ताज़ा खबर
 

आतंक के खिलाफ बुलंद आवाज

देश में प्रमुख उलेमा और मुफ्तियों ने फतवा जारी करते हुए जिस तरह से कट्टरपंथी संगठन इस्लामिक स्टेट यानी आइएस के खिलाफ आवाज बुलंद की है, उसका स्वागत किया जाना चाहिए।
Author September 16, 2015 10:18 am

देश में प्रमुख उलेमा और मुफ्तियों ने फतवा जारी करते हुए जिस तरह से कट्टरपंथी संगठन इस्लामिक स्टेट यानी आइएस के खिलाफ आवाज बुलंद की है, उसका स्वागत किया जाना चाहिए। एक हजार से अधिक इस्लामी विद्वानों और मुफ्तियों ने हाल ही में फतवा जारी कर आतंक का पर्याय बन गए आइएस की करतूतों को गैर-इस्लामी और गैर-इंसानी करार दिया है।

फतवा जारी करने वालों में दिल्ली जामा मस्जिद के शाही इमाम, जमीयते उलमा हिंद, जमीयते एहले हदीस (मुंबई), रजा एकेडमी, अजमेर शरीफ दरगाह और निजामुद्दीन औलिया दरगाह के प्रमुख शामिल हैं। फतवे की अहमियत इसलिए और बढ़ जाती है कि दुनिया में पहली बार इतनी बड़ी तादाद में मुसलिम विद्वानों और मुफ्तियों ने एक साथ इस्लाम के नाम पर तबाही मचाने वाले आतंकवादियों के खिलाफ अपनी आवाज उठाई है।

बहरहाल, अब इस फतवे को संयुक्त राष्ट्र महासचिव के पास भेज दिया गया है और उनसे गुजारिश की गई है कि वे दूसरे देशों के उलमा और मुफ्तियों से भी ऐसा ही फतवा जारी करने की अपील करें, ताकि पूरी दुनिया में मुसलिम नौजवानों को आइएस के दुष्प्रचार और दुश्चक्र से बचाया जा सके। फतवा ऐसे वक्त में आया है जब कश्मीर में आइएस के झंडे लहराते देखे गए हैं और इस बात का अंदेशा है कि आइएस की नजर हिंदुस्तानी मुसलिम नौजवानों पर है। चंद नौजवान उसके बहकावे में आ भी रहे हैं। गौरतलब है कि दारुल उलूम अली हसन अहले सुन्नत के मुख्य सलाहकार और इस्लामिक डिफेंस साइबर के प्रमुख अब्दुल रहमान अंजारी ने पिछले दिनों देश भर के मुसलिम विद्वानों और मुफ्तियों से आइएस की

गतिविधियों के बारे में उनकी राय मांगी थी। जवाब में सभी ने एक सुर में आइएस की गतिविधियों को गैर-इस्लामिक करार देते हुए फतवा जारी कर दिया। अमेरिका, ब्रिटेन, चीन, फ्रांस, यूएई जैसे दुनिया के सैंतालीस देशों के राष्ट्राध्यक्षों के साथ साझा किए गए इस फतवे में आइएस के उस दावे को सरासर गलत बताया गया है कि उसके कृत्य इस्लामिक हैं और शरीअत के मुताबिक ही वे हिंसा को अंजाम दे रहे हैं।
फतवे का मजमून कुछ इस तरह से है कि आइएस की करतूतें इस्लाम के खिलाफ हैं।

इस्लाम में औरतों, बच्चों और बूढ़ों की हत्या की सख्त मनाही है, लेकिन आइएस के आतंकी हर दिन ऐसी घटनाओं को अंजाम दे रहे हैं। जाहिर-सी बात है कि इस्लाम में इस तरह की हरकतों के लिए कोई जगह नहीं है। आइएस द्वारा इस्लाम के नाम पर जो गतिविधियां चलाई जा रही हैं, उनका न तो इस्लाम से कोई वास्ता है और न ही उनकी किसी भी तरह हिमायत की जा सकती है। आइएस के दहशतगर्द जिस तरह से बच्चियों, औरतों को अपना गुलाम बना रहे हैं, उनकी नीलामी और यौन शोषण कर रहे हैं, ये तमाम बातें इस्लामी तालीम और शरीअत के खिलाफ हैं, जिनकी मुखालफत की जानी चाहिए।

दुनिया भर में क्रूरता और बर्बरता की मिसाल बन चुके आइएस के आतंकवादी सीरिया और इराक में बहुत बड़े पैमाने पर हिंसा और कत्लेआम कर रहे हैं। बड़े पैमाने पर वे अपने से असहमत लोगों को मौत के घाट उतार रहे हैं, पुरातात्त्विक महत्त्व की इमारतों को उन्होंने ध्वस्त किया है। महिलाओं को गुलाम बना कर मंडी में उनकी नीलामी की जा रही है। जो लोग इन दहशतगर्दों की मुखालफत करते हैं, उन्हें ये तड़पा-तड़पा कर मारते हैं। सरेआम उन्हें यातनाएं दी जाती हैं और उनका सिर कलम किया जाता है। और भी चिंता की बात है कि यह आतंकवादी संगठन अपना विस्तार कर रहा है।

जिहाद के नाम पर यह दुनिया भर के मुसलिम नौजवानों को अपने संगठन में भर्ती करने की मुहिम में लगा हुआ है। आइएस की असल विचारधारा से अनजान नौजवान उसके जाल में फंस भी रहे हैं। मुसलिम नौजवानों को आइएस के आतंकी यह कह कर गुमराह करते हैं कि उनका साथ देने से उन्हें जन्नत नसीब होगी। आइएस ही नहीं, बोको हराम और अलकायदा जैसे चरमपंथी संगठन भी इस्लाम की गलत व्याख्या कर भोले-भाले नौजवानों को पहले बरगलाते हैं और बाद में उन्हें अपने घिनौने कामों के लिए इस्तेमाल करते हैं।

हमारे देश में भी कुछ नौजवान अपनी जहालत और नासमझी की वजह से इन आतंकी समूहों के झांसे में आ गए। अभी ज्यादा दिन नहीं बीते, जब आइएस से संबंध रखने के इल्जाम में केरल के दो नौजवानों को संयुक्त अरब अमीरात से प्रत्यर्पित किया गया। हालांकि जांच में इन नौजवानों का आइएस से कोई सीधा ताल्लुक नहीं निकला। महज सोशल मीडिया पर आइएस की विचारधारा का समर्थन करने की वजह से ये शक के घेरे में आ गए थे। इसी तरह उस समय भी देश में हंगामा मच गया था, जब मुंबई के कुछ नौजवान अपनी नादानी की वजह से आइएस के जाल में फंस गए। जैसे ही लगता है कि यह सिलसिला अब रुकने वाला है, वैसे ही कोई नया नाम सामने आ जाता है।

आइएस के खिलाफ फतवा जारी होने के चंद रोज बाद ही एक भारतीय महिला अफशां जबीं उर्फ निकी जोसेफ को इस्लामिक स्टेट के लिए आतंकियों की भर्ती करने के इल्जाम में गिरफ्तार किया गया है। आरोपी को हाल ही में संयुक्त अरब अमीरात से प्रत्यर्पित कर हैदराबाद लाया गया है। हैदराबाद पुलिस के मुताबिक सैंतीस वर्षीय अफशां आइएस के लिए आॅनलाइन भर्ती अभियान चलाने के साथ-साथ जिहादी साहित्य का प्रचार भी कर रही थी। ऐसे इल्जाम हैं कि उसने आतंकी संगठन के लिए कुछ लोगों की भर्ती भी की थी। बहरहाल, इस पूरे मामले में हकीकत क्या है, जल्द ही सामने आ जाएगा।

यह कोई पहली मर्तबा नहीं है जब भारतीय उलमा और मुफ्तियों ने आइएस जैसे चरमपंथी संगठनों की गतिविधियों को गलत बताया है, बल्कि इनके खिलाफ लगातार देश में इस तरह की मुहिम चल रही है। इन अभियानों का एकमात्र मकसद मुसलिम नौजवानों को आतंकी समूहों की विचारधारा से बचाना है। आज से कुछ साल पहले जमीअत उलेमा-ए-हिंद ने भी आतंकवाद के खिलाफ फतवा जारी किया था। फतवे में दहशतगर्दी की हर गतिविधि को गैर-इस्लामी करार देते हुए उलेमा ने उस वक्त कहा था कि दहशतगर्दी का इस्लाम से कोई ताल्लुक नहीं है, दुनिया में कहीं भी बेकसूर को निशाना बनाने वाला काम चाहे कोई शख्स, कोई तंजीम या हुकूमत करे। इस्लाम के मुताबिक वह दहशतगर्दाना कार्रवाई है।

केरल, जहां मुसलिमों की एक बड़ी आबादी निवास करती है, वहां का एक मुसलिम संगठन ‘केरल नदवातुल मुजाहिदीन’ राज्य में पिछले कुछ दिनों से आमसभा, रैलियों और अन्य कार्यक्रमों के जरिए मुसलिम नौजवानों को जागरूक करने में जुटा हुआ है। इस अभियान के दौरान पर्चे भी बांटे जाते हैं। इन पर्चों में लोगों को इस्लाम की हकीकी तालीम दी जाती है। यह पूरी मुहिम इस्लाम की इंसानियत की तालीम पर आधारित है, जिसमें इस बात पर जोर दिया जाता है कि नौजवान कट्टरपंथी, सांप्रदायिक और आतंकी विचारधारा से दूर रहें। जाहिर है कि इस मुहिम को राज्य में हर वर्ग का अच्छा समर्थन भी मिल रहा है। आइएस की गतिविधियां इस्लाम की बुनियादी तालीम और उसूलों के खिलाफ हैं।

इस्लाम किसी भी बेगुनाह को कत्ल करने की इजाजत नहीं देता। पैगंबर-ए-इस्लाम मुहम्मद साहब ने फरमाया है कि तुम जमीन वालों पर रहम करो, तो अल्लाह तुम पर भी रहम बरसाएगा। जो लोग इस्लाम और कौम को खतरे में बता कर दुनिया भर में गैर-इंसानी हरकतें कर रहे हैं, उन्हें जिहादी कहने के बजाय सही मायने में दहशतगर्द ही मानना चाहिए। कुरआन में आतंकवाद को फसाद कहा गया है और इसका जिहाद से कोई लेना-देना नहीं है। आइएस के दहशतगर्द इस्लाम के नाम पर जो जुल्म, हिंसा और बर्बरता का प्रदर्शन कर रहे हैं, उसकी इस्लाम में कोई गुंजाइश नहीं है। उनकी गैर-इंसानी हरकतों से पूरी दुनिया पर एक बड़ा खतरा मंडरा रहा है। समूचा एशिया, अरब जगत और भारत भी उसकी जद में हैं।

एक ऐसे दौर में जब आइएस तमाम देशों के नौजवानों को बरगला कर उन्हें दहशतगर्द बनाने में लगा हुआ है, भारतीय उलमा और मुफ्तियों द्वारा जारी किया गया फतवा उन्हें गुमराह होने से बचा सकता है। इस संयुक्त फतवे से भारतीय नौजवानों में पैठ बनाने की आइएस की कोशिशों को तगड़ा झटका लगेगा। फतवा दुनिया के लिए भारत का एक पैगाम भी है, जो बताता है कि भारत में इस्लाम को मानने वाले उसे सही रूप में ही स्वीकार करते हैं। वैसे भी आतंकवाद का कोई मजहब नहीं होता। आतंकवादी संगठन, मजहबी बिना पर अपने को सही ठहाराने की कितनी भी कोशिश क्यों न करें, कोई भी मजहब मासूमों और बेकसूरों की हत्या और उनके उत्पीड़न की इजाजत नहीं देता।

हमारे देश में अगर कुछ गुमराह नौजवान आतंकवाद की राह पर बढ़ गए हैं, तो इन भटके हुए नौजवानों को सही रास्ते पर लाने की जिम्मेदारी समाज और समाज के महत्त्वपूर्ण पदों पर बैठे लोगों की है। भारतीय उलमा और मुफ्तियों ने आइएस के खिलाफ फतवा जारी कर अपनी इन्हीं जिम्मेदारियों का निर्वाह किया है। आइएस के खिलाफ भारतीय मुसलिम समुदाय ने जो सख्त रवैया अपनाया है, वह स्वागतयोग्य है और इस पहल का पूरी दुनिया में विस्तार होना चाहिए। वैश्विक शांति, सौहार्द और अगली पीढ़ियों के लिए इस तरह के कदम बेहद जरूरी हैं।

फेसबुक पेज को लाइक करने के लिए क्लिक करें- http://www.facebook.com/Jansatta
ट्विटर पेज पर फॉलो करने के लिए क्लिक करें- http://twitter.com/Jansatta

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App

  1. No Comments.
सबरंग