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असुरक्षा की सड़क पर

सर्वोच्च न्यायालय के आदेश के मुकाबिक सहायता करने वाले व्यक्ति को किसी भी स्थिति में कानूनी दांव-पेच में नहीं उलझाया जाएगा।
उच्चतम न्यायालय (File Photo)

सेव लाइफ फाउंडेशन नामक संगठन ने 2012 में सर्वोच्च न्यायालय में एक याचिका दायर की थी। इसमें बताया गया था कि सड़क दुर्घटनाओं या किसी अन्य कारण से घायल और मरणासन्न व्यक्ति की सहायता राहगीर इसलिए नहीं करते क्योंकि पुलिस उन्हें परेशान करती है। इसके बाद केंद्र सरकार ने सभी राज्यों और केंद्र-शासित प्रदेशों को इस संबंध में कुछ दिशा-निर्देश जारी किए थे।

अभी तक होता यह था कि यदि कोई व्यक्ति निस्वार्थ भाव से किसी घायल की मदद करता तो पुलिसकर्मी दुर्घटना की जांच में एक गवाह के तौर पर ऐसे व्यक्ति से पूछताछ के बहाने उसे परेशान करते थे। उनकी पूछताछ का तरीका इतना क्षुब्धकारी होता था कि घायल की सहायता करने वाला व्यक्ति सोचने लगता था कि अब से वह किसी की सहायता नहीं करेगा। ऐसी परिस्थितियों में जनसामान्य में धीरे-धीरे यह धारणा बन गई कि कहीं भी किसी घायल की मदद करना अपने को जोखिम में डालना है। इस कारण कई बार दुर्घटनाओं में चोटिल पड़े व्यक्तियों को समय पर चिकित्सा न मिल पाने के कारण उनकी मृत्यु हो जाती थी।

लेकिन अब ऐसी स्थिति उत्पन्न नहीं होगी। अब घायलों या चोटिल व्यक्तियों की सहायता करने वाले निश्चिंत होकर मानव धर्म निभा सकते हैं। केंद्र सरकार ने इस बारे में सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष कुछ प्रस्ताव रखे थे। इन्हें सर्वोच्च न्यायालय ने संस्तुत कर दिया है। न्यायमूर्ति वी गोपाल गौड़ा और न्यायमूर्ति अरुण मिश्र के खंडपीठ ने दुर्घटना-पीड़ितों की सहायता करने वाले व्यक्तियों के पक्ष में सरकार द्वारा प्रस्तुत दिशा-निर्देशों को तत्काल और तत्परता से लागू करने का आदेश दे दिया। न्यायालय ने इनका व्यापक प्रचार-प्रसार करने के साथ-साथ इनके ठोस क्रियान्वयन की व्यवस्था करने को भी कहा है। अब घायलों की मदद करने वालों को लंबी कानूनी प्रक्रिया से भी नहीं गुजरना होगा।

सर्वोच्च न्यायालय के निर्णयानुसार, दुर्घटनाग्रस्त व्यक्ति को चिकित्सालय पहुंचाने के बाद सहायता करने वाले पथिक को जाने दिया जाएगा। पुलिस उसे अनावश्यक रूप से परेशान नहीं करेगी। पुलिस ऐसे व्यक्ति को अपना नाम-पता देने के लिए विवश नहीं करेगी। पुलिस द्वारा अभियोजन के लिए उस पर कोई दबाव नहीं डाला जाएगा। पुलिस उसकी इच्छा के विरुद्ध उसे गवाह नहीं बनाएगी। हां, सहायता करने वाला व्यक्ति स्वेच्छा से गवाह बन सकता है। यदि घायल की सहायता करने वाला दुर्घटना का गवाह भी है और वह न्यायालय में खुद नहीं आना चाहता तो उसकी गवाही का न्यायिक परीक्षण वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के द्वारा किया जा सकेगा। सहायता करने वाले व्यक्ति को किसी भी स्थिति में कानूनी दांव-पेच में नहीं उलझाया जाएगा। न्यायालय के आदेश का पालन न करने वाले पुलिसकर्मियों और चिकित्सालयों के विरुद्ध कार्रवाई होगी।

इसके अतिरिक्त, यदि घायलों की सहायता करने वाला व्यक्ति दुर्घटना की पुलिस जांच में गवाह बनने को तैयार होता है तो उससे सम्मान सहित पूछताछ की जाएगी। उसके साथ जाति, धर्म, लिंग, राष्ट्रीयता या किसी अन्य आधार पर कोई भेदभाव नहीं होगा। गवाह बनने को तैयार सहायता करने वाले व्यक्ति से उसकी सुविधा के स्थान पर ही पूछताछ की जाएगी। इस स्थिति में पुलिसकर्मी उससे मिलने सादी वर्दी में आएंगे। यदि किसी कारणवश सहायता करने वाले व्यक्ति को यह सुविधा नहीं मिल पाती है तो उसे थाने में बुलाया जाएगा, लेकिन पुलिस को उसे थाने में बुलाने का कारण लिखित रूप में देना होगा। यदि सहायता करने वाला व्यक्ति थाने में आकर घटना के साक्ष्य बताने का विकल्प चुनता है तो पुलिस को उससे एक बार में ही सब कुछ पूछ कर यह कार्य तय समय-सीमा के अंदर ही पूरा करना होगा। यदि सहायता करने वाला व्यक्ति जांच अधिकारी की या स्थानीय भाषा नहीं समझता तो ऐसी स्थिति में अधिकारी को दुभाषिया का प्रबंध करना होगा। जिन मामलों में सहायता करने वाला राहगीर दुर्घटना का साक्षी भी है उसे शपथपत्र देकर दुर्घटना का वर्णन देना होगा। यह कार्रवाई भारतीय दंड संहिता की धारा 296 के अंतर्गत की जाएगी।

देखा जाए तो शहरों में सड़क दुर्घटनाओं या किसी अन्य कारण से घायल हुए लोगों की सहायता नहीं करने की प्रवृत्ति भारतीयों में अंग्रेजों के समय से है। भ्रष्टाचार यदि उस शासकीय व्यवस्था में था भी तो एक पेशेवर तरीके से। उससे आम आदमी को प्रत्यक्ष रूप से कोई समस्या न थी। लेकिन स्वतंत्रता-प्राप्ति के बाद राजनीति के गिरते स्तर ने समाज पर भी अपना दुष्प्रभाव छोड़ा और परिणामस्वरूप मिल-जुल कर रहने वाला समाज आत्म-केंद्रित होता गया।

उदारीकरण के बाद देश की अर्थव्यवस्था में उछाल लाने के लिए बैंकों ने तरह-तरह के ॠण देने शुरू कर दिए। फिर लोगों ने कर्ज लेकर मकान, वाहन आदि खरीदने शुरू कर दिए। एक-डेढ़ दशक की इस प्रक्रिया के बाद भारत में तेजी से मकान भी बने और सड़कों पर यातायात की रेलमपेल भी शुरू हो गई। लेकिन इसके सार्थक परिणाम प्रगतिशील समाज की वैचारिकता के हिसाब से नहीं आए। लोगों ने भौतिक चीजों का इस्तेमाल करना तो धड़ल्ले से शुरू कर दिया लेकिन उनमें चीजों के इस्तेमाल की एक सामान्य समझ व जागरूकता का अभाव हमेशा रहा और अब भी है। मोटरगाड़ियों की बढ़ती खरीद-फरोख्त से देशी-विदेशी वाहन उद्योग ने भारत में जोर पकड़ा और एक दशक में देश के उस आदमी के पास भी कर्ज का घर और गाड़ी हो गई जो अपने तीन जून के भोजन को दो जून करने पर कब का विवश हो गया था।

यातायात की अव्यवस्था दशकों से रही है। नीतिगत पंगुता तो इस देश में पिछले साठ-पैंसठ सालों से बरकरार है। उसमें कोई कमी नहीं आई। फलस्वरूप कुत्सित राजनीति के नेतृत्व में देश के लोगों का जीवन-स्तर सार्थक वैचारिक विकास के फॉर्मूले से हट कर चीजों के आसुरी उपभोग के तरीकों तक सिमट गया। इसी के तहत लोगों ने मोटरगाड़ियों का प्रयोग किया। सड़कों पर सरकार के तमाम यातायात सुरक्षा अभियानों के बावजूद ऐसी समझदारी नहीं दिखती, जिससे लगे कि पढ़े-लिखे या सलीके से चलने वाले लोग गाड़ियों में बैठे हैं।

इस देश में यातायात नियमों की जानकारी अस्सी प्रतिशत वाहन चालकों को नहीं है। यहां वाहन चलाने का लाइसेंस संबंधित विभाग यातायात नियमों की योग्यता के आधार पर नहीं बनाता। वाहनों के ज्यादार लाइसेंस देश में रिश्वत देकर बने हैं। इन स्थितियों में सड़कों पर यातायात की सुव्यवस्था की कल्पना करना हवा में लाठी भांजने के समान है। भारत में सड़क दुर्घटनाएं राहगीरों की गलती से नहीं बल्कि वाहन चालकों की गलती से होती हैं। वाहन चालक यातायात के नियमों को धता बताते हुए आपको सड़क किनारे तक रौंदने का दुस्साहस रखते हैं।

इस देश में बेतहाशा बढ़ती सड़क दुर्घटनाओं के कारणों में एक बड़ा कारण मदिरापान करके वाहन चलाना है। जो दस प्रतिशत लोग यातायात नियमों का पालन करते हुए वाहन चलाना चाहते हैं उनका भी सड़क पर चलना इसलिए मुश्किल हो जाता है क्योंकि अगर वे नब्बे प्रतिशत निरंकुश वाहन चालकों के हिसाब से अस्त-व्यस्त तरीके से वाहन न चलाएं तो उन्हें उनकी गाड़ी से निकाल कर पीट दिया जाए या उनसे गाली-गलौज कर उन्हें उनके वाहन सहित कहीं सड़क किनारे कर दिया जाए। ऐसे किस्से भारत में आम हैं। महानगरों में ऐसे वाकये रोज सड़कों पर देखे जा सकते हैं। फिर, दूरदराज की स्थिति क्या होगी, इसकी कल्पना की जा सकती है।

देश के कुछ फिल्मी अभिनेता अपने वास्तविक जीवन में कभी-कभी यह भी भूल जाते हैं कि उन्हें रील लाइफ के स्टंट नहीं करने चाहिए। बॉलीवुड के एक अभिनेता के खिलाफ अपनी कार से फुटपाथ पर सोते हुए लोगों को कुचलने के आरोप में मामला चला। आरोप था कि उन्होंने शराब पीकर अपनी किसी व्यक्तिगत कुंठा में गाड़ी फिल्मी स्टाइल में चलाई, नशे में गाड़ी की गति पर नियंत्रण नहीं रख सके और सोए हुए लोगों पर गाड़ी चढ़ गई। कई साल इस मामले की न्यायिक सुनवाई हुई, पर आखिर में अदालत ने अभिनेता को रिहा कर दिया। यहां अमीर लोगों की तरफ से स्वाभाविक रूप से प्रश्न उठ सकता है कि क्या फुटपाथ सोने के लिए है। लेकिन इन्हीं लोगों को यह भी सोचना चाहिए कि पैदलपथ नशे में गाड़ी हांकने के लिए भी नहीं हैं। सरकार ने उसके लिए सड़कें बना रखी हैं। और गाड़ी की गति की सीमा भी यातायात नियमों के तहत निर्धारित की गई है।

उक्त अभिनेता जैसे कितने लोग इस मुगालते में न रहें कि वे अमीरी की सुविधा को ढूंढ़ते हुए सरकारी नियमों के विरुद्ध कुतर्क करें। जिस तरह आधी रात के वक्त अभिनेता सड़क पर गाड़ी लेकर घूम रहा था उसी तरह कोई राहगीर आधी रात को फुटपाथ पर पैदल भी घूम सकता है। इसका मतलब यह तो नहीं कि वह पैदल पथ पर ही गाड़ी चढ़ा दे। और शुक्र है कि ऐसे लोगों के पास टीन-टप्पर से बना रबर पर चलने वाला वाहन है। यदि इनके हाथ में तीव्र गति से चलने वाला रोड रोलर हो और ये नशे की हालत में उसे चला रहे हों तब क्या हो! ऐसी स्थिति की कल्पना ही बहुत भयावह है। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इस संबंध में विभिन्न सड़क दुर्घटनाओं का संज्ञान लेकर जो हालिया निर्णय दिया है वह आम आदमी को आश्वस्त करने वाला है। इससे यही संदेश गया है कि सड़क दुर्घटनाओं के शिकार हुए लोगों को बचाने के लिए हमें हर हाल में आगे आना चाहिए।

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