ताज़ा खबर
 

सीमेंट का सौंदर्य

सुंदर शहर बनाने वाले सुंदर होने चाहिए। वे लंबे, सुगठित देह वाले होने चाहिए। उनके काम करने में अहसान करने वाली अहंकारी (एरोगेंट) लय होनी चाहिए। वे चलें तो अदा से। रुकें तो अदा से और हमको निहारें तो अदा से।
Author May 29, 2015 17:35 pm

सुंदर शहर बनाने वाले सुंदर होने चाहिए। वे लंबे, सुगठित देह वाले होने चाहिए। उनके काम करने में अहसान करने वाली अहंकारी (एरोगेंट) लय होनी चाहिए। वे चलें तो अदा से। रुकें तो अदा से और हमको निहारें तो अदा से।

आश्चर्य कि अब तक सीमेंट के सौंदर्य पर किसी ने सोचा तक नहीं, न कंक्रीट की कोमलता बारे में ही विचारा गया। विचारा तो उस एक विज्ञापन ने पहली बार विचारा और हमारे लिए सीमेंट, कंक्रीट और स्थापत्य के मानी बदल दिए। गिट्टी, बालू, बदरपुर, सीमेंट के मानी बदल दिए। एक सुंदर नगर निर्माण में लगे मजदूरों के मानी बदल दिए और भवन निर्माण क्रिया और उसके प्राण ‘सीमेंट’ पर प्यार आने लगा!

यह एक देसी मल्टीनेशनल कंपनी के सीमेंट के ब्रांड का नया विज्ञापन है जो पिछले एक-डेढ़ महीने से अंगरेजी चैनलों पर आता रहता है। यह ‘ब्लेक एंड वाइट’ में है, स्लो मोशन में चलता है, और समूचे दस-पंद्रह सेकिंड तक खामोशी छाई रहती है।

हमारे देखे सीमेंट और कंक्रीट के विज्ञापनों में यह सबसे ‘कमनीय’ विज्ञापन है। शुरू में ही एक ‘सिक्सपैक्सऐब्स’ वाला सुडौल लंबा मजदूर एक जाली लगे ट्रक की जाली ऊपर कर उससे सीमेंट का बोरा लिए उतरता है; मानो वह बंधुआ मजदूर हो और उसे किसी कैद से लाया गया हो।

एक कन्नी से तसले के भीगे सीमेंट को मृदुता के साथ चलाती एक लंबी सांवली सुंदर कमनीय स्त्री अपने हाथों से उस तसले को उठा कर स्लो मोशन करते हुए किसी ‘गजगामिनी’ की तरह जाती दिखती है। दृश्य में उसी तरह की तीन-चार युवतियां आ जुटती हं। फिर वही ‘सिक्सपैक्सऐब्स’ वाला गठीला युवक जमीन पर रखे सीमेंट के बोरे को अपनी पीठ पर आसानी से डाल कर ले जाता है। उसकी इस क्रिया को कमनीय स्त्रियां कामुक नजरों से देखती रह जाती हंै। वह उसे एक कंक्रीट के मिक्सर में डालता है।

कैमरा पुरुष के पौरुष को व्यक्त करने वाली कसी हुई ‘माचो’ (मर्दानी) देहयष्टि और कामिनियों की मंथर यति-गति पर मुग्ध है और दर्शकों के लिए उनकी देह को उनकी चाल-ढाल को लगातार फोकस करता है। वे सब सफेद झीने गाउननुमा लिबास पहने नजर आती हं।

सामने से नीचे तक उदारतापूर्वक खुला गाउन देह के कसाव-कटाव को फोकस करता है। इनकी नजरें अपने आसपास से एकदम लापरवाह और उदासीन हं। चाल में ‘अलसता’ है मानो ‘एक लंबी काया उन्मुक्त’ वाली ‘कामायनी’ साक्षात हो। अगर आप हिंदी साहित्य के पाठक हैं तो इस काव्यपंक्ति का मतलब आसानी से समझ सकेंगे। अगर पाठक नहीं हंै तो भी इसे समझना कठिन नहीं है।

प्रसंगवश कह दें कि हिंदी के अनूठे आधुनिक महाकाव्य ‘कामायनी’ में प्रलय के बाद सारस्वत नगर बसाया जाता है। विज्ञापन में ब्रांडेड सीमेंट और कंक्रीट की सुंदरता देख मुझे उसी सारस्वत नगर की याद आ गई जो महाकाव्य में बनाया जाता बताया जाता है। जब मनु महाराज इड़ा यानी ज्ञान (बुद्धि)के साथ कुछ ज्यादा ही छेडछाड़ (हरेसमेंट) कर बैठते हंै तो जनता उनके खिलाफ बगावत कर देती है और सब कुछ अराजकता में बदल जाता है। सत्ता के अहंकार और ज्ञान के दुरुपयोग के कारण सारस्वत नागरिक विद्रोह कर देते हं और सब कुछ तहस-नहस हो जाता है।

‘कामायनी’ के अंदर होते सारस्वत नगर निर्माण का यह प्रसंग हमें उक्त विज्ञापन से जोड़ देता है। विज्ञापन के अंत में हम एक कैचलाइन लिखी देखते हंै जो एक उलटे कुकुरमुत्तेनुमा ऊंची बहुमंजिली इमारत को ‘एक सुंदर निर्मित’ कहता है! इस ‘सुंदर निर्मिति’ और इन दिनों बहु प्रचारित ‘स्मार्ट सिटीज’ का आइडिया हमें मिलता-जुलता सा लगता है।

ऐसा नहीं कि विज्ञापन ने कामायनी पढ़ कर आइडिया मारा हो। हो सकता है कि विज्ञापन की कापी बनाने वाले ने किसी ग्रीक महाकाव्य या किसी हालीवुडियन फिल्म से आइडिया मारा हो लेकिन हमारी नजर में विज्ञापन में व्यक्त भवन निर्माण/शहर निर्माण का जो आइडिया आया है वह ध्यान खींचता है क्योंकि सीमेंट कंक्रीट पहली बार कमनीयता और कामुकता (सेक्सिज्म) के साथ अवतरित होते हं।

यह विज्ञापन लगभग हॉलीवुडीय फिल्म ‘सेक्स एंड सिटीज’ की प्रस्तावना-सा लगता है और नगर की हमारी अवधारणा बदलती महूसस होती है। हम सोच कर आनंदित होते हं कि जब भवन बनाने वाले इतने सुडौल, स्वस्थ, कमनीय, सेक्सी और सुंदर होंगे तो नगर कितना सुंदर होगा? इस तरह नगरीकरण का सुपरिचित ‘अजनबीकरण’ खत्म। मानो नगर न हो आनंदकानन हो यानी अपना ‘लास वेगास’!

ऐसे भवनों और शहरों में मुंबई, दिल्ली, कोलकाता जैसे मेट्रो शहरों में मिलने वाला कार्बन मोनोक्साइड वाला गुबार न होगा। ऐसे नगरों में असुंदर और अस्वस्थ मजदूरों के निर्माण से पैदा होने वाली धूल के खतरनाक गुबार न होंगे। न किसी ‘हरित पंचाट’ को प्रदूषण की चिंता में घुलना पडेÞगा। इस ‘सुंदर निर्मिति’ में ‘स्वच्छ भारत स्वस्थ भारत’ एक साथ साक्षात होता दिखता है।

विज्ञापन के सांैदर्यजनित आनंद का एक बड़ा कारण स्वयं विज्ञापन है जो बताता है कि एक ऐसा सुंदर शहर संभव है जिसमें न कहीं धूल-धक्कड़ है न खांसी-खुर्रा है। गर्द-गुबार का नाम नहीं। यहां कंक्रीट भी कमनीय लगती है जो मिक्सर मशीन में स्लो मोशन में कब बन जाती है पता ही नहीं चलता।

जब इतने चिकने-चुपडे, किसी ब्यूटी पार्लर और डिजाइनर के लिबास से सज्जित सुडौल लंबे डिजाइंड युवक-युवतियां कोई ‘रचनात्मक’ कार्य करते हं तो उनके कर्म में नया लालित्य आ ही जाता है। आप शोर, तोड़-फोड़, धूल-धक्कड़ की जगह उनकी चाल-ढाल की कमनीय सांगीतिकता महसूस करते हं जो ‘मृदु मंद मंद सुंदर सुंदर’ ही दिखती है।

काले वातावरण के बीच विषम दृश्य देते सफेद लिबास, उनसे झांकती ‘उदार काया’ (लिबरल बॉडीज) और इस पर भी उन सबका एक दूसरे से इस कदर अजनबी हो रहना कि कोई एक दूसरे की तरफ देखे तक नहीं और काम होता चले और दस-पंद्रह सेकिंड बाद अचानक बीच एक बियाबां में उभर आती एक ऊंचे कुकुरमुत्तेनुमा बहुमंजिला इमारत! इस सुंदर स्थापत्य के अलावा और क्या चाहिए आपको?

सुंदरता के मानक अब तक स्किनक्रीमों के विज्ञप्त नाना संस्करणों पर निर्भर थे, अब भी हंै, लेकिन अब उनके प्रोडक्ट के रूप में उगी हुई सुंदरियां और सुंदर आदमी कुछ अधिक लंबे हो गए हंै। इन्हें देख लगता है कि अब आपको डिजाइंड डीनए से तैयार डिजाइंड मॉडल मजदूर मिल सकते हैं और आप इन अति सुंदर लोगों के जरिए एक सुंदर बहुमंजिला इमारत और नगर बनवा सकते हं। सुंदर भवन के लिए स्मार्ट और सेक्सी मजदूर चाहिए!

तेज विकास की समकालीन कंक्रीट कल्चर के बीच सौंदर्य टुकड़ों में नहीं बनता। वह समग्र ही हो सकता है। विज्ञापन में एक समग्र ‘स्मार्टनेस’ विचरती है। अंगरेजी विशेषण ‘स्मार्ट’ इस कदर स्मार्ट है कि हमें लाख खोजने पर भी एकदम सटीक हिंदी पर्याय नहीं मिला! हिंदी में स्मार्ट की जगह कई शब्द लगते हैं: बना-ठना, तीक्ष्ण, हाजिर जवाब, जोरदार, फैशनेबल, तेज, फुरतीला आदि। इनमें से कोई दृश्य के लिए सटीक नहीं। कारण स्मार्ट के अर्थ का बदलना है। यह ब्रांड की दुनिया का शब्द है और इन दिनों कुछ ज्यादा ही चलन में है।

ब्रांडों की दुनिया में इन दिनों तीन विशेषण अतिप्रयोग में हैं। एक है ‘स्मार्ट’, दूसरा है ‘पावर’ और तीसरा है ‘डिजाइनर’!
हर मोबाइल ‘स्मार्ट’ है जो एप्स संपन्न है और बिना भाग-दौड़ के आपको दुनिया की सबसे बड़ी दो-तीन ई-शॉप्स से जोड़ देता है। एप्स सूचना बिना मोलभाव करने वाला ‘ई-उपभोक्ता’ बना डालती है। सूचना से सशक्त कर वह ई-ग्राहक बना कर आपको ‘ई-शॉपिंग’ तक ले जाती है। यह उपभोग की ‘स्मार्टनेस’ है!

‘पॉवर’ के साथ तो पता नहीं कितने आइटम जुडे है कि उन्हें आसानी से गिना नहीं जा सकता। पॉवर बे्रकफास्ट, पॉवर लंच, पॉवर डिनर, पॉवर डिप्लोमेसी, पॉवर पुश, पॉवर पाइंट प्रस्तुति, पॉवर टॉक, सबसे पॉवरफुल आदमी-औरत, पॉवर की पूजा आदि विशेषण विज्ञापनों में इतनी बार बजते हंै कि ये सब नई आकांक्षी पीढ़ी के निजी शब्दकोश बन गए हंै। अब पॉवर शब्द अंगरेजी का नहीं लगता, हिंदी का ही लगता है! यह पॉवर ईश्वर-प्रदत्त नहीं, सत्ता द्वारा उसके संजाल के द्वारा डिजाइन की जाती है।

चिह्नों से संचालित समाजों में सांस्कृतिक चिह्न इसी तरह एक-दूसरे को ठेलते-पेलते हुए हमारी चेतना को घेरते हंै और एक दिन हम अचानक उनसे आक्रांत होकर उनको अपने मानक मान उठते हं। उनके होकर उनकी भाषा को अपनी भाषा अपना लेते हंै। वे हमारी हैसियत, सत्ता के जटिल और व्यापक संजाल में हमारी लघु और ‘शेयर्ड’ यानी अपने हिस्से की सत्ता देने की ‘प्रतीति’ देते हं।

मनमोहन के दौर में मारकेटिंग का सबसे अधिक प्रयुक्त विशेषण ‘सेक्सी’ हुआ करता था। इस उत्तर-मनमोहन दौर में उसकी जगह ‘स्मार्ट’ शब्द ने ले ली है! स्मार्ट में सेक्सी तत्त्व शामिल है! जिस विज्ञापन का जिक्र हमने इस टिप्पणी में किया है उसे देखने के बाद हमको भी लगा कि नगर निर्माण कला, भवन निर्माण कला में सेक्सी तत्त्व हो सकता है तो सीमेंट और कंक्रीट तक में क्यों नहीं हो सकता है!

क्या आपको पेंट के एक विज्ञापन में प्लास्टिक पेंट से सज्जित उस दीवार की याद है जिससे दीपिका पादुकोण अपना सुकोमल गाल रगड़ कर हमें दीवार की प्यार भरी कोमलता का अहसास कराती है कि देखते-देखते दीवार का मतलब बदल जाता है। स्थापत्य में कामुकता का स्पर्श मारकेटिंग एक नया आयाम है!

मजदूरों और मजदूरिनों का ऐसा कमनीय एवं सांद्र-कामुक चित्रण उक्त कथित स्मार्ट सिटी का ऐसा ही संस्करण है जो मजदूर और मजदूरिनों की पहचान ही बदल देता है! विज्ञापन में हम एकदम नए निराले मजदूर देखते हंै जो इस धरती पर तो कभी नहीं देखे गए। मजदूरों का ऐसा सौंदर्यीकरण श्रम को सेक्सी बना डालता है और किसी स्मार्ट सिटी का हिस्सा बन सकने वाली वह उलटे कुकुरमुत्तेनुमा बड़ी-सी इमारत हमें बुलाती-सी लगती है।

जिस तरह इन दिनों ‘स्मार्ट सिटी’ की कल्पना में इस्तेमाल किया जाता ‘स्मार्ट’ (विशेषण) हमारे देसी मैले-कुचैले गर्द और धूल भरे यथार्थ को भी रमणीय मानने का आग्रह करता है उसी तरह यह विज्ञापन आम मजदूर को सुदर्शन ‘डिजाइनर मजदूर’ बनाता है।

इतना सुगठित या तो सलमान खान दिखता है या सिल्वेस्टर स्टलोन या आर्नल्ड श्वार्जनेगर लगता है। ऐसी युवतियां हालीवुड की ‘सेक्स एंड सिटी’ की नायिकाएं ही हो सकती हंै। ये अपनी तीसरी दुनिया में कहां और किस तरह बन सकती हंै बंधु?
जाहिर है कि यह मजदूर और मजदूरी दोनों का ही मजाक बनाना है। विज्ञापन कहता है कि स्मार्ट सिटी में उस आम मजदूर की जरूरत नहीं होगी जो हिंदुस्तान के हर छोटे-बड़े शहर के चौराहों पर सुबह-सुबह इसलिए खड़ा रहता है कि उसे एक दिन की दिहाड़ी पर कोई ले जाए! मकान बनाने वाले, मरम्मत करने वाले क ाम के जोखिम से उसको जरा भी हिफाजत नहीं। कोई बीमा गारंटी नहीं और पूरी कहीं-कहीं दिहाड़ी भी नहीं।

एक विज्ञापन ने देखते-देखते सीमेंट में कामुक सुंदरता कुछ इस तरह घोल डाली कि स्मार्ट शहरनुमा बहुमंजिला इमारत में रहने के लिए जरूरी इएमआइ की चिंता मिट गई! हम ऐसे किसी सेक्सी शहर के इंतजार में हंै! जिस शहर का सीमेंट इतने स्वस्थ और सुंदर हाथों से लगा हो वह इंदर-कानन से क्या कम होगा?

सुधीश पचौरी

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App

  1. No Comments.
सबरंग