June 26, 2017

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राजनीतिः जल संकट लाइलाज नहीं है

तेजी से गहराते जल संकट के बीच सरकारी तंत्र की रुचि कागजी परियोजनाओं तक सिमट कर रह गई है। कानून बनाने या सर्वेक्षण कराने अथवा आकलन की कवायद ही ज्यादा होती रही है। जल संकट से निजात पाने के लिए समाज और सरकार की गंभीर हिस्सेदारी तो आज की सबसे बड़ी जरूरत है ही, व्यक्तिगत स्तर पर भी लोग या छोटे समूह पहल कर सकते हैं।

Author May 19, 2017 02:59 am
अंतरराष्ट्रीय एनजीओ ‘वाटर एड’ का कहना है कि दुनिया का हर दसवां प्यासा व्यक्ति ग्रामीण भारत में रहता है।

श्रीश चंद्र मिश्र 

अंतरराष्ट्रीय एनजीओ ‘वाटर एड’ का कहना है कि दुनिया का हर दसवां प्यासा व्यक्ति ग्रामीण भारत में रहता है। पीने के साफ पानी की कमी की समस्या भले ही वैश्विक स्तर पर हो, लेकिन भारत के लिए यह संकट कितना भयावह है इसे सिर्फ एक आंकड़े से समझा जा सकता है। देश की सड़सठ फीसद आबादी गांवों में रहती है, यानी 83 करोड़ 80 लाख लोग ग्रामीण भारत का हिस्सा हैं। इनमें से छह करोड़ तीस लाख लोगों को पानी मयस्सर नहीं है। इन प्यासे लोगों की संख्या ब्रिटेन की कुल आबादी के बराबर है और इन लोगों को अगर एक लाइन में खड़ा कर दिया जाए तो न्यूयार्क से सिडनी और फिर सिडनी से न्यूयार्क तक दो लाइनें बन सकती हैं। पिछले साल सरकार ने भी माना था कि देश की एक चौथाई आबादी सूखा पीड़ित है। वैसे पूरी दुनिया में 66 करोड़ 30 लाख प्यासे लोग हैं जिनमें पचास करोड़ लोग ग्रामीण इलाकों में रहते हैं। यूनेस्को की एक रिपोर्ट के मुताबिक पिछले दस साल में भू-जल स्तर पैंसठ फीसद तक गिर गया है। जमीन से खींचे गए पानी के इस्तेमाल के मामले में भारत दुनिया में पहले नंबर पर आता है। अस्सी फीसद से ज्यादा पानी की जरूरत भूजल से पूरी होती है। सरकारी स्तर पर किए गए भूजल स्रोत के आकलन में भी माना गया है कि भूजल के छठे से ज्यादा हिस्से का इस्तेमाल हो चुका है। इससे संकट का एक और रूप सामने आया है।

दुनिया में अव्वल रहते हुए अपने गांवों में सबसे ज्यादा प्यासे लोगों का होना कोई गौरव की बात नहीं है। इस मामले में जो अन्य नौ शीर्ष देश हैं उनमें दूसरे नंबर पर चीन के बाद नाइजीरिया, डीआर कांगो, इथोपिया, इंडोनेशिया, तंजानिया, बांग्लादेश, अफगानिस्तान व केन्या जैसे देश शामिल हैं। आबादी के अनुपात में इन आंकड़ों को तार्किक माना जा सकता है लेकिन विकास और प्रगति की अवधारणा तो इससे ध्वस्त होती ही है। तमाम सरकारी दावों के बावजूद यह स्थिति इसलिए सबसे ज्यादा दयनीय लगती है कि पीने का पानी जुटाना अपने देश में मुख्य रूप से महिलाओं व लड़कियों की जिम्मेदारी माना जाता है। पानी आसानी से उपलब्ध न होने की वजह से उन्हें अपनी दिनचर्या का अधिक से अधिक समय पानी की व्यवस्था करने में लग जाता है।

प्रकृति ने तो प्रचुर मात्रा में पानी मुहैया कराया है लेकिन पानी की सप्लाई का उपयुक्त नेटवर्क विकसित न किए जा सकने जैसे मानवीय कारकों की वजह से पीने का शुद्ध पानी ज्यादा से ज्यादा लोगों की पहुंच से दूर होता जा रहा है। यूनेस्को की रिपोर्ट के मुताबिक पिछले दस साल में भारत में भूजल स्तर औसतन पैंसठ फीसद तक गिरा है। उत्तर प्रदेश में नवासी फीसद कुओं का जल-स्तर पिछले दस साल में लगातार घटा है। तेलंगाना में अट्ठासी फीसद, बिहार में अठहत्तर फीसद, उत्तराखंड में पचहत्तर फीसद और महाराष्ट्र में चौहत्तर फीसद कुएं जल-स्तर घटने की वजह से समस्या बन गए हैं। राजधानी दिल्ली में लगातार गिरता भूजल-स्तर खतरनाक मोड़ पर पहुंच गया है। स्थिति लगातार बिगड़ती जा रही है। 1983 में करीब तैंतीस फुट खुदाई करने पर ताजा पानी मिल जाता था। 2011 तक पानी 132 फुट नीचे चला गया। देश के कुछ राज्यों मसलन तमिलनाडु, असम, राजस्थान और हरियाणा में कुओं का जल-स्तर चौवालीस से पैंसठ फीसद बढ़ा है तो बारिश के बदलते पैटर्न की वजह से। यानी उसमें योजनबद्ध तकनीक अपनाए जाने का कोई खास योगदान नहीं रहा।

समस्या वैश्विक है। ‘वाटर एड’ का अनुमान है कि 2050 तक दुनिया की चालीस फीसद से ज्यादा आबादी पर जल संकट की छाया रहेगी। अब भी समस्या कोई कम खतरनाक नहीं। दुनिया के जिन देशों की ग्रामीण आबादी साफ पानी के बिना जी रही है, उनमें अंगोला के 71.8 फीसद ग्रामीण, डीआर कांगो के 68.8 फीसद ग्रामीण और पापुआ न्यू गिनी के 67.2 फीसद ग्रामीण हैं। मैडागास्कर (64.7 फीसद), मोजांबिक (62.9 फीसद) और चाड (55.2 फीसद) भी बेहतर स्थिति में कहां हैं? नाइजीरिया व इथोपिया में करीब चार करोड़ नब्बे लाख ग्रामीण आज पीने के साफ पानी को तरस रहे हैं तो आगे क्या होगा, इसकी कल्पना ही कंपकंपा देती है।

विशेषज्ञ जल संकट के पीछेकई कारण गिनाते हैं। 2016 में लगातार तीसरे साल वैश्विक तापमान रिकार्ड स्तर पर बढ़ा। ‘वाटर एड’ ने मौसम के मिजाज में अप्रत्याशित रूप से आने वाले बदलाव को इसकी मुख्य वजह बताया है। इस बदलाव से या तो तूफान अथवा बाढ़ आ जाती है नहीं तो सूखा पड़ जाता है, जिससेनदी, तालाब और झरने सूख जाते हैं। ज्यादा खतरनाक बात यह है कि यह बदलाव कई बीमारियों का जनक बनता जा रहा है। हर साल गंदे पानी के निकास और साफ-सफाई की उपयुक्त व्यवस्था न होने की वजह से तीन लाख पंद्रह हजार से ज्यादा बच्चे अकाल मौत के शिकार हो जाते हैं। दुनिया भर में कुपोषण के आधे से ज्यादा मामले खराब पानी से उपजी बीमारियों की देन होते हैं। लगातार बढ़ती आबादी एक अलग खतरे का संकेत है। 2030 तक दुनिया की आबादी 850 करोड़ और 2050 तक 970 करोड़ हो जाने का अनुमान है। इससे पानी की मांग और बढ़ेगी।

पानी की समस्या के गहराते जाने के दो खास कारण हैं। एक, पानी का अविवेकपूर्ण दोहन और निरंकुश इस्तेमाल, और दूसरा, पानी का व्यवसायीकरण। अविवेकपूर्ण दोहन का हाल यह है कि देश में ‘डार्क जोन’ बढ़ते जा रहे हैं, यानी ऐसे इलाके जहां भूजल निकालना या पाना संभव नहीं रह गया है। पानी के निरंकुश इस्तेमाल के नजारे हर रोज हर तरफ दिखते हैं। पानी के व्यवसायीकरण की गति इतनी तेज है कि 2008 की विश्वव्यापी महामंदी के दौरान भी पानी का कारोबार फलता-फूलता रहा। कुछ लोगों का मानना है कि पानी के व्यवसायीकरण से लोग पानी की कीमत समझेंगे और तभी पानी की बर्बादी रुकेगी। अगर यह तर्क सही है तो पानी की बर्बादी पर रोक लगने की प्रक्रिया काफी तेज हो जानी चाहिए थी। क्या ऐसा हुआ है?

जल संकट लाइलाज बीमारी नहीं है, यह कुछ गरीब विकासशील देशों ने दिखाया भी है। पैराग्वे में वर्ष 2000 में 51.6 फीसद ग्रामीण आबादी को पीने का पानी उपलब्ध था। 2015 में यह आंकड़ा बढ़ कर 94.9 फीसद हो गया। इन पंद्रह सालों में मलावी में भी गांव-गांव तक पानी पहुंचाने में खासी सफलता मिली। वर्ष 2000 में वहां 57.3 फीसद ग्रामीण आबादी को ही पानी मयस्सर था। 2015 आते-आते वहां 89.1 फीसद आबादी की प्यास बुझा दी गई। जाहिर है, यह किसी चमत्कार से नहीं हुआ। सरकार और आम लोगों की सामूहिक भागीदारी से ही यह संभव हो पाया। भारत में जल संचय की पुरानी परंपरा रही है। राजस्थान में बारिश के पानी को सुरक्षित रखने का काम तो बिना किसी सरकारी मदद के सामाजिक स्तर पर सदियों से किया जाता रहा। दक्षिण में मंदिरों के पास तालाब बनवाने का पुराना रिवाज रहा ही। लेकिन समय बदलने के साथ-साथ प्राथमिकताएं बदल गई हैं। तेजी से गहराते जल संकट के बीच सरकारी तंत्र की रुचि कागजी परियोजनाओं तक सिमट कर रह गई है। कानून बनाने या सर्वेक्षण कराने अथवा आकलन की कवायद ही ज्यादा होती रही है। समस्या के प्रति सामाजिक सरोकार भी टूटते जा रहे हैं। जल संकट से निजात पाने के लिए समाज और सरकार की गंभीर हिस्सेदारी तो आज की सबसे बड़ी जरूरत है ही, इस दिशा में व्यक्तिगत स्तर पर भी लोग या छोटे समूह पहल कर सकते हैं।

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First Published on May 19, 2017 2:58 am

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