उपजों पर अगर इन आदिवासियों का कब्जा होता तो उनकी क्रयशक्ति बेहतर होती। लेकि न उनके जंगल से उन्हें ही खदेड़ दिया गया। जंगल से मिलने वाली उपजों में के वल महुआ एक ऐसी फसल है जिस पर आदिवासियों का हक होता है। लेकिन महुआ चुनने के बाद इसे बहुत कम दामों में सक्रिय बिचौलियों द्वारा खरीद क र रख लिया जाता है। इस तरह से इस फ सल का वास्तविक मूल्य भी इन आदिवासी परिवारों को नहीं मिल पाता। बात यहीं तक सीमित नहीं है। इस क्षेत्र में बाक्साइट, जिप्सम, लाइम और अन्य क ीमती धातुओं क ा खनन भी होता है। पट्टे पर होने वाले इस खनन में भी स्थानीय लोगों क ो रोजगार नहीं लमिल पाता है। इस खनन के लिए ठेके दार अन्य राज्यों से मजदूर लाते हैं ताकि उत्पीड़न के खिलाफ मजदूर कि सी तरह की लामबंदी न क र सकें। जहां तक आदिवासियों के बीच क ल्याण योजनाओं क ी पहुंच क ा सवाल है, गांव के मुखिया उससे भी ‘एडवांस’ के तौर पर खूब पैसा बनाते हैं। मुझे एक बूढ़ी महिला ने इस संदर्भ में बताया था कि इंदिरा आवास स्वीकृ त क राने के लिए जब उसने मुखिया से क हा तो मुखिया ने सबसे पहले दस हजार रु पए की मांग की।

बाकी के दस हजार रु पए आवास स्वीकृ त होने पर देने थे। एक विधवा होते हुए उसके पास दस हजार रु पए क हां से आएंगे? इसलिए उसे आज तक कोई आवास नहीं मिला और वह झोपड़ी में रह रही है। जब मैंने उनसे क हा कि आप लोग इस सब के खिलाफ शिकायत क्यों नहीं क रते, तो उसने क हा कि सेक्रे टरी से लेक र साहब तक सभी लोग पैसा खाते हैं। असल में पलायन की त्रासदी आदिवासियों को क्रयशक्ति से जुड़ी हुई है। अगर उनके जल, जंगल और जमीन को उनके हवाले क र दिया जाए तो उनके पास साल के बारह महीने जंगली उत्पादों से क्र यशक्ति बनी रहेगी। मनरेगा में भ्रष्टाचार को समाप्त क रने के लिए भी ठोस क दम उठाने पड़ेंगे। खनन पट्टों को पारदर्शी तरीके से ग्राम सभा की सहमति से आबंटित क रते हुए स्थानीय कामगारों को रोजगार देने की नीति का सख्ती से पालन क रवाना होगा। इन सबके अतिरिक्त, सरकार को असंगठित तबके के लिए न्यूनतम अठारह हजार रु पया प्रतिमाह वेतन तय क रना होगा जिससे कि छह आदमी के परिवार का गुजारा हो सके ।

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First Published on April 8, 2017 4:34 am

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