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राजनीतिः दुष्कर्म के शिकार बच्चे

पिछले पंद्रह अगस्त को चंडीगढ़ में अपने स्कूल में स्वतंत्रता दिवस कार्यक्रम में भाग लेने जा रही तेरह साल की बच्ची के साथ दुष्कर्म हुआ।
Author September 1, 2017 01:55 am
तस्वीर का इस्तेमाल प्रतीक के तौर पर किया गया है।

पचास सालों में बाल यौन उत्पीड़न हमारी चिंता का विषय नहीं रहा। यही कारण है कि इसकी विकरालता बढ़ती गई। बाल यौन उत्पीड़न के सारे शोधों में एक बात साफ तौर पर उभर कर आई कि यौन उत्पीड़न करने वाले अधिकतर परिवार के सदस्य या परिचित हैं। ऐसा क्यों? यह विचारणीय बिंदु है। बच्चों का लालन-पालन ऐसे वातावरण में होता है कि वे जिन लोगों को अपने आसपास या घर और स्कूल में देखते हैं उन पर भरोसा करने लगते हैं और फिर वे वह सब करने लगने हैं जैसा उनसे कहा जाता है। 

पिछले पंद्रह अगस्त को चंडीगढ़ में अपने स्कूल में स्वतंत्रता दिवस कार्यक्रम में भाग लेने जा रही तेरह साल की बच्ची के साथ दुष्कर्म हुआ। उसके पिता का सवाल था कि ‘क्या मेरी बेटी और हम आजादी के जश्न को इस तरह याद करेंगे!’ शिमला में सामूहिक दुष्कर्म और हत्या की शिकार गुड़िया के माता-पिता भी स्तब्ध थे कि उनकी बेटी को किस अपराध की सजा मिली! वास्तव में बाल यौन उत्पीड़न आधुनिक समाज का एक विकृत और खौफनाक सच बन चुका है।
बच्चों के यौन उत्पीड़न के संदर्भ में अगर भारत की बात की जाए तो स्थितियां डरावनी हैं। हाल की एक रिपोर्ट के मुताबिक देश भर में बारह से अठारह साल की आयु के बीच का हर दूसरा बच्चा यौन उत्पीड़न का दंश झेलता है। मानवाधिकारों के लिए काम करने वाली संस्था, ‘वर्ल्ड विजन इंडिया’ के एक सर्वे में देश भर के विभिन्न हिस्सों के 45,844 बच्चों से प्रतिक्रिया ली गई। यह तथ्य निकल कर आया कि हर पांच में से एक बच्चा खुद को यौन उत्पीड़न के प्रति सुरक्षित नहीं महसूस करता तथा हर चार में से एक परिवार ने बच्चे के साथ हुए यौन शोषण की शिकायत नहीं की। संस्था ने 2021 तक देश के पच्चीस राज्यों और एक केंद्र शासित क्षेत्र में रहने वाले एक करोड़ बच्चों को यौन शोषण से मुक्ति दिलाने की प्रतिबद्धता जताई है।

बाल यौन उत्पीड़न का सबसे दुर्भाग्यपूर्ण पहलू यह है कि हर दूसरा बच्चा इसका शिकार हो रहा है। इसके बावजूद इसे लेकर चुप्पी पसरी हुई है। यह भी ठीक से नहीं पता है कि बच्चे किस हद तक यौन उत्पीड़न झेल रहे हैं। किसी भी सामाजिक समस्या का उपचार करने के लिए यह नितांत आवश्यक हो जाता है कि उसके संबंध में गहन शोध किए जाए। बाल यौन उत्पीड़न पर हुए शोधों को अंगुलियों पर गिना जा सकता है। बंगलुरु की एक संस्था ‘संवाद’ के अनुसार 1996 में हाईस्कूल में पढ़ने वाली छात्राओं से मालूम हुआ कि सैंतालीस प्रतिशत का यौन शोषण हो चुका था। 1997 में साक्षी संस्थान द्वारा दिल्ली की तीन सौ पचास स्कूली छात्राओं के सर्वेक्षण से ज्ञात हुआ था कि तिरसठ प्रतिशत लड़कियों का पारिवारिक सदस्यों द्वारा किसी न किसी रूप में शोषण हुआ। 1999 में टाटा इंस्टीट्यूट आॅफ सोशल सर्विसेज द्वारा 1994-94 में मुंबई की डेढ़ सौ लड़कियों के अध्ययन के बाद यह पता चला कि अट्ठावन प्रतिशत लड़कियों का यौन शोषण दस वर्ष की उम्र से पहले ही हो चुका था। पचास प्रतिशत मामलों में शोषण करने वाले परिवार के सदस्य या रिश्तेदार ही थे। 1997 में दिल्ली के ‘राही’ संस्थान द्वारा दिल्ली, मुंबई, कोलकाता और गोवा में रहने वाली मध्यवर्गीय और उच्च वर्गीय एक हजार लड़कियों के अध्ययन में सामने आया कि इनमें छिहत्तर प्रतिशत का शोषण बचपन में हो चुका था और इकहत्तर प्रतिशत का शोषण परिवार के सदस्यों ने या निकट परिचितों ने किया।

पचास सालों में बाल यौन उत्पीड़न हमारी चिंता का विषय नहीं रहा। यही कारण है कि इसकी विकरालता बढ़ती गई। बाल यौन उत्पीड़न के सारे शोधों में एक बात साफ तौर पर उभर कर आई कि यौन उत्पीड़न करने वाले अधिकतर परिवार के सदस्य या परिचित हैं। ऐसा क्यों? यह विचारणीय बिंदु है। बच्चों का लालन-पालन ऐसे वातावरण में होता है कि वे जिन लोगों को अपने आसपास या घर और स्कूल में देखते हैं उन पर भरोसा करने लगते हैं और फिर वह सब करने लगने हैं जैसा उनसे कहा जाता है। विश्वास का यही रिश्ता यौनाचार करने वालों के लिए रास्ते खोल देता है। एक सत्य और भी है कि आमतौर पर अभिभावकों को इस तथ्य का अंदाजा ही नहीं होता है कि उनके बच्चे का शोषण उनका कोई करीबी ही कर रहा है। बच्चों को डरा धमका कर या परिवार की प्रतिष्ठा की दुहाई देकर उन्हें मुंह बंद रखने को मजबूर किया जाता है। ‘बिटर चॉकलेट-चाइल्ड सेक्सुअल एब्यूज इन इंडिया’ की लेखिका के मुताबिक बच्चों के साथ यौन दुर्व्यवहार भारतीय परिवारों की जड़ों में गहरे तक समाई सच्चाई है। यौन उत्पीड़न के बहुत सारे मामले तो कानून की नजर में नहीं आ पाते। इसका एक प्रमुख कारण हमारा सामाजिक ढांचा है, जहां ‘प्रतिष्ठा’ के लिए जान की कीमत कम आंकी जाती है और झूठे सम्मान को बचाए रखने के लिए अभिभावक, अपने बच्चों के खिलाफ हो रहे अत्याचारों को सामने लाने से हिचकते हैं जो कि प्रत्यक्ष रूप में उन लोगों के लिए बढ़ावा है जो नन्हे मासूमों को अपने शोषण का शिकार बनाते हैं।

यौन उत्पीड़न के शिकार बच्चे अवसाद का शिकार हो जाते हैं। शोषण उनके बौद्धिक विकास को क्षीण कर देता है। वे हमेशा भयभीत रहने लगते हैं और समाज से कटने लगते हैं। प्रसिद्ध सितारवादक अनुष्का शंकर ने 2013 में कहा था, ‘मैं बचपन में छेड़छाड़ और विभिन्न प्रकार के शारीरिक शोषण का शिकार हुई। मुझे नहीं पता था कि इससे किस प्रकार निपटना है, मुझे नहीं पता था कि इसे कैसे रोका जा सकता था। बतौर महिला मुझे लगता है कि मैं बहुधा भय के साये में रहती हूं। रात में अकेले बाहर निकलने से डरती हूं। मुझे नहीं पता था इससे किस प्रकार निपटना है?’ यह हर यौन उत्पीड़ित बच्चे की समस्या है क्योंकि एक लंबे समय तक तो वह यह जान ही नहीं पाता कि उसके साथ यह सब क्यों हो रहा है। और यही कारण है कि वह सामाजिक, भावात्मक और मनोवैज्ञानिक समेत कई स्तरों पर खुद को अलग कर लेता है। इसलिए यह सबसे जरूरी हो जाता है कि अभिभावक अपने बच्चों को ऐसा पर्यावरण घर पर दें कि बच्चे उनसे खुल कर बात कर सकें और उनके साथ होने वाली हर घटना को बेखौफ बता सकें। इसके साथ ही उन्हें बहुत छोटी आयु से ही अच्छा स्पर्श और बुरा स्पर्श समझाने की चेष्टा करनी चाहिए जिससे कि वे अपने को अनुचित व्यवहार से बचा सकें। यह भी जरूरी है कि हर विद्यालय में ऐसे परामर्शदाताओं की नियुक्ति की जाए जो बच्चों के मनोभावों को पढ़ सकें और उनको उत्पीड़न के तौर-तरीकों को समझा सकें।

हमें यह समझना होगा कि इस बुराई का पहला उपचार संवाद और जागरूकता ही है। जहां तक इस संदर्भ में वैधानिक नियमों की बात है तो बाल उत्पीड़न के विरुद्ध ‘इंडियन एकेडमी आॅफ पीडियाट्रिक्स’ की दिशा-निर्देशिका में सभी चिकित्सकों को निर्देश दिए गए हैं कि अगर उन्होंने बाल उत्पीड़न की सूचना समय पर नहीं दी तो उन्हें दो साल की सजा भी हो सकती है। बच्चों की यौन उत्पीड़न से सुरक्षा के लिए प्रोटेक्शन आॅफ चिल्ड्रन फ्रॉम सेक्सुअल आॅफेंस एक्ट (पोक्सो अधिनियम) 2012 लागू हुआ, जिसके तहत् बच्चों के यौन उत्पीड़न को दंडनीय अपराध माना गया और न्याय की पूरी प्रक्रिया को पीड़ित बच्चे के अनुकूल रखने का प्रयास हुआ। पहले अश्लीलता और उत्पीड़न से जुड़े मामलों में मुकदमा चलाना काफी मुश्किल था, क्योंकि सभी मामले भारतीय दंड संहिता के तहत ही दर्ज होते थे। इस कानून के अमल में आने के पांच साल बाद भी पीड़ित बच्चों की स्थितियों में कोई खास बदलाव नहीं हुआ।

पॉक्सो के क्रियान्वयन और देखरेख के लिए राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग और राज्यों के बाल अधिकार संरक्षण आयोग जवाबदेह हैं। ज्यादातर राज्य आयोग खराब बुनियादी ढांचे, संसाधनों की कमी और स्वायत्तता की शक्ति से जूझ रहे हैं। पॉक्सो की धारा 35 ‘विशेष पॉक्सो अदालत’ के लिए यह अनिवार्य करती है कि पीड़ित बच्चे के बयान और सबूत तीस दिन के भीतर रिकॉर्ड किए जाएं और एक साल के अंदर मामले का निपटारा किया जाए। देश के कई भागों में या तो इन मामलों को सुनने के लिए कोई स्थायी अदालत नहीं है और अगर है भी तो फिर वह काम नहीं कर रही है। यह तय है कि अगर वैधानिक स्तर पर बच्चों की सुरक्षा के मामले में संवेदनशीलता दिखानी है तो पॉक्सो के प्रावधानों को अमल में लाने के लिए फिर से समीक्षा करनी होगी।

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