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राजनीतिः कर्ज-माफी काफी नहीं

पंजाब सरकार ने अहम फैसला लेते हुए लघु और सीमांत किसानों की कर्जमाफी की घोषणा की है। इसके बाद कर्नाटक की भी कांग्रेस सरकार ने किसानों की कर्जमाफी का कदम उठाया है।
तस्वीर का इस्तेमाल संकेत के तौर पर किया गय है। (File Photo)

किसानों की आत्महत्या की वजह सिर्फ कर्ज नहीं है। कृषि में बढ़ती लागत और पैदावार की गिरती कीमतें भी मुख्य कारण हैं। लगातार बढ़ती कृषि लागत से पीड़ित किसान जब अपने उत्पाद लेकर बाजार में जा रहा है, तो उसे औने-पौने दामों में खरीदा जा रहा है।  ऐसे में सरकार को कृषिउत्पादों के लाभकारी मूल्य के लिए सख्त कदम उठाने होंगे।  

पंजाब सरकार ने अहम फैसला लेते हुए लघु और सीमांत किसानों की कर्जमाफी की घोषणा की है। इसके बाद कर्नाटक की भी कांग्रेस सरकार ने किसानों की कर्जमाफी का कदम उठाया है। कर्नाटक सरकार ने प्रति किसान पचार हजार रुपए तक कर्ज माफ किया है। पंजाब में ढाई एकड़ तक के जोत वाले किसानों का सारा फसली कर्ज माफ कर दिया गया है। जबकि ढाई से पांच एकड़ तक के किसानों का दो लाख रुपए तक का कर्ज माफ किया गया है। इस घोषणा से पंजाब के लगभग दस लाख किसानों को सीधा लाभ मिलेगा। सरकार का अनुमान है कि कर्जमाफी से सरकारी खजाने पर लगभग पंद्रह हजार करोड़ रुपए का भार पड़ेगा।

कर्जमाफी को लेकर पंजाब सरकार पर भारी दबाव था। विधानसभा चुनावों से पहले कैप्टन अमरिंदर सिंह ने किसानों के ऋण माफ करने का वादा किया था। इस बीच उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र सरकार द्वारा किसानों की ऋणमाफी की घोषणा ने पंजाब सरकार पर दबाव बढ़ा दिया था। हालांकि पंजाब सरकार का दावा है कि उसकी ऋणमाफी योजना उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र सरकार से कहीं बेहतर है। लेकिन अहम सवाल यह है कि क्या सिर्फ ऋणमाफी से किसानों का संकट खत्म हो जाएगा, या कुछ और जरूरी संस्थागत सुधारों की तरफ सरकारों को बढ़ना होगा?

प्रतिदिन पूरे देश से किसानों की आत्महत्या की खबरें आ रही हैं। किसान संगठनों का तर्क है कि पूरे देश के किसानों पर लगभग बारह लाख करोड़ रुपए का कर्ज है। अगर इसमें लघु और सीमांत किसानों के तीन से चार लाख करोड़ रुपए के कर्ज माफ कर दिए जाएं तो देश की अर्थव्यवस्था पर कोई पहाड़ नहीं टूट पड़ेगा। सरकारें अगर अपनी फिजूलखर्ची ही रोक दें तो सीमांत और छोटे किसानों की कर्जमाफी का रास्ता निकल आएगा।
जिस समय पंजाब सरकार ने ऋणमाफी का फैसला लिया उसी समय पंजाब में किसानों की स्थिति पर पंजाब विश्वविद्याल, पटियाला की एक अध्ययन रिपोर्ट सामने आई। अध्ययन के अनुसार पंजाब का कृषिक्षेत्र विस्फोट के कगार है। पूरी दुनिया में पैदावार के मानचित्र पर स्थान बनाने वाले पंजाब के किसानों की हालत मजदूरों के बराबर हो गई है। अध्ययन के अनुसार किसानों की इस हालत के लिए कर्ज, कृषिकार्य में लागत-वृद्धि और कृषि उत्पादों की गिरती कीमतें जिम्मेवार हैं। इन तीनों समस्याओं से पीड़ित किसान आत्महत्या जैसे चरम त्रासद कदम उठा रहे हैं।

अध्ययन के मुताबिक पंजाब के 86 प्रतिशत किसान और 80 प्रतिशत कृषि मजदूर कर्ज से दबे हैं। सीमांत किसानों पर प्रति एकड़ औसतन पैंसठ हजार रुपए का कर्ज है, तो छोटे किसानों पर प्रति एकड़ पचपन हजार रुपए का। मझोले किसानों पर प्रति एकड़ पैंतालीस हजार रुपए का कर्ज है तो बड़े किसानों पर प्रति एकड़ पचास हजार रुपए का। सर्वे का सबसे दिलचस्प पहलू यह है कि पंजाब के सीमांत किसानों का बत्तीस प्रतिशत गरीबी रेखा से नीचे गुजर-बसर कर रहा है। मझोले किसानों के 6 फीसद की भी यही हालत है। कृषि मजदूरों की हालत तो और भी खराब है। पंजाब के कृषि मजदूरों का अस्सी प्रतिशत गरीबी रेखा से नीचे गुजारा कर रहा है।

किसानों के पास गुजर-बसर करने के लायक ही मुश्किल से पैसे आ रहे हैं, क्योंकि खेती में भारी घाटा हो रहा है। किसान की फसल की कीमत हर साल पिछले साल के मुकाबले घट रही है। वहीं दूसरी तरफ खेती के कार्य में इस्तेमाल होने वाली जरूरी चीजों की आपूर्ति करने वाली कंपनियों के मुनाफे में हर साल अच्छी-खासी वृद्धि हो रही है। चाहे कीटनाशक बनाने वाली कंपनी हो या खाद बनाने वाली कंपनी, सबको भारी मुनाफा हो रहा है। कृषि-उपकरण बनाने वाली कंपनियों भी काफी मुनाफा बटोर रही हैं। कंपनियों के मुनाफे के खेल को सरकार की तरफ से भी प्रोत्साहन मिल रहा है।

कृषि से संबंधित सामानों की आपूर्ति करने वाली कंपनियां तो लगातार अपने उत्पादों की कीमतें बढ़ा रही हैं लेकिन किसानों के उत्पादों की कीमतें लगातार गिर रही हैं। किसी भी एक कृषि उत्पाद के दस प्रतिशत अतिरिक्त पैदावार की खबर आते ही देश भर में उस उत्पाद की कीमत में दो सौ प्रतिशत तक गिरावट दर्ज की जाती है। वहीं बीजों, कीटनाशकों और खादों की कीमतों में प्रतिवर्ष दस से बीस प्रतिशत तक इजाफा तय है। आखिर इस खेल के लिए जिम्मेवार कौन है?
कृषि के लिए जरूरी खाद की आपूर्ति करने वाली तीन बड़ी कंपनियों का मुनाफा 2016-17 में 1255 करोड़ रुपए था। यह मुनाफा वर्ष 2015-16 के मुकाबले सैंतीस प्रतिशत ज्यादा था। कीटनाशकों की आपूर्ति करने वाली तीन बड़ी कंपनियों को 2016-17 में 900 करोड़ रुपए का मुनाफा हुआ। यह वर्ष 2015-16 के मुकाबले 23 प्रतिशत ज्यादा था। बीज आपूर्ति करने वाली तीन बड़ी कंपनियों को 2016-17 में 85 करोड़ का लाभ हुआ। वहीं ट्रैक्टर बनाने वाली तीन बड़ी कंपनियों ने वर्ष 2016-17 में किसानों को ट्रैक्टर बेच कर 5300 करोड़ रुपए कमाए।
दूसरी तरफ किसानों का हाल देखिए। पिछले बाईस सालों में पूरे देश में करीब तीन लाख पच्चीस हजार किसानों ने आत्महत्या की है। पिछले तीन साल से लगातार सूखे की स्थिति के बावजूद किसानों ने देश की जनता को रिकार्ड फसल दी। तीन लाख करोड़ रुपए के कर्ज से दबे देश के किसानों ने वर्ष 2016-17 में लगभग सत्ताईस करोड़ टन अनाज की पैदावार की। इसके बावजूद किसानों की औसत आय कम हो रही है, किसान मजदूर में तब्दील होता जा रहा है। हालात इतने खराब हैं कि किसान किसानी छोड़ मजदूर बनने को तैयार हैं। पूरे देश में करोड़ों किसान कम हो गए हैं और दूसरी तरफ खेतिहर मजदूरों की संख्या में वृद्धि हुई है। किसान ही खेतिहर मजदूर बनता जा रहा है। कर्जमाफी के लिए किसान जमीन बेच रहा है, जमीन बेचने के बाद वह अपने परिवार का पेट पालने के लिए खेत में मजदूरी करने को बाध्य है। किसान कर्ज लौटाने में इसलिए विफल है क्योंकिकृषि लागत बढ़ी है। बीज, खाद के दाम लगातार बढ़ रहे है। जबकि मंडी में उसकी फसलों की कीमतें गिर गई है।

पंजाब विश्वविद्यालय, पटियाला के अध्ययन से स्पष्ट है कि किसानों की आत्महत्या की वजह सिर्फ कर्ज नहीं है। कृषि में बढ़ती लागत और पैदावार की गिरती कीमतें भी मुख्य कारण हैं। लगातार बढ़ती कृषि लागत से पीड़ित किसान जब अपने उत्पाद लेकर बाजार में जा रहा है, तो उसे औने-पौने दामों में खरीदा जा रहा है। ऐसे में सरकार को कृषिउत्पादों के लाभकारी मूल्य के लिए सख्त कदम उठाने होंगे। मुनाफे का तंत्र औने-पौने दामों में किसानों से पैदावार खरीद कर उसे बाजार में काफी महंगा कर बेच रहा है। हाल ही में हरियाणा से आई एक रिपोर्ट ने किसानों से हो रही लूट का खुलासा किया है। कुरुक्षेत्र के पिपली स्थित अनाज बाजार में किसानों से बीस से पच्चीस पैसे प्रतिकिलो आलू की खरीद की गई। अगर मंडी के सारे खर्चों के बाद किसान को किए गए भुगतान का हिसाब लगाएं तो किसानों को दस से पंद्रह पैसे किलो ही हाथ लगे।

कुरुक्षेत्र के पिपली में मंगोली गांव के किसान सुखपाल सिंह ने अपना 43 क्विंटल आलू मात्र नौ सौ रुपए में बेचा। हाथ में आए नौ सौ रुपए में से सुखपाल सिंह को मंडी के मजदूरों को पांच सौ बीस रुपए भुगतान करना पड़ा। इसके बाद उनके हाथ सिर्फ तीन सौ अस्सी रुपए ही रह गए। किसान ने जब सारा हिसाब लगाया तो उसे पता चला कि उसकी आलू की कीमत मंडी में सिर्फ 9 पैसे प्रति किलो रह गई। यह आकंड़ा हरियाणा सरकार की मार्केट कमेटी के रिकार्ड में दर्ज है।

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