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स्त्री-पुरुष समता की भाषा

विकास नारायण राय सोनिया गांधी बेशक देश की एक प्रमुख राजनीतिक पार्टी की हाइकमान हों, पर एक स्त्री के रूप में उनकी भी हैसियत भारतीय समाज में भला कितनी भिन्न हो सकती है! केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह की मर्दाने ठहाकों के बीच बेहद चलताऊ ढंग से उन पर की गई नस्लवादी चुटकी के संदर्भ में […]
Author April 7, 2015 16:07 pm

विकास नारायण राय

सोनिया गांधी बेशक देश की एक प्रमुख राजनीतिक पार्टी की हाइकमान हों, पर एक स्त्री के रूप में उनकी भी हैसियत भारतीय समाज में भला कितनी भिन्न हो सकती है! केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह की मर्दाने ठहाकों के बीच बेहद चलताऊ ढंग से उन पर की गई नस्लवादी चुटकी के संदर्भ में उन्हें शालीनतावश कहना पड़ा कि टिप्पणी व्यक्ति-विशेष की विकृत मानसिकता की उपज है जिस पर वे चुप रहना चाहेंगी। इसी तरह, स्मृति ईरानी मोदी सरकार की कितनी भी तेजतर्रार मंत्री हों, पर संसद में शरद यादव की छिछोरी भंगिमा को चुनौती दे पाना उनके लिए भी ‘मर्दानी’ दुनिया के चक्रव्यूह में फंसने जैसा अनुभव रहा।

इस दुनिया में उनके मंत्रिमंडलीय सहयोगी रविशंकर प्रसाद सदन में तमाम ‘मर्दों’ के साथ यादव के सुर में खींसे निपोरते दिखे। अंत में जब यादव ने ईरानी पर पुरुषवादी आंख तरेरी (मैं आपको अच्छी तरह जानता हूं!) तो उन्हें भी चुप हो जाना ही शालीन लगा होगा। विशेषाधिकारों से भरा जीवन जीने वाली ये दोनों महिलाएं भी सामाजिक यथार्थ को समझती ही होंगी। किसी को भी इस मुगालते में नहीं जीना चाहिए कि माननीय सांसदों की विकृत लैंगिक मानसिकता के उपरोक्त प्रदर्शन अपवादस्वरूप हैं।

फिलहाल महिला वकीलों की एक याचिका पर सर्वोच्च न्यायालय में निर्भया मामले के अभियुक्तों के वकीलों के विरुद्ध स्त्रियों को बलात्कार का जिम्मेवार ठहराने वाली उनकी अपमानजनक टिप्पणियों को लेकर सुनवाई चल रही है। इस बीच उत्तर प्रदेश में शासक दल के एक विधायक ने भी इन वकीलों जैसे ही तर्क सार्वजनिक रूप से महिला मुद््दों के मंच से व्यक्त किए हैं।

वरिष्ठ सांसद शरद यादव से लेकर गोवा के मुख्यमंत्री लक्ष्मीकांत पारसेकर तक, औसत भारतीय मर्द के नजरिए से, स्त्री के रूप-रंग को लेकर रोजमर्रा के कटाक्ष की ही बानगी नजर आते हैं। देखा जाए तो सर्वोच्च न्यायालय के सामने अचानक एक असाधारण संवैधानिक अवसर आ गया है- लैंगिक समानता की भाषा को कानूनी जामा पहनाने का। भारत सरकार को दिशा-निर्देश जारी करने का कि अनुसूचित जाति-जनजाति कानून की तर्ज पर, जो जातिसूचक अभिव्यक्तियों को दंडनीय ठहराता है, स्त्रियों के प्रति अपमानजनक एवं भेदभावपूर्ण लैंगिक संबोधनों आदि को भी अपराध करार देने के लिए नया कानून लाया जाए।

ऐसा नहीं है कि लैंगिक भाषा कानून अपने आप में कोई चमत्कारिक दवा सिद्ध होगा, कि समाज से इस तरह की विकृत मानसिकता देखते देखते छूमंतर हो जाएगी। पर जैसा कि अनुसूचित जाति-जनजाति के क्षेत्र में हुआ है, भाषाई मानकता का दबाव यहां भी अपना काम करेगा। कम से कम सार्वजनिक रूप से लैंगिक अभिव्यक्ति के अपमानजनक रूपों पर कानूनी शिकंजा तो कसेगा।

संस्कृति और आम संस्कृति में प्रचलित स्त्री की खिल्ली उड़ाने का मिजाज दुरुस्त करना पड़ेगा और मीडिया प्रचारित पुरुषवादी नैतिकता और स्त्री-विरोधी व्यावसायिकता को लैंगिक छानबीन के दायरे में लाया जा सकेगा। देखा जाए तो महिला क्षेत्र में ऐसे कानून का व्यावहारिक असर अनसूचित जाति-जनजाति क्षेत्र के कानून से भी ज्यादा दूरगामी होगा, क्योंकि भाषागत दुरुस्तगी की लगाम सार्वजनिक और पेशेवर स्पेस में ही नहीं पारिवारिक और निजी स्पेस में भी महसूस की जाएगी।

गिरिराज सिंह ने जहां विकृत भाषा को निजी बातचीत बताया और पार्टी के निर्देश पर एक रस्मी खेद प्रकट किया, शरद यादव ने न केवल स्वयं को लगातार सही ठहराया बल्कि उनका खुला समर्थन करने वालों की कमी भी नहीं रही। स्पष्ट है कि ये दोनों महानुभाव स्वयं भी एक लैंगिक बराबरी की भाषा के सामाजिक प्रचलन में न होने का शिकार हैं।

कौन नहीं जानता कि हम जिन शब्दों में स्वयं को व्यक्त करते हैं उसका प्रभाव हमारी मानसिकता के गठन पर कुछ न कुछ होता ही है। क्या केंद्र और राज्यों के महिला आयोगों को रूटीन आनुष्ठानिक वक्तव्यों से आगे बढ़ कर लैंगिक भाषा कानून का मसविदा सर्वोच्च न्यायालय में पेश नहीं करना चाहिए? क्या उन्हें इस तरह के अध्ययन नहीं करने चाहिए जिनके अंतर्गत लैंगिक बराबरी की भाषा गढ़ने पर निरंतर काम हो सके?

समाज में ही नहीं, सरकारी कामकाज में भी, यहां तक कि विधायिका और न्यायपालिका में भी, सर्वोच्च न्यायालय को भी महिला वकीलों की याचिका का निपटारा करने में ऐसे अध्ययनों का लाभ मिलना चाहिए। भारतीय संसद को भी अपने दो माननीय सदस्यों को उनके हाल पर नहीं छोड़ देना चाहिए और उनके जैसों के मार्गदर्शन के लिए भाषा और लैंगिकता के अंतर्संबंधों के शोध निष्कर्षों को खंगालना चाहिए।

भारत में गिने-चुने विश्वविद्यालय और शोध संस्थान ही ऐसे इक्का-दुक्का शोध-कार्य हाथ में लेते हैं और उनके निष्कर्ष व्यवहार में शायद ही कभी इस्तेमाल किए जाते हों। पश्चिमी विकसित देशों में अब ये अध्ययन आम हो चले हैं और इनके निष्कर्षों को सामाजिक और कानूनी मान्यता भी मिलती है। कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय, बर्कले की भाषाशास्त्री रॉबिन लाकौफ ने 1975 में प्रकाशित अपनी किताब ‘लैंग्वेज ऐंड वुमंस प्लेस’ में तीन सामान्य-सी लगती अवधारणाओं पर आधारित ‘शिष्टता का सिद्धांत’ प्रतिपादित किया था- स्वयं को लादो मत, सुनने वाली को विकल्प दो और सुनने वाली को अच्छा महसूस करने दो।

मैं गिरिराज सिंह या शरद यादव जैसों की बात नहीं जानता, जो जाहिर है इन अवधारणाओं पर खरे नहीं उतर सके, पर लैंगिक मुद्दों पर होने वाली कार्यशालाओं में मुझे नियमित रूप से बहुतायत ऐसे लोगों की ही मिलती है जिन्होंने अपने दांपत्य जीवन में एक बार भी, जी हां एक बार भी, अपनी पत्नी को कृपया या धन्यवाद जैसे सामान्य शिष्टाचार से संबोधित नहीं किया होता है। क्या उनके लिए कुछ नहीं किया जाना चाहिए?

स्त्री के साथ सत्ता शब्द आज भी अजीब क्यों लगता है? किसी स्त्री को लेकर जो शब्द इस्तेमाल होता है वह है ‘सशक्तीकरण’, न कि ‘सत्ता’। राजनीति के शीर्ष पर पहुंचने के बावजूद सोनिया गांधी या स्मृति ईरानी को भी शालीनता के नाम पर चुप रहना पड़ता है! क्या एक दोयम दर्जे के मर्द राजनेता की भी क्षमता या स्वीकार्यता पर इसी तरह अपमानजनक ढंग से प्रश्नचिह्न लगाया जा सकता है? क्या वैसा करने पर सिंह और यादव स्वयं भी उसी अंदाज में अपमानजनक कटाक्षों के निशाने पर नहीं पहुंचा दिए गए होते? मुझे लगता है, जैसे राजनीति के शीर्ष पर विराजमान इन दो महिलाओं ने भारतीय मर्द की रूढ़ (स्टीरियोटाइप) मानसिकता को जबर्दस्त घुड़की पिलाने का ऐतिहासिक क्षण खो दिया हो। यह एक ऐसा क्षण था जिसमें सोनिया के ऊर्जाहीन पड़े नेतृत्व को गति प्रदान करने की क्षमता थी; जो स्मृति के आभाहीन मंत्रित्व में दीर्घकालिक चमक का माध्यम बन कर छा सकता था।

याद कीजिए 2014 के लोकसभा चुनाव में मोदी के अनवरत वाक-प्रहारों के नीचे छटपटाती कांग्रेस के लिए गिने-चुने याद रखने योग्य प्रसंगों में से एक को। भाजपा के स्टार प्रचारक ने प्रियंका गांधी को कृपा भरे शालीन अंदाज में अपनी बेटी जैसा बताया। कैमरे की आंखों में आंखें डाल कर प्रियंका ने उन्हें तुर्की-ब-तुर्की जवाब से निरुत्तर कर दिया था- मैं राजीव गांधी की बेटी हूं!

बहुत दिन नहीं हुए, भारतीय संसद का लैंगिक चरित्र उडविन की डाक्युमेंट्री पर लगाई गई सरकारी रोक के गिर्द हुई बहस में उजागर हो चुका है। जावेद अख्तर ने राज्यसभा में कहा कि बलात्कारियों के समर्थन में जैसी आपत्तिजनक भाषा डाक्यूमेंट्री में दोषियों और उनके वकीलों ने बोली है, वैसी कितनी ही बार वे सदन में भी माननीय सदस्यों के मुंह से सुन चुके हैं।

कई सदस्यों, विशेषकर महिला सदस्यों, की हताशा भी लगभग इसी तरह की भावनाओं में व्यक्त हुई। सभी के पास अपने-अपने तर्क, अनुभव और कहानियां रहीं, पर राज्यसभा में भी, जहां सत्तारूढ़ पार्टी अल्पमत में है, डाक्यूमेंट्री पर रोक को लेकर सरकार को कठघरे में खड़ा करने में किसी की दिलचस्पी नहीं थी। दरअसल, इस तरह पितृसत्ता को ही कठघरे में खड़ा किया जा सकता था, पर यह अवसर जाने दिया गया।

स्त्री को सहजता से सत्ता में प्रतिष्ठित होते देख पाना तो सबसे विकसित लोकतंत्र अमेरिका में भी संभव नहीं हो सका है। 2016 का वर्ष वहां नए राष्ट्रपति के चुनाव का वर्ष है और अनुमान है कि शायद एक बार फिर क्लिंटन बनाम बुश की नौबत आ जाए। रिपब्लिकन पार्टी की ओर से बुश परिवार का छोटा बेटा जेब बुश और डेमोक्रेट्स की ओर से बिल क्लिंटन की पत्नी हिलेरी क्लिंटन। अगर चुनी गर्इं तो हिलेरी अमेरिका की पहली महिला राष्ट्रपति होंगी।

बिल के अरकांसास का गवर्नर और बाद में अमेरिका का राष्ट्रपति रहने के लंबे दौर में हिलेरी को क्रमश: राज्य और देश की प्रथम महिला होने का सजावटी रुतबा प्राप्त था और किसी को उनके प्रति शालीन दिखने में दिक्कत नहीं थी। सन 2000 में पति के राष्ट्रपति पद से हटने के बाद जब उन्होंने न्यूयॉर्क से सीनेटर बनने का चुनाव लड़ा तो मानो मर्दवादी भाषाई तूफान बरपा हो गया। सौ सदस्यीय सीनेट के एक वरिष्ठ रिपब्लिकन नेता ने तिरस्कार से कहा- आने दो उसे हम हर रोज याद दिलाएंगे कि वह सौ में से महज एक है न कि कोई खास।

आज हिलेरी के मुंह से निकले एक-एक शब्द की इस हिसाब से भी व्याख्या की जा रही है कि उनकी भाषा में कितना स्त्रियोचित है और कितना पुरुषोचित। एक सीनेटर के रूप में और बाद में राष्ट्रपति ओबामा की विदेशमंत्री के रूप में उनके वक्तव्य झाड़-पोंछ कर लैंगिक खांचों में नए सिरे से फिट किए जा रहे हैं। अस्सी के दशक में ब्रिटेन में मार्गरेट थैचर को भी बतौर प्रधानमंत्री कहीं ज्यादा गहरी लैंगिक छानबीन से गुजरना पड़ा था। इंदिरा गांधी के प्रधानमंत्री बनने पर भारतीय संसद में कहा गया कि अब अखबारों में सुबह एक आकर्षक तस्वीर देखने को मिला करेगी। ये आधुनिक दौर में विश्व राजनीति की सफलतम लौह महिलाएं हैं तो क्या?

मार्गरेट थैचर का मशहूर कथन कि कुछ कहलाना है तो पुरुष को बताओ, कुछ करवाना है तो स्त्री को, लैंगिक दुनिया में भी आज भी केवल स्त्री अध्येताओं के उद्धरणों में सम्मानजनक स्थान पाता है।

क्या मैं सुझाव दे रहा हूं कि सोनिया गांधी और स्मृति ईरानी समेत राजनीति की तमाम महिलाओं को ‘स्त्रियोचित’ शालीनता छोड़ देनी चाहिए? जी हां, मैं वास्तव में यही कह रहा हूं और इसके लिए शुरुआत लैंगिक भाषा कानून की राह प्रशस्त करने से की जा सकती है।

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