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दूसरी नजरः असहमति का हनन आजादी का हनन है

सैन्य कार्रवाई महानिदेशक (डीजीएमओ) के मुताबिक, ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ पाकिस्तान-अधिकृत कश्मीर में, नियंत्रण रेखा के पास ‘लांच पैड्स’ पर की गई।
Author October 16, 2016 01:50 am
New Delhi: Director General Military Operations (DGMO), Ranbir Singh salutes after the Press Conferences along with External Affairs Spokesperson Vikas Swarup, in New Delhi on Thursday. India conducted Surgical strikes across the Line of Control in Kashmir on Wednesday night. PTI Photo by Shirish Shete (PTI9_29_2016_000022B) *** Local Caption ***

सैन्य कार्रवाई महानिदेशक (डीजीएमओ) के मुताबिक, ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ पाकिस्तान-अधिकृत कश्मीर में, नियंत्रण रेखा के पास ‘लांच पैड्स’ पर की गई। डीजीएमओ पर मुझे भरोसा है, जैसे कि हमने पहले के महानिदेशकों और पहले के सेनाध्यक्षों पर किया है। डीजीएमओ ने कहा कि दुश्मन को ‘महत्त्वपूर्ण क्षति’ हुई, पर उन्होंने इसका कोई आंकड़ा नहीं दिया। उन्होंने सावधानी बरतते हुए इस पर जोर दिया कि इसे आगे जारी रखने की कोई योजना नहीं है। देश ने उनकी और सेना की भूरि-भूरि सराहना की।
लेकिन जो संदेश था, वह तर्जुमे या अर्थ समझाने में कहीं खो गया। यह निश्चय ही एक ऐसे शख्स के पास खो गया, जिन्हें संयम रखना चाहिए था- वह थे रक्षामंत्री। सैन्य कार्रवाई के बाद उन्होंने ही सबसे बढ़-चढ़ कर बयान दिए हैं, खूब सारी अतिरंजना, और इस तरह उन्होंने उन लोगों के बीच भी अपनी हंसी उड़वाई जो अमूमन सरकार के समर्थन में रहे हैं।

सच्चाई की बलि
थोड़ा ठहर कर सोचें। क्या रक्षामंत्री के बयान में कोई सच्चाई थी, या कोई औचित्य था, जब उन्होंने कहा कि-
* हनुमान की तरह सेना भी अपने शौर्य को भूली हुई थी, जब तक कि मैंने उसे उसकी शक्ति और क्षमता का अहसास नहीं करा दिया;
* ऐसी कार्रवाई पहले कभी नहीं हुई और सेना ने पहली बार सर्जिकल स्ट्राइक को अंजाम दिया;
* दुनिया में कहीं भी इस तरह की कार्रवाई ऐसी शानदार सफलता के साथ संपन्न नहीं हुई;
* इस कार्रवाई ने तीस साल की असहायता और निराशा एक झटके में दूर कर दी, और लोग खुशी से झूम उठे।
अगर इन बातों से कोई फर्क नहीं पड़ता तो इन्हें पहली बार केंद्र में मंत्री बने शख्स का उत्साह मान कर नजरअंदाज किया जा सकता था। दुर्भाग्य से, ऐसी बातों के अपने नतीजे होंगे। और मैं समझता हूं कि शायद इसीलिए प्रधानमंत्री ने अपने मंत्रियों को आगाह किया कि वे शेखी न बघारें। यह हिदायत देते समय प्रधानमंत्री के दिमाग में अगर रक्षामंत्री नहीं, तो और कौन रहा होगा? लेकिन पर्रीकर बाज नहीं आए। उनका स्वयं पर अंकुश नहीं है और वे इस हकीकत से अनजान हैं कि उन्होंने खुद को एक तमाशा बना लिया है।

रणनीतिक संयम के लाभ
जैसा कि सेना के प्रवक्ता ने कहा, ‘यह न तो पहली बार हुआ न आखिरी बार होगा।’ नियंत्रण रेखा एक संधि-रेखा है। यह भारत और पाकिस्तान, दोनों के हित में है कि 2003 में हुए संघर्ष विराम समझौते को दोनों पक्ष जहां तक हो सके और जब तक हो सके, बनाए रखें। अगर समझौते का कोई पक्ष उल्लंघन करेगा, तो दूसरी तरफ से जवाबी कार्रवाई होगी। दोनों तरफ की सेनाएं इस सामान्य नियम को जानती हैं। पहले भी उल्लंघन और बदले की घटनाएं हुई हैं। किसी और ने नहीं, खुद पूर्व सेना प्रमुख जनरल बिक्रम सिंह ने पिछले दिनों इस बात की पुष्टि की। किसी और ने नहीं, खुद पूर्व राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार शिवशंकर मेनन ने नियंत्रण रेखा के आर-पार होने वाली ऐसी कार्रवाइयों की प्रकृति की व्याख्या की। और ‘द हिंदू’ अखबार ने रिकार्ड खंगाले तथा ‘आॅपरेशन जिंजर’ (2011) के बारे में एक ऐसी रिपोर्ट प्रकाशित की, जिसे झुठलाया नहीं जा सकता।
यूपीए सरकार ‘रणनीतिक संयम’ की नीति पर चल रही थी। किसी ने भी तब इस नीति पर गंभीरता से सवाल नहीं उठाए थे। इसका लाभ जम्मू-कश्मीर में हिंसा के स्तर में कमी के तौर पर नजर आया:
वर्ष घटनाएं मारे गए मारे गए मारे गए
सुरक्षा कर्मी नागरिक आतंकवादी
2004 2565 281 707 976
2005 1990 189 557 917
2006 1667 151 389 591
2007 1092 110 158 472
2008 708 75 91 339
2009 499 78 71 239
2010 488 69 47 232
2011 340 33 31 100
2012 220 38 11 50
2013 170 53 15 67
2014 222 47 28 110
2015 208 39 17 108
केवल हद दर्जे का मूढ़ व्यक्ति ही कहेगा कि यूपीए सरकार की नीति अविवेकपूर्ण या गलत थी। स्थिति 2014 से बदलने लगी, फिर भी घटनाओं तथा विपदाओं की संख्या नियंत्रण में थी।
गुरदासपुर, पठानकोट, पंपोर और उड़ी की वजह से एक गुणात्मक बदलाव आया। मौजूदा सरकार को रणनीतिक संयम की नाति की समीक्षा करने का हक है। नियंत्रण रेखा के पार कार्रवाई का आदेश देने का भी उसे हक है, और समझदारी इसी में है कि सेना की कार्रवाई के पीछे रहे राजनीतिक निर्णय को वह स्वीकार करे। लेकिन सरकार को यह हक नहीं है कि वह अतिरंजना में डूब जाए और पिछली सरकारों तथा उनकी नीतियों को खामखां लांछित करे।
आलोचना है आजादी
रक्षामंत्री की आलोचना होगी। बदली हुई (और दिखने में धौंस भरी) नीति की आलोचना होगी। इस बात की भी आलोचना होगी कि सेना के स्तर पर की गई ‘रणनीतिक कार्रवाई’ को सरकार के स्तर पर ‘नीतिगत औजार’ बताने के क्या नतीजे होंगे इसका ठीक से जायजा नहीं लिया गया। यही नहीं, विकल्प भी सुझाए जाएंगे।
सवाल भी पूछे जाएंगे। नियंत्रण रेखा के आसपास होने वाली कार्रवाई असाधारण हमला (डीप स्ट्राइक) कैसे हो गई। क्या ‘लांच पैड’ मिसाइलों से संबंधित नहीं है? नियंत्रण रेखा लांघ कर की गई कार्रवाई और लक्षित हमले (सर्जिकल स्ट्राइक) में क्या फर्क है? क्या डीजीएमओ ने कार्रवाई के फलस्वरूप हुई मौतों के आंकड़े दिए?
आलोचना- और सवाल- सार्वजनिक बहसों को जीवंत बनाते हैं। यह आजादी का मर्म है। आगामी दिनों की घटनाएं बताएंगी कि आलोतक सही थे या गलत। लेकिन अगर आलोचक गलत साबित हों, तब भी इससे वे गैर-देशभक्त या राष्ट्र-विरोधी नहीं हो जाते।
स्वतंत्रता आंदोलनों तक की आलोचना हुई है। युद्ध के दिनों केनेता भी पराजित हुए हैं। नागरिकों के बीच गृहयुद्ध लड़े गए हैं, पर किसी पक्ष ने देशभक्त कहे जाने के अधिकार को जब्त नहीं किया। सारी उथल-पुथल के बीच भी आजादी-पसंद लोगों ने बोलने की आजादी और अभिव्यक्ति के अधिकार को कायम रखा। अगर असहमति की आवाज कुचली जाती है, तो यह आजादी का हनन है। मुझे अंदेशा है कि सरकारों के भीतर, राजनीतिक दलों के भीतर, मीडिया में और सोशल मीडिया में ऐसे लोगों की कमी नहीं, जो आजादी की आवाज का गला घोंटना चाहते हैं।

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First Published on October 16, 2016 1:30 am

  1. A
    Amit
    Oct 16, 2016 at 4:11 am
    Absolutely rubbish....
    Reply
  2. R
    ramkishan
    Oct 16, 2016 at 7:02 pm
    अब तो आरएसएस को लाइन ऑफ़ कण्ट्रोल सोंप देना चाहिए . पर्रिकर साहेब कमांडिंग अफसर होंगे नै ड्रेस मैं आरएसएस देख कर पाकिस्तान के होश उड़ जायेंगे
    Reply
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