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मोदी को ना करके नायक बने पंड्या

मेडिसीन में एमडी की उपाधि हासिल कर अमेरिका में आकर्षक नौकरी को ठुकराया और हरिद्वार के शांतिकुंज में गायत्री परिवार का हिस्सा बने।
गायत्री परिवार के संचालक प्रणव पंड्या

मेडिसीन में एमडी की उपाधि हासिल कर अमेरिका में आकर्षक नौकरी को ठुकराया और हरिद्वार के शांतिकुंज में गायत्री परिवार का हिस्सा बने। आज वे जिस 12 करोड़ की सदस्य संख्या वाले परिवार के अगुआ हैं, उस परिवार की मर्जी का ख्याल रख राज्यसभा की नामजदगी को ठुकरा दिया। सत्ता पाने की होड़ के बीच जब उसे नकारने वाला सामने आता है तो नायकत्व का दर्जा हासिल कर लेता है। इस नकार की गूंज ही उसकी लोकसत्ता का अहसास कराती है। गायत्री परिवार के संचालक प्रणव पंड्या से जनसत्ता के कार्यकारी संपादक मुकेश भारद्वाज की बातचीत के अंश।

सवाल : आपके संस्थान की प्रशिक्षण पद्धति का बीज तत्त्व संस्कार है। आज जिस तरह से कई मंचों के जरिए जबरन संस्कार थोपे जा रहे हैं, क्या उसका कुछ हासिल है?
जवाब : संस्कार कोई थोपने की चीज नहीं होती। संस्कार बीज रूप में ही आरोपित किया जा सकता है। संस्कार निर्मित करना, चित्त में बैठाना आध्यात्मिक संत की पहली भूमिका है। व्यक्ति निर्माण बहुत बड़ी बात है। लाखों लोगों की भावनाएं हमसे ऐसी जुड़ीं कि वे पूरे भरोसे के साथ अपनी संतान हमें सौंपने को तैयार हो जाते हैं।

सवाल : उत्तर प्रदेश में एंटी रोमियो दस्ता बनाकर जो संस्कारी बनाने की कोशिश की जा रही है, उसे कैसे देखते हैं।
जवाब : कितनी भी कोशिश कर लें रोमियो को जबरन नहीं बदला जा सकता है। एक जगह आप उसे जबरन रोकिएगा तो मौका मिलते ही दूसरी जगह छुपकर करेगा। हम तीन हजार बच्चों का हर साल दाखिला लेते हैं और उन्हें बदलने की कोशिश करते हैं। संस्कार डंडे के जोर से नहीं डाला जा सकता है। इसके लिए स्वीकृति का वातावरण तैयार करना होता है।
सवाल : अपने अनुयायियों की रायशुमारी के बाद आपने देश का बड़ा सम्मान राज्यसभा की नामजदगी ठुकरा दी। शक्ति और सत्ता के केंद्र को ना कहना कितना मुश्किल था?
जवाब : मेरे पास संगठन की शक्ति है। संगठन की शक्ति छोड़ कर जाता तो गुरु के प्रति विश्वासघात होता। राज्यसभा के लिए हां बोलने के 24 घंटे बाद नींद नहीं आई। फिर मैंने शांतिकुंज में अपने सहयोगियों से पूछा तो उन्होंने मना किया। इलेक्ट्रॉनिक व्यवस्था का सहारा लेकर एक लाख लोगों तक अपना संदेश भेजा। अस्सी फीसद लोगों ने मुझे राज्यसभा जाने से मना किया। उन्होंने मना करते हुए कारण दिया कि आप हमारे बीच हैं तो हमें पूरा विश्वास है। आप राजनीति में उलझ जाएंगे तो अपने काम नहीं कर पाएंगे।

सवाल : पहले सत्ता की ओर से राज्यसभा नामजदगी स्वीकारने का दबाव और फिर साथियों और समर्थकों की ओर से नकारने का दबाव। इससे किस तरह से पार पाया?
जवाब : मुझे बहुत बढ़िया साथी मिले हैं। मैं उनकी सलाह मानता हूं। उन्होंने कहा कि आपकी आत्मा की आवाज क्या कहती है? मैंने कहा, आत्मा कहती है कि मैं यहीं रहूं। सहयोगियों ने पूछा कि क्या आप गायत्री परिवार की आवाज सदन में पहुंचा सकते हैं। सदन सुनेगा तब तो पहुंचा पाएंगे। अनुशासन अध्यात्म की पहली सीढ़ी है। और वहां तो यह है ही नहीं। मैंने तय किया कि अपने लोगों और देश के लिए काम शांतिकुंज से ही हो सकता है।

सवाल : सत्ता नकारने का अपना सुख होता है। ना बोलने के बाद आप भी इस सुखद भाव से गुजरे होंगे।
जवाब : बड़े मकसद के लिए इसे खारिज करने का अपना सुख था। यह तभी हो सकता है, जब आप अंतरात्मा से समृद्ध हों। मैंने अमेरिका में नौकरी का प्रस्ताव ठुकराया था। लेकिन एक आध्यात्मिक प्रतिनिधि के रूप में सौ से भी ज्यादा बार विदेश यात्रा की, तो उसका संतोष अलग था।
सवाल : कोई राष्टÑवादी है या नहीं इसका प्रमाणपत्र एक खास समूह दे रहा है। इस चलन का क्या?
जवाब : संस्कार या देशभक्ति सड़क पर डंडे के जोर से नहीं सिखाए जा सकते हैं। चाहे वह कश्मीर की समस्या हो हिंदू-मुसलमान के बीच सौहार्द पैदा करने की, इसके लिए दिल से वातावरण तैयार करना होगा।

सवाल : देश का संविधान धर्मनिरपेक्षता की बात करता है। लेकिन अभी इस शब्द को लेकर ही एक नकारात्मक वातावरण बन गया है।
जवाब : विनोबा ने कहा था कि धर्मनिरपेक्ष नहीं धर्मसापेक्ष होना चाहिए। हमें धर्मसापेक्ष होकर बात करनी होगी। हाल के अध्ययनों में यह बात सामने आई है कि भारत के युवा देश को प्रथम मानते हैं, धर्म को दूसरे स्थान पर रखते हैं। यह शुभ संकेत है। कुछ स्वार्थी तत्त्वों को हटा दें तो धर्मसापेक्ष समाज कभी भी फासीवादी नहीं होगा, जैसे आरोप लगते हैं।

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  1. चक्रपाणि पांडेय
    Apr 11, 2017 at 2:19 am
    प्रणव पण्ड्या जी के साहस को नमन.
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