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संजीव पांडेय का लेख : आतंकवाद की नई चुनौती

अभी तक अफ्रीका से लेकर एशिया तक गरीब घरों के लड़कों को आतंक फैलाने के लिए आतंकी संगठन भेजते रहे। अफगान तालिबान के साथ ताजिक, उजबेक और उइगर आतंकी जुड़े रहे।
Author नई दिल्ली | July 5, 2016 01:00 am
तस्वीर का इस्तेमाल प्रतीक के तौर पर किया गया है।

ढाका में हुए आतंकी हमले को लेकर एक नया चौंकाने वाला तथ्य आया है। कुछ हमलावर, जिनकी पहचान हुई है, अमीर घरों से संबंधित थे। अच्छे स्कूलों और कॉलेजों से उनकी पढ़ाई हुई थी। कम से कम दो हमलावर, जिनकी मौत गोलीबारी में हुई, अमीर घराने के थे। इसमें से एक, निबस इस्लाम, देश के एक अभिजात निजी विश्वविद्यालय (नार्थ-साउथ यूनिवर्सिटी) से पढ़ा था। वहीं दूसरे हमलावर मीर सबीह और रोशन इम्तियाज भी देश के सबसे ब़ढ़िया स्कूलों से पढ़े थे। रोशन इम्तियाज की पहचान बांग्लादेश ओलंपिक एसोसिएशन के उपमहासचिव इम्तियाज खान बाबुल के बेटे के तौर पर हुई है। कई अमीर घरों तक इस्लामिक स्टेट और अलकायदा की पहुंच ने यह मिथक तोड़ दिया है कि वैश्विक आतंकवाद में सिर्फ गरीब घरों के युवा शामिल हैं। पढ़े-लिखे समृद्ध पृष्ठभूमि के कई युवाओं को आतंकी गतिविधियां आकर्षित कर रही हैं। वे इस्लाम की खातिर और जन्नत मिलने के नाम पर दुनिया में कहीं भी हमला करने को तैयार हैं। इनका जाल अब एशिया से लेकर पश्चिमी देशों तक फैल गया है। इनके पास पैसा ही नहीं, दिमागी क्षमता भी अधिक है। सोशल साइटों ने इनकी पहुंच दूरदराज में पढ़े-लिखे युवाओं तक कर दी है। यह पूरी दुनिया के लिए नई चुनौती है।

बांग्लादेश में हुए हमलों में शामिल आतंकी अमीर घरानों से संबंधित थे। इन्होंने अच्छे स्कूलों में पढ़ाई की थी। इस पर बहस छिड़ी हुई है। लेकिन यह कोई पहली बार नहीं हुआ। वैश्विक आतंकवाद के दौर में आतंकी संगठनों में अमीर घरानों के युवा पिछले कुछ सालों से शामिल हो रहे हैं। यही नहीं, अमीर घरानों की कई पढ़ी-लिखी महिलाएं भी वैश्विक आतंकी नेटवर्क से जुड़ गई हैं। बांग्लादेश में बेशक यह पहली बार सामने आया है क्योंकि वहां यह पहला भीषण आतंकी हमला है। लेकिन सीरिया और पाकिस्तान में अमीर घरानों के लड़के और लड़कियों के आतंकवाद से जुड़ने के मामले पहले ही आ चुके थे। पाकिस्तानी खुफिया एजेंसियों ने 2006 के आसपास इस्लामाबाद में कुछ अमीर घरानों के लोगों के अलकायदा और तालिबान से जुड़ने की सूचना दी थी। इस्लामाबाद के पॉश इलाके में कुछ अमीर घरों की महिलाओं के एक समय आतंकी गतिविधियों का ठिकाना बन गई लाल मस्जिद के साथ सक्रियता से जुड़े होने की सूचना पाकिस्तान सरकार को थी। लाल मस्जिद पर सैन्य कार्रवाई के बाद भी इस्लामाबाद के पॉश इलाकों में अलकायदा और तालिबान का नेटवर्क विकसित होता रहा।

पूरी दुनिया में आतंक फैला रहे आतंकी संगठनों के पास इस समय दो तरह के लड़ाके हैं। एक लड़ाके वे हैं जो गरीबी और गुरबत के कारण आतंकी बन गए हैं। दूसरे वे हैं जो अमीर घरों से संबंध रखते हैं, लेकिन शौकिया पूरी दुनिया में इस्लाम और खलीफात की कथित स्थापना के लिए आतंकी बने हैं। निश्चित तौर पर पाकिस्तान में सक्रिय आतंकी संगठनों में बहुतायत संख्या उन लोगों की है जो गरीबी के कारण शहरों में आए और उन पर मदरसों की नजर पड़ी। पाकिस्तान में स्थित जामिया बिनौरिया, जामिया हक्कानिया समेत बहावलपुर और मुरीदके में स्थित मदरसों में गरीब घरों के युवाओं को अच्छा खाना और अच्छे पैसे के लोभ में लाकर आतंकी बनाया गया। ज्यादातर आत्मघाती दस्तों के सदस्य गरीब घरों के ही रहे हैं। अफगान तालिबान ने भी गरीब घरों के बच्चों को अच्छे वेतन और बढ़िया खाने के बहाने आतंकी कार्रवाई में शामिल किया। अफगान तालिबान कमांडर को प्रतिमाह दो सौ से तीन सौ डॉलर वेतन देता रहा है, वहीं छोटे लड़ाके को प्रतिदिन के हिसाब से वेतन मिलता रहा।

अभी तक अफ्रीका से लेकर एशिया तक गरीब घरों के लड़कों को आतंक फैलाने के लिए आतंकी संगठन भेजते रहे। अफगान तालिबान के साथ ताजिक, उजबेक और उइगर आतंकी जुड़े रहे। इनमें ज्यादातर गरीब घरों के ही लड़के हैं। इसलिए इनकी रुचि अपहरण उद्योग में भी रही। अपहरण से मिले पैसे का इस्तेमाल लड़ाकों को वेतन देने में किया जाता रहा है। पाकिस्तान में पूर्व प्रधानमंत्री युसूफ रजा गिलानी के बेटे और पंजाब के पूर्व गर्वनर सलमान तासीर के बेटे का अपहरण भी वसूली के लिए किया गया था। दरअसल, गरीब घरों के बच्चों को ‘जेहादी’ बनाने के लिए पैसे चाहिए और ये पैसे पाकिस्तान और अफगानिस्तान में अपहरण से ही आ सकते हैं। क्योंकि इन दोनों मुल्कों के पास वे संसाधन नहीं हैं जो सीरिया और इराक में हैं। सीरिया और इराक में तेल समेत कई और संसाधन हैं जिन पर आतंकियों ने कब्जा कर रखा है।

पर पाकिस्तान की नींद तब उड़ी जब 2015 में कराची में हुए कई आतंकी हमलों की बाबत अमीर घरानों के तीन युवाओं- साद अजीज, हाफिज नासिर और मोहम्मद इशरत- की गिरफ्तारी हुई। इन पर शिया समुदाय के चौवालीस लोगों की हत्या के साथ-साथ कई और आतंकी गतिविधियों में शामिल होने का आरोप था। साद अजीज तो पाकिस्तान के प्रतिष्ठित संस्थान इंस्टीटयूट आॅफ बिजनेस एडमिनिस्ट्रेशन से बीबीए था। जबकि मोहम्मद इशरत सर सैयद इंस्टीटयूट आॅफ इंजीनियरिंग एंड टेक्नलॉजी से पढ़ा था। जांच में पता चला कि ये आतंकी अमीर युवा थे और हमलों के लिए फंड भी मुहैया करवा रहे थे। ये नए लड़कों का ‘ब्रेनवाश’ करने में भी माहिर थे। साद अजीज कराची के एक बडेÞ कारोबारी का बेटा है। साद अजीज की मां और पत्नी भी आतंकी गतिविधियों में शामिल थीं।

जांच एजेंसियों ने जब इसके बाद खोज अभियान चलाया तो पता चला कि कराची में इस्लामिक स्टेट की महिला शाखा इन्होंने ही गठित की है। पुलिस ने इस संबंध में जब आदिल मसूल बट््ट नामक एक व्यक्ति की गिरफ्तारी की, तो पता चला कि उसने एक धार्मिक संस्था भी स्थापित की है। बट््ट ने अमीर घरानों की महिलाओं की एक इकाई भी बनाई है, जिसमें साद अजीज का सहयोग था। ये महिलाएं इस्लामिक स्टेट के प्रचार-अभियान में शामिल हो गई थीं।

बांग्लादेश के कई युवा इस्लामिक स्टेट की तरफ आकर्षित हुए। कुछ तो सीरिया तक पहुंच गए। इनमें से एक युवा अशीकुर रहमान अमीर घर का था। वह बांग्लादेश के एक सैन्य अधिकारी का बेटा था, जिसकी पढ़ाई मिलिट्री इंस्टीटयूट आॅफ साइंस एंड टेक्नलॉजी में हुई थी। रहमान तुर्की के रास्ते सीरिया पहुंचा और इस्लामिक स्टेट के साथ जुड़ गया। बांग्लादेश में फेसबुक और ट्विटर के माध्यम से इस्लामिक स्टेट अमीर युवाओं तक पहुंचा है। बांग्लादेशी मूल का एक ब्रिटिश नागरिक समीउम रहमान 2013 में विशेष तौर पर इस्लामिक स्टेट के कामकाज को देखने के लिए ढाका पहुंचा। उसने कई अमीर घरों के युवाओं से संपर्क किया। आसिफ अदनान और फजल-ए-इलाही जैसे अमीर घरों के युवाओं को उसने फेसबुक पेज के माध्यम से आतंकी नेटवर्क में शामिल किया। इन युवाओं को इस्लामिक स्टेट के साथ संपर्क रखने के आरोप में बांग्लादेश पुलिस ने गिरफ्तार किया। आसिफ अदनान एक सेवानिवृत्त जज का बेटा है, जबकि फजले इलाही एक वरिष्ठ नौकरशाह का बेटा है। इनकी शिक्षा बांग्लादेश के अभिजात स्कूलों और कॉलेजों में हुई थी। खुफिया एजेंसियों के अनुसार लंदन में सक्रिय कुछ अमीर बांग्लादेशी बांग्लादेश में आतंकी नेटवर्क को मजबूत करने में इस्लामिक स्टेट की मदद कर रहे हैं। ब्रिटिश खुफिया एजेंसियों ने लंदन स्थित बांग्लादेशी बाहुल्य वाले इलाकों में इनकी सक्रियता की सूचना दी है।

वैश्विक आतंकवाद में अमीर घरों के युवा ही नहीं, महिलाएं भी शामिल हैं। यूरोप में इसका मामला 2004 में ही सामने आ गया था। यूरोप में समृद्ध घरों की कई महिलाएं इस्लामिक स्टेट का साथ देने सीरिया पहुंच गर्इं। फ्रांस में पैदा हुई सम्मानित परिवारों की बीस से ज्यादा लड़कियों को सीरिया में इस्लामिक स्टेट के साथ सक्रिय देखा गया। पश्चिमी खुफिया एजेंसियों की नींद तब और उड़ी, जब ब्रिटेन में पैदा हुई पाकिस्तानी मूल की लड़की अक्सा महमूद सीरिया में आइएस में शामिल हो गई। नवंबर 2013 में स्कॉटलैंड छोड़ सीरिया पहुंचने वाली महमूद ने ट्विटर और फेसबुक पर यूरोप को खुली चुनौती दी। अक्सा महमूद खुद रेडियोथेरेपी की छात्रा थी और इसके माता-पिता स्काटलैंड के सम्मानित नागरिक थे। इस समय फ्रांस, ब्रिटेन, जर्मनी और बेल्जियम की सम्मानित घरों से संबंध रखने वाली सैकड़ों लड़कियां इस्लामिक स्टेट की कैडर बन चुकी हैं। इनमें से कई सीरिया में हैं तो कई यूरोप में ही बैठी हैं। यह वैश्विक आतंकवाद का सबसे खतरनाक रूप है, जिससे दुनिया को आगे लड़ना होगा।

आज वैश्विक आतंकी संगठनों के पास पैसा काफी है। आतंकियों ने अपहरण उद्योग, अपने कब्जे वाले इलाके में टैक्स और तेल से काफी पैसा बनाया है। 2008 से अब तक आतंकियों ने बंधकों की रिहाई से साढ़े बारह करोड़ डॉलर जुटाए हैं। जबकि अमेरिका के वित्तीय मामलों के महकमे के मुताबिक आतंकियों ने साढ़े सोलह करोड़ डॉलर हासिल किए हैं। इस समय आतंकी प्रति बंधक एक करोड़ डॉलर तक की ‘कमाई’ कर रहे हैं। बताया जाता है कि पाकिस्तान में पूर्व प्रधानमंत्री युसूफ रजा गिलानी और पूर्व गर्वनर दिवंगत सलमान तासीर के बेटे की रिहाई के बदले आतंकी संगठनों ने मोटी रकम वसूली। लेकिन अब अमीर घरों के बच्चों का आतंकी नेटवर्क में शामिल होना सबसे बड़ा खतरा है। क्योंकि ये पैसे या बढ़िया खाना या वेतन के लोभ में आतंकी संगठनों से नहीं जुड़ रहे हैं। ये भाड़े के आतंकी नहीं हैं। उनका उद््देश्य पूरी तरह से ‘धार्मिक’ है, जो धर्म के नाम पर ‘जिहाद’ की बात कर रहे हैं।

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