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आचारों से खाली विचारों का महाकुंभ

क्षिप्रा की धारा को अमृतधारा कहने वाले, उसमें स्नान करने वाले क्षिप्रा की हालत के प्रति तब तक संवेदनहीन थे, जब तक उनके इर्दगिर्द उज्जैन, रतलाम, नीमच, मंदसौर जिलों में हजारों हेक्टेयर जमीन किसानों से छीन कर उद्योगपतियों को देने की योजना उभरी नहीं थी।
Author नई दिल्ली | May 22, 2016 01:57 am
सिंहस्थ कुंभ में साधुओं के अखाड़ों में चुनाव के दौरान कथित रुप से गोलीबारी हुई। (Representative Image)

सिंहस्थ मेला हजारों साधुओं और कुछ लाख श्रद्धालुओं से सजधज कर प्रकाश में आया। मध्यप्रदेश के ही नहीं, दिल्ली, मुंबई तक के रास्तों, वाहनों, भवनों पर प्रचार सामग्री के बाद भीड़ कम आने की बात उठी। पांच हजार करोड़ रुपए खर्च करने को लेकर पर भी सवाल उठे। नेनोरा गांव में किसानों की जमीन छीन कर जो सीमेंट, कंक्रीट के रास्ते आदि बनाए गए उस पर भी किसानों ने आक्रोश जताया। मगर आयोजकों ने इसके साथ ही पचासी करोड़ रुपए से अधिक खर्च करके ‘मंथन’ नाम से दो दिवसीय सम्मेलन करते हुए सिंहस्थ को एक अलग रूप-रंग देने की कोशिश की। भगवा के साथ दलितों का नीला और किसानों तथा पर्यावरण का हरा रंग देने की कोशिश की गई। यह रंजिश थी या साजिश यह सवाल विचारशील, संवेदशनशील नागरिक के मन में उठना ही है, अगर वह जमीनी हकीकत जरा नजदीक से जांच ले। प्रधानमंत्रीजी दुनिया को अमृत संदेश देना चाहते हैं, जो उनकी ‘मन की बात’ हो सकती है, अच्छी बात है, लेकिन वह उनकी नैतिक विचारधारा नहीं हो सकती।

क्षिप्रा की धारा को अमृतधारा कहने वाले, उसमें स्नान करने वाले क्षिप्रा की हालत के प्रति तब तक संवेदनहीन थे, जब तक उनके इर्दगिर्द उज्जैन, रतलाम, नीमच, मंदसौर जिलों में हजारों हेक्टेयर जमीन किसानों से छीन कर उद्योगपतियों को देने की योजना उभरी नहीं थी। जब दिल्ली-मुंबई औद्योगिक गलियारे (इंडस्ट्रियल कॉरिडॉर) की बात उठी, दस हजार हेक्टेयर से अधिक औद्योगिक क्षेत्र बनाने और प्रत्येक में बीस हजार करोड़ के पूंजी निवेश और उन्हें जमीन के साथ पर्याप्त पानी देने, इसके लिए कहीं से भी खींच कर पानी लाने की बात थी, और नर्मदा को जोड़ने वाली क्षिप्रा नदी भरने की योजना बनी। नर्मदा-क्षिप्रा लिंक, मूल ओंकारेश्वर परियोजना के विपरीत, नर्मदा से प्रति सेकंड पांच हजार लीटर पानी उठा रहा है आज, जिसकी मात्रा प्रतिदिन तिरालीस करोड़ लीटर है। तो आज क्षिप्रा में नहाने वाले क्षिप्रा अमृत स्नान या नर्मदा अमृत स्नान कर रहे हैं, यह तो सोचें।

क्षिप्रा की हालत पर भी सोचा गया क्या विचार कुंभ में? जलवायु परिवर्तन पर चर्चा हुई, जिसमें नदियों की बात उभरी, लेकिन अखबारों में आए नामों में क्षिप्रा का नाम देखने को नहीं मिला, न ही नर्मदा का। क्षिप्रा का इसलिए नहीं, क्योंकि नदियों की धारा समाप्त करने वालों की पोल खुल जाती, क्योंकि आज तक क्षिप्रा की हालत, गंगा-यमुना, जितनी बुरी, गंदी, प्रदूषित नहीं हुई है। यानी भूत और भविष्य की बात छिपा कर हुई है चर्चा… जैसी कई बार ‘सूखे’ पर होती है।

सच्चाई तो यह है कि जलवायु परिवर्तन का मुख्य कारण है हमारी जीवन प्रणाली, हमारी जल नीति, ऊर्जा नीति, वन नीति, खेती पद्धति भी। भारतीय प्रकृति और संस्कृति को तबाह करने वाली हर चीज आगे बढ़ाने वाले शासन आज पूंजी निवेश की चर्चा करते हैं, तो केवल आर्थिक पूंजी की। उसी के आधार पर मानव सब कुछ हासिल कर लेना चाहता है। नदी को, पहाड़ को, खनिज को, भूमि को, पेड़-पौधों को, ‘पंूजी’ मानें तो उन्हें भी पैसों में गिना जाता है और उन्हें जीवन आधार मानने वालों को पिछड़ा समझ कर जबरन पैसा देकर हटाया जाता है। इस बदलाव को ‘विकास’ मानने वाले ही जलवायु यानी तापमान, पर्यटनमान, प्राकृतिक संतुलन, सब कुछ बनाने की बहस करते हैं। हमारे इच्छादान के बिना न यह संतुलन संभव है, न ही जल पुनर्भरण। इस सरल सिद्धांत नहीं, अनुभव को नकार रहे आज के वैज्ञानिकों को क्या ‘विज्ञान अध्याय’ के नए जोड़ पर भव्य, दिव्य किंतु विनाशक ‘नदी जोड़’ पर कोई विचार या पुनर्विचार करने के लिए सिंहस्थ से कोई निष्कर्ष निकला?

ग्रामीण क्षेत्र की कमोबेश सादगी, स्वावलंबन और समता की भी संस्कृति को ऐसे विचार मंथन में स्थान जरूर मिलता है, लेकिन क्या वही स्थान और सम्मान, विकास नीति में दिया जा रहा है? क्षिप्रा के इर्दगिर्द जहां साठ-सत्तर प्रतिशत खेती हो रही है, वहां उसकी कब्र बना कर उद्योगों को महलों के रूप में स्थापित किया जा रहा है। इंदौर जैसे शहर में जहां न पहले अतिक्रमण था, न अनधिकृत जगहें, वहां पुरानी, अधिकृत धरोहरें थीं, बस्तियों में मेहनतकशों की सच्ची कमाई से बनी छोटी-बड़ी दुकानें, व्यवसाय थे, वे सब ध्वस्त किए जा रहे हैं। न शासन के पास देने को पर्याप्त रोजगार है, न आबंटित करने को खेत, फिर भी शहरी निर्माण या हर बड़े बांध से लाखों किसानों, मजदूरों को उजाड़-उखाड़ कर फेंका जाता है, ‘विकास’ के नाम पर। क्या इन परिवर्तनों से ‘स्मार्ट’ बनने वाले शहर ग्रामोद्योग, प्राकृतिक संपदा की रक्षा, प्रदूषणमुक्त, कार्बनमुक्त जीवन प्रणाली या स्वस्थ जीवन की परिभाषा को आगे बढ़ाने वाले हैं?

नदी को जलकुंभ के रूप में देखने वाले यह सोचें कि उसमें पानी बहेगा तो कैसे? जरूरी है उसके जलग्रहण क्षेत्र की रक्षा और विकास। जलग्रहण क्षेत्र का विकास तभी संभव है जब वहां कम से कम उथल-पुथल हो, उत्खनन पर रोक लगे, पेड़-पौधों की संख्या बढ़े और उपनदियों और नालों के भी जलग्रहण को घेरे में लिया जाए, चेकडैम या अन्य मर्यादित अवरोध के अलावा बांध आदि के जरिए नदी को न रोका जाए, उसे बहने दिया जाए। क्या यह दिशा है नदी कछार के विकास की? नहीं।

क्षिप्रा के कछार में नॉलेज सिटी यानी सत्रह उद्योगों से लेकर औद्योगिक क्षेत्र के तहत रीअल एस्टेट से शापिंग मॉल, स्वीमिंग पूल तक सब कुछ नियोजित है। नर्मदा के कछार में जहां सबसे ऊपरी क्षेत्र में जलाशय बने हैं या बनने जा रहे हैं, वहीं पंद्रह ताप विद्युत योजनाएं और चुटका जैसी परमाणु ऊर्जा योजना की भरमार लगाना चाहता है शासन। ओंकारेश्वर, इंदिरा सागर की नहरों के किनारे, नहरें बनने के भी पहले से अडानी, एनटीपीसी की परियोजनाओं के लिए खेतों और पानी को सुरक्षित कर दिया गया और अब नहरों के किनारे के हर क्षेत्र की खेती लायक जमीन पर औद्योगिक क्षेत्र थोपने की तैयारी हो चुकी है। नागदा में बिड़ला की फैक्टरी के प्रदूषण से परेशान हैं लोग। कल नर्मदा के कछार में क्या होगा, इसकी न कोई सोच है न सर्वसमावेशी अध्ययन।

आज केंद्र और राज्य सरकारें पर्यावरणीय मंजूरी, पुनर्वास के बिना, आगे धकेलने को विकास की अवधारणा मानती हैं। जंगलों को डुबाया-काटा तो जा ही रहा है, हर बड़ी नदी और उप-नदियों के बीच और किनारे के क्षेत्र में राजनीति के दबाव में ‘मंजूरी’ पाकर, शर्तें तोड़-मरोड़ कर अवैध खनन चल रहा है। अवैध खनन नदी कछार के जलचक्र को खत्म करता जा रहा है। इससे पानी की शुद्धता नष्ट हो रही है और मछलियों की मात्रा घट रही है। आज क्षिप्रा मृतप्राय हो गई है, तो नर्मदा से पानी लाकर उत्सव मनाया जा रहा है। कल नर्मदा के खत्म होने पर किसे उजाड़ेंगे?

ग्रामोद्योग और गृहउद्योग की विपुल संभावनाएं होते हुए भी मध्यप्रदेश में प्राकृतिक संपदा, खेती उपज के आधार पर छोटे, प्रदूषणमुक्त उद्योग लगाने का सोचा भी है शासकों ने? बिना विस्थापन, कम से कम विस्थापन, भूमि उपयोग में बदलाव के साथ, खेती बचा कर, उजाड़ कर, जमीन में उद्योग खड़े करने की दिशा है नियोजन में। इन्होंने तो मॉरिशस से लेकर अस्ट्रेलिया तक के विदेशी, बड़े पूंजीपतियों को, अंबानी, अडानी जैसे बड़े घरानों को खुला न्योता एक से अधिक खर्चीले सम्मेलन करते हुए कह दिया है कि आइए, आपको जो भी, जहां भी लगाना है उद्योग, लगाइए… आपके लिए नर्मदा जैसी नदी का पानी ही नहीं, जहां चाहिए जमीन उपलब्ध है। हमारे किसान भुगतेंगे विस्थापन, नहरों का पानी न मिलने के बाद तरसेंगे, लड़ते रहेंगे, उनके लिए भी। खेती और अन्य सुरक्षा प्रभावित हुई तो क्या? बड़े उद्योगों को पोषणकर्ता ग्रामोद्योग की चर्चा करते हैं स्थानिक संसाधनों पर आधारित विकास की, स्थानिकों को प्रथम अधिकार देकर, उनके बलबूते पर ही खेती आधारित औद्योगीकरण की योजनाएं नहीं बना सकते। बड़े पूंजीपति, जिलाधीश उद्योगपतियों को पर्यटन तक की इंडस्ट्री बहाल करने वाले, स्थानिकों से अत्यधिक भूअधिग्रहण और विस्थापितों को केवल पुनर्वास के आश्वासन आंकते हैं, इसका प्रतीक है नर्मदा का एक-एक बड़ा बांध। क्या विचार कुंभ में इस पर भी बहस हुई है?

यानी विचारों के महाकुंभ के बाद किसानों की जमीन छीनने आदि को लेकर क्या कोई आचार संहिता भी उभर कर आएगी, मप्र और अन्य राज्यों तथा केंद्र के शासकों में? क्या उनकी विकास प्रणाली में, खुद की जीवन प्रणााली में, पूंजी, बाजार आधारित नियोजन के बदले प्राकृतिक संसाधन, प्राकृतिक निरंतरता, सादगी, पूर्ण विकास, रोजगार और सरल तकनीकी आधारित उद्योगों के प्रति, ऊर्जा निर्माण में भी निरंतर परिवर्तनीय ऊर्जा, जो अपारंपरिक नहीं है, इसके प्रति समझ बढ़ेगी, क्या विस्थापन के बदले, नदी घाटियों के किसान, कारीगर, मजदूरों को, पहाड़ियों, आदिवासियों को शहर के गरीब और निम्न मध्यवर्गियों को, पीढ़ियों पुराने गांव और व्यवसायियों को भी स्वयं विकास, स्वावलंबी विकास में बिना बर्बाद हुए सहभागिता का अवसर प्राप्त होगा? क्या विचार-विमर्श में उनकी ख्वाहिशों को, उनके अनुभवों को शामिल किया जाएगा? या फिर चार दिन या महीने भर का विचार महाकुंभ क्षिप्रा के साथ नर्मदा को भी खाली करने और राजनेताओं और शासन की या अन्य समाज की तिजोरी भरने की ओर बढ़ेगा? या भ्रष्ट अधिकारी और राजनेता जनतंत्र के हर स्तंभ को ध्वस्त करते हुए ‘शासकीय सुरक्षा’ पाकर हर योजना को मूल उद्देशों से भी विपरीत दिशा में ले जाएंगे? क्षिप्रा-नर्मदा जोड़ साथ होनी हो, तो जो क्षिप्रा का हुआ, उसके जलग्रहण क्षेत्र के कछार के गांवों, खेतीहरों का हुआ वही नर्मदा का न हो, यह देखना होगा।

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