समाजवादी फिसलन और विचलन

लोहिया कहते थे कि खूंटी गाड़ो ताकि फिसलन कहीं तो थमे, वरना रसातल जा पहुंचेंगे। यानी सिद्धांतों से डिगने और समझौता करने के अधोबिंदु की थाह कितनी है? इसीलिए मुलजिम यादव सिंह पर लखनऊ उच्च न्यायालय के निर्देश के संदर्भ में उत्तर प्रदेश की समाजवादी सरकार को राजधर्म की कसौटी पर कसें। मायावती के कुशासन को हिला देने वाले लोहिया के ये लोग अब खुद हिल गए। नीति से डिग गए। बसपा से यादव सिंह सटे रहे थे। उसी व्यक्ति से सपाई गलबहियां कर बैठे। मगर बिल्कुल भिन्न था वह मंजर लोहिया के समकालीन लोगों का छह दशक पहले। मुंबई के उन सोशलिस्टों को भी परखें लखनऊ के समाजवादियों से सन्निध करके।

मसलन, क्रांतिकारी दामोदर स्वरूप सेठ जो लोहिया से वरिष्ठ थे, पच्चीस साल बड़े थे, कांगे्रस-सोशलिस्ट पार्टी के संस्थापकों में थे। वे भी जालसाजी और धोखाधड़ी के मुकदमे में आरोपी थे। सर्वोच्च न्यायालय ने सजा सुनाई थी। उस वक्त भी यादव सिंह सरीखा एक धूर्त था, जिसने छल से इस अदम्य सोशलिस्ट को फंसाया था। इसे जान कर ही प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने दामोदर स्वरूप के पक्ष में बंबई जिला अदालत में गवाही दी थी। आचार्य नरेंद्र देव ने उनके निरपराध होने का सबूत दिया था। बंबई के राज्यपाल श्रीप्रकाश ने दामोदर स्वरूप के समर्थन में बयान दिया था। चंद्रभानु गुप्त ने कानूनी सहायता दी थी।

तो फिर पुराने सोशलिस्टों की नैतिकता की तुलना आज के समाजवादियों के आचरण से करें। एक ठग तीन मुख्यमंत्रियों को धन के बल से पोट ले, अकूत धन-संपत्ति हथिया ले, सियासी अजूबा है यह। यादव सिंह का भूत कभी मायावती पर सवार था। उसके वाजिब कारण थे। दलित के नाते उन्हें दलित से लगाव था। दौलत की लिप्सा भी थी। यादव सिंह के पास ये दोनों गुण थे। पर मजलूम मजदूरों और पसमांदा काश्तकारों के रहनुमा समाजवादी लोग इस फरेबी के चाल में कैसे आ फंसे? इसका जवाब चाहिए उन तमाम लोगों को, जिन्होंने मुक्त, विकसित प्रदेश के लिए साइकिल को वोट दिया था। हाथी को तजा था।

पड़ताल हो कि एक तीसरे दर्जे का सरकारी कारकून नोएडा में जूनियर इंजीनियर से पंद्रह वर्षों में ही मुख्य मेनटेनेंस इंजीनियर कैसे बन गया और अरबों रुपयों से खेलने लगा। उसकी मोटरकार की डिक्की में दस करोड़ रुपए मिले थे। उसके विरुद्ध जांच हुई, पर हर मुख्यमंत्री ने उसे रफा-दफा करा दिया। पिछले हफ्ते लखनऊ के उच्च न्यायालय में सरकारी वकील पचहत्तर वर्षीय महाधिवक्ता विजय बहादुर सिंह ने जनहित याचिका का विरोध करते हुए यादव सिंह के भ्रष्टाचार की सीबीआइ जांच की मांग को खारिज करने का तर्क दिया। मगर उच्च न्यायालय ने सीबीआइ जांच का आदेश दे दिया। इससे तमाम सरकारी पापियों का भांडा फूटेगा।

मगर पेचीदा प्रश्न यह है कि सीबीआइ जांच का समाजवादी सरकार विरोध क्यों कर रही थी? कैसा विद्रूप है कि साधारण से अपराध में गिरफ्तारी और जेल हो जाती है, पर राजकोष से जिसने करोड़ों लूटा, गबन किया, वह अब तक छुट्टा घूम रहा है। प्रदेश के राजनेता आमजन को क्या संदेश देना चाहते हैं? इन सियासी और अपराधी पुरुषों का भी महागठबंधन दीखता है।

मोदी सरकार के वित्तमंत्री ने उस आयकर आयुक्त का तबादला कर मानव संसाधन विकास मंत्रालय में डाल दिया, जिसने यादव सिंह के दिल्ली, गाजियाबाद और नोएडा के मकानों पर छापा मार कर अरबों रुपयों की काली कमाई पकड़ी थी। आखिर किसको भाजपाई सरकार बचा रही है? सर्वोच्च न्यायालय में यादव सिंह की सहायता में पूर्व कांग्रेसी मंत्री सलमान खुर्शीद भी पेश हो चुके हैं। मायावती ने उसे प्रश्रय और प्रोत्साहन दिया था। समाजवादी मुख्यमंत्रियों ने खाद-पानी डाला। छोटा-सा जीव आज दैत्याकार हो गया है।

एक त्रासद तथ्य पर गौर करें। उत्तर प्रदेश की गुप्तचर पुलिस ने यादव सिंह को निर्दोष पाया और मुकदमा अदालत से वापस ले लिया था। महज इत्तेफाक था कि उसके चैबीस घंटे बाद ही लखनऊ के आयकर विभाग ने छापा मारा और यादव सिंह के बेहिसाब काले धन को पकड़ा। प्रदेश सरकार को ऐसी नाजायज हरकत का जवाब अब सीबीआइ और अदालत को देना पड़ेगा। बड़े राज खुलेंगे। दिग्गजों के सर लुढ़केंगे। मुख्य न्यायाधीश धनंजय चंद्रचूड ने कहा भी कि जनता की गाढ़ी कमाई को लूटने का हक किसी को नहीं है।

मगर यह पेचीदगी सुलझानी होगी कि यादव सिंह का तिलिस्म कितना विकराल था? उत्कोच की लिप्सा कितनी थी? यहीं पर फिर लोहिया को याद कर लें कि खूंटी गाड़ो। वरना क्या पता लाल टोपी कितना और खिसकती रहे।

याद करें पुराने दौर की लाल टोपी को, जब कांग्रेस-सोशलिस्ट पार्टी के लोगों ने सफेद गांधी टोपी की जगह रक्तिम रंग पसंद किया था। उसी युग के थे संघर्षशील सोशलिस्ट दामोदर स्वरूप सेठ, जो उत्तर प्रदेश सोशलिस्ट पार्टी के 1936 में संस्थापक अध्यक्ष थे। वे प्रदेश कांगे्रस के अध्यक्ष निर्वाचित हुए थे और आचार्य नरेंद्र देव उपाध्यक्ष। वे पच्चीस वर्ष की भरी तरुणाई में थे, जब काकोरी षड्यंत्र में गिरफ्तार हुए थे। फिर वे पांच बार जेल गए। भारत छोड़ो आंदोलन (1942) में दो साल कैद रहे।

तो अचरज होना स्वाभाविक है कि ऐसा राष्ट्रभक्त, समाजसेवी, क्रांतिकारी व्यक्ति आखिर धोखाधड़ी, जालसाजी और गबन के अपराध में कैसे, किन हालात में कैद हुआ और जेल की सजा पाई। यह महज राजनीतिक संयोग था और दगाबाज साथियों पर अतिविश्वास करने का नतीजा। दामोदरजी सरल प्रकृति के थे। घटना है भारत के स्वतंत्र होने के दो वर्ष बाद की। नेताजी सुभाष चंद्र के साथी रहे और उनकी पार्टी फारवर्ड ब्लॉक के उपाध्यक्ष रहे लाला शंकरलाल दामोदर स्वरूप के मित्र थे। शंकरलाल वाणिज्य प्रबंधन के माहिर और बीमा कंपनी के अध्यक्ष थे। उन्होंने एक कुटिल व्यूह रच कर जूपिटर बीमा कंपनी के शेयर हथिया लिए। नियंत्रण अपने हाथ में रखा, पर वित्तीय लेनदेन दामोदरजी के नाम पर करते रहे।

काले धन की आवक हुई और शंकरलाल ने अपना वित्तीय कारोबार विस्तृत कर लिया। जूपिटर बीमा कंपनी में शीघ्र ही शेयरों का घपला पकड़ा गया। सरकारी जांच में करीब पचास लाख रुपए का गबन और हेराफेरी उभर कर आई। बारह अभियुक्त बने, जिनमें शंकरलाल पहले नंबर पर थे और दामोदर स्वरूप नौंवे पर। आचार्य नरेंद्र देव ने दामोदर स्वरूप को सावधान भी किया था कि उन्हें आर्थिक बारीकियों का ज्ञान नहीं है, व्यापार से यह समाजवादी क्रांतिकारी अनभिज्ञ है। इसलिए वह जूपिटर कंपनी छोड़ कर बंबई से लखनऊ लौट आए। पर दामोदरजी तब तक इन विश्वासघाती मित्रों के कारण धोखाधड़ी में आकंठ डूब चुके थे।

बंबई जिला अदालत में मुकदमा चला। उस वक्त ब्रिटिश कारागार से तपे-तपाए निकले इस स्वाधीनता सेनानी और सोशलिस्ट की वित्तीय अपराध में संलिप्तता कोई सोच भी नहीं सकता था। खुद जवाहरलाल नेहरू ने अदालत में बयान दिया कि दामोदरजी ऐसे गबन का अपराध कर ही नहीं सकते।

नामी वकील और उत्तर प्रदेश के राज्यपाल रह चुके कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी ने अदालत में दामोदरजी की पैरवी खुद की। जिला जज ने दामोदरजी को दोषमुक्त कह कर रिहा कर दिया। तब बंबई सरकार ने उच्च न्यायालय में अपील दायर कर दी। मुकदमा लंबा चला। सहअभियुक्तों के बनावटी बयानों के कारण दामोदरजी को सात साल का सश्रम दंड मिला।

दामोदरजी ने बंबई उच्च न्यायालय के निर्णय को उच्चतम न्यायालय में चुनौती दी। इस अपील की सुनवाई की प्रधान न्यायाधीश कोका सुब्बा राव ने, जिन्हें विपक्षी पार्टियों ने 1967 में इंदिरा गांधी के प्रत्याशी डॉ. जाकिर हुसैन के विरुद्ध राष्ट्रपति पद का प्रत्याशी बनाया था। सुब्बा राव ने पांच वर्षों तक सुनवाई कर 18 मार्च, 1963 को दामोदर स्वरूप सेठ की सजा को बरकरार रखा। लेकिन दो वर्षों के भीतर (1965 में) उनका निधन हो गया। उन्हें बंबई कारागार में सश्रम कैद से महाराष्ट्र की राज्यपाल विजयलक्ष्मी पंडित ने बचाया। उन्होंने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रभानु गुप्त से आग्रह किया, तो दामोदरजी को लखनऊ के बलरामपुर अस्पताल में रुग्णावस्था में भर्ती कराया गया था।

बरेली में जन्मे, इलाहाबाद और लखनऊ में शिक्षित दामोदर स्वरूप सेठ महज बीस वर्ष की उम्र में बनारस षड्यंत्र मामले में पांच वर्ष जेल काट चुके थे। इस मामले के प्रमुख आरोपी शचींद्रनाथ सान्याल को काला पानी में कारावास हुआ था। वे हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी के संस्थापक थे, जिसमें भगतसिंह और चंद्रशेखर आजाद थे। दामोदर स्वरूप के साथ दूसरे आरोपी थे रासबिहारी बोस, जिन्होंने जापान में आजाद हिंद फौज गठित की थी, जिसका नेताजी सुभाषचंद्र बोस ने बाद में नेतृत्व किया। संविधान निर्मात्री सभा के सदस्य के नाते 1946 में दामोदर स्वरूप सेठ ने सदन में कहा था कि विश्व का भारी-भरकम यह संविधान पूंजीपतियों के अधिकारों का दस्तावेज है, आमजन के लिए रद्दी कागज।

प्रथम संसद के वे एकमात्र सोशलिस्ट सदस्य थे, क्योंकि समाजवादियों ने चुनाव का बहिष्कार किया था। पर इस निर्णय की सूचना देर से मिलने के कारण दामोदर स्वरूपजी अपना नामांकन वापस नहीं ले पाए। उन्होंने संविधान में आरक्षण का पुरजोर विरोध किया था, क्योंकि उनकी राय में इससे प्रशासन में अक्षम, निकम्मे और मूर्ख लोग चयनित हो जाएंगे। बेबाकी उनकी पहचान थी। शुरुआती दौर के सोशलिस्टों की संघर्ष गाथा अगर आज के समाजवादी पढ़ें, समझें और आत्मसात करें, तो फिर राजकोष के लुटेरों की कोई भी पैरवी नहीं कर सकता, जैसा लखनऊ उच्च न्यायालय में समाजवादी सरकार के वकीलों ने ठग यादव सिंह के लिए किया था। कहीं तो खूंटी गडेÞ, ताकि कदाचार की सीमा तय हो।

के. विक्रम राव

 

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