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पहले राजनीतिक और भूमाफिया का संरक्षण, बाद में अवैध

जोहरा बीबी को उनके मालिकों के द्वारा बंधक बनाकर मारपीट करने के आरोप अभी साबित होने बाकी हैं।
Author July 22, 2017 02:03 am
नवीन ओखला औद्योगिक विकास प्राधिकरण (नोएडा)

1976 में गठित हुए नवीन ओखला औद्योगिक विकास प्राधिकरण (नोएडा) ने जहां एक तरफ औद्योगिक महानगर एवं बेहद महंगे शहर के रूप में विश्व मानचित्र पर अपनी पहचान बनाई है, वहीं निठारी कांड, आरुषि-हेमराज हत्याकांड जैसे मामलों ने इसे नकारात्मक चर्चा दी। इसी कड़ी में 12 जुलाई, 2017 को नोएडा के सेक्टर-78 की महागुन मॉडर्न सोसाइटी में घरेलू सहायिका जोहरा बीबी को बंधक बनाने को लेकर हुई पत्थरबाजी और तोड़फोड़ की घटना भी जुड़ गई है। जोहरा बीबी को उनके मालिकों के द्वारा बंधक बनाकर मारपीट करने के आरोप अभी साबित होने बाकी हैं।

जानकारों का मानना है कि इस तरह की घटनाएं आने वाले दिनों में एक बड़े खतरे का संकेत हैं। करोड़ों रुपए कीमत वाली कोठियों या अपार्टमेंटों से सटी अवैध झुग्गियां स्थापित हो चुकी हैं। ये झुग्गियां न केवल देश के विभिन्न हिस्सों से रोजगार की तलाश में आने वालों को सस्ता आशियाना मुहैया करा रही हैं। वहीं बड़ी संख्या में बांग्लादेशी भी पश्चिम बंगाल या बंगाली भाषा बोलने वालों के साथ घुलमिल कर रह रहे हैं। ऐसी झुग्गी बस्तियों को स्थापित करने में स्थानीय लोग या भूमाफिया मदद देते हैं। शुरुआत में महज जमीन को घेरने या कब्जा करने की नीयत से डाली जाने वाली झुग्गी बस्तियां कुछ ही सालों में बकायदा एक अवैध कालोनी का आकार लेकर वोट बैंक में तब्दील हो रही हैं। कुछ ही इलाके में हजारों मतदाताओं का लालच इन झुग्गियों को राजनैतिक रंग में रंग देता है। जहां सभी राजनैतिक दलों के नेता पहुंचकर बिजली के खंबे, मीटर, सीवर-पानी का लाइन बिछाने की व्यवस्था करते हैं।

नोएडा में सेक्टर- 8, 9, 10 पूरी तरह से स्थापित झुग्गी बस्तियां हैं। औद्योगिक सेक्टरों में पूरी तरह से अवैध बनी इन झुग्गियों को राजनीतिक संरक्षण के कारण प्राधिकरण पूरी तरह से नाकाम रहा है। पूर्व मायावती सरकार के कार्यकाल में अवैध झुग्गियों में रहने वालों को रियायती दरों पर सेक्टर-122 में फ्लैट बनाकर दिए जाने की योजना तैयार हुई थी। हालांकि झुग्गी वासियों के फ्लैट आबंटन योजना में नेताओं के कूदने के कारण आबंटन नहीं किया जा सका। इसके अलावा पर्थला खंजरपुर गांव के पास हिंडन पुश्ते के किनारे कई किलोमीटर तक झुग्गियां फैली हुई हैं। यहां रहने वाले निर्माणाधीन इमारतों में मजदूरी के अलावा घरों में सहायक-सहायिका के रूप में काम करते हैं। एनएच-24 से सटे छिजारसी पुश्ते के किनारे भी चोटपुर कालोनी जैसी कई किलोमीटर तक झुग्गी बस्तियां बन चुकी हैं। जानकारों के मुताबिक, भू-माफिया और नेताओं के संरक्षण में बनने वाली झुग्गी बस्तियां न केवल नोएडा बल्कि पूरे देश में अवैध धंधों की भी पनाहगाह बन गई हैं। नेताओं के दबाव में इन्हें हटाने में पुलिस और प्रशासनिक व्यवस्था पूरी तरह से नाकाम रही है।

वैध या अवैध बांग्लादेशी की बहस हुई शुरू
बांग्लादेशी नौकरानी के उत्पीड़न के नाम पर शुरू हुए इस विवाद ने एक नई बहस पैदा कर दी है। बताया गया है कि झुग्गियों में रहने वाले बांग्लादेशियों के पास वे सभी दस्तावेज जैसे वोटर कार्ड, आधार कार्ड आदि मौजूद हैं, जो एक आम भारतीय नागरिक के पास हैं। चंद रुपए देकर इन्हें बनाने की सुविधा कमोबेश हर गली-मोहल्ले में उपलब्ध है। दस्तावेजों की उपलब्धता में भी बाहरी लोगों को स्थानीय नेताओं का परोक्ष समर्थन मिल रहा है। इसी कड़ी में आगे महागुन के विवाद को सांप्रदायिक रंग देने की कोशिश लोगों की समझदारी से नाकाम हो गई है लेकिन इसे हवा देने के भरसक प्रयास जरूर किए गए थे। ऐसे मामलों पर जानकारी रखने वाले कुछ लोगों का मानना है कि अवैध झुग्गी बस्तियों या कॉलोनियों में नेताओं से ज्यादा प्रभाव एनजीओ का रहता है। ऐसे दर्जनों एनजीओ देश के प्रत्येक शहर में हैं, जो बस्तियों में सिलाई मशीन केंद्र, स्कूल, मदरसे आदि खुलवाने में मदद करते हैं। ऐसी ही कुछ एनजीओ ने कामगार यूनियनों का चोंगा ओढ़ लिया है। जो इस विवाद को लगातार उछालने में लगे हैं।

क्या था विवाद

सेक्टर- 78 की महागुन सोसाइटी में 12 जुलाई की सुबह सैकड़ों लोगों ने पत्थरबाजी और तोड़-फोड़ की। सोसाइटी में रहने वालों ने दरवाजे बंद कर अपनी जान बचाई। भीड़ के तांडव का आलम यह था कि वहां मौजूद पुलिस और पीसीआर को भी पीछे हटना पड़ा। सोसाइटी में नौकरानी के रूप में काम करने वाली जोहरा को बंधक बनाए जाने की सूचना से बवाल शुरू हुआ। नौकरानी के परिजन सैकड़ों लोगों के साथ वहां पहुंचे। तोड़फोड़ और पत्थरबाजी की। टॉवर-5 के भूतल पर रहने वाली मितुल सेठी के यहां काम करती थी जोहरा। मितुल के 17 हजार रुपए चोरी हो गए थे। उनकी पत्नी हर्षू ने सीसीटीवी फुटेज के आधार पर जोहरा पर रुपए ले जाने का आरोप लगाया था। चोरी के आरोप में मितुल परिवार ने जोहरा को काम से निकाल दिया। जोहरा उस दिन सोसाइटी के अन्य अपार्टमेंट में रही। जोहरा के रात में भी घर नहीं पहुंचने पर उसके पति सत्तार ने तलाश शुरू की। सत्तार ने थाना सेक्टर-49 पुलिस से भी जोहरा की तलाश करने में मदद मांगी थी। 12 जुलाई को तड़के जोहरा को सोसाइटी में बंधक बनाकर रखने की सूचना उसके परिजनों को मिली। जिसके बाद सैकड़ों लोगों ने सोसाइटी पर धावा बोल दिया। सोसाइटी के सुरक्षाकर्मियों ने भी भीड़ को तितर-बितर करने के लिए लाठियां बरसार्इं। आरोप लगाया गया था कि एक सुरक्षाकर्मी के हवा में गोली चलाने पर भीड़ उग्र हुई। मामले को लेकर जोहरा और मितुल, दोनों की तरफ से मामला दर्ज कराया गया। इसके अलावा सोसाइटी के दो अन्य लोगों ने भी मामले को लेकर एफआइआर दर्ज कराई थी। घटना के अगले दिन सीसीटीवी फुटेज के आधार पर पुलिस ने 13 संदिग्धों को गिरफ्तार किया। वहीं, घटना के बाद प्राधिकरण ने सोसाइटी के पास बनी झुग्गियों को अवैध अतिक्रमण मानते हुए कार्रवाई की।

अपने स्तर से फैसला न करें
संविधान किसी भी नागरिक को अपने स्तर से किसी को सजा देने का अधिकार नहीं देता है। महागुन मामले में किसी को भी आपत्ति है, तो उसे पुलिस से शिकायत करनी चाहिए थी। न कि खुद तांडव या पथराव कर कानून-व्यवस्था हाथ में लेनी चाहिए थी। अवैध रूप से रहने वाले बांग्लादेशी नागरिकों के पास भारतीय दस्तावेज होना जांच का विषय है। उन लोगों के वोटर कार्ड या आधार कार्ड की पुलिस-प्रशासन को जांच करानी चाहिए।
– डॉ. महेश शर्मा, गौतमबुद्धनगर सांसद एवं केंद्रीय मंत्री

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