ताज़ा खबर
 

राजनीतिः हम किधर जा रहे हैं

आज हर दृष्टि से लोग पहले से अधिक सुरक्षित, स्वस्थ, संपन्न और अधिक लंबा जीवन जी रहे हैं और इसे प्रमाणित करने के लिए पर्याप्त आंकड़े उपलब्ध हैं। तब फिर क्या कारण है कि आज लोग पहले से अधिक शिकायत कर रहे हैं कि जीवन दुष्कर हो गया है या होता जा रहा है। अच्छी बातों को लोग जल्दी भूल जाते हैं और बुरी खबर जल्दी फैलती है।
Author November 11, 2017 02:57 am
तस्वीर का इस्तेमाल प्रतीकात्मक है

महेंद्र राजा जैन 

आज दुनिया भर में निराशावाद की गूंज है। ब्रिटेन में किए गए एक सर्वेक्षण में यह सामने आया है कि वहां केवल पांच प्रतिशत लोग सभी बातों को ध्यान में रखते हुए सोचते हैं कि दुनिया पहले से बेहतर है, बेहतर होती जा रही है। यही बात अमेरिका के संबंध में भी कही जा सकती है जहां बस छह प्रतिशत लोग मानते हैं कि दुनिया में सुधार हो रहा है। अब पहले की अपेक्षा अधिक अमेरिकी लोग ज्योतिष और पुनर्जन्म में विश्वास करने लगे हैं। आज अगर कोई यह मानता है कि जीवित रहने के लिए आज से अच्छा समय पहले कभी नहीं था, आज लोगों का स्वास्थ्य पहले से अच्छा रहने लगा है, आज लोग खूब तरक्की कर रहे हैं, असमानता घटी है और लोग पहले की अपेक्षा अधिक सुरक्षित हैं तो वह अल्पसंख्यकों में से है। हालांकि इतिहास की दृष्टि से देखें तो गरीबी, अशिक्षा, बाल श्रम, शिशु मृत्यु, कुपोषण आदि सभी क्षेत्रों में पहले की अपेक्षा काफी कमी हुई है, सुधार हुआ है। युद्ध की आशंका, तानाशाही, प्राकृतिक आपदाएं आदि पहले से कम हुई हैं।

लेकिन इस बात पर कोई जल्दी विश्वास नहीं करेगा। हम शुरू से ही शंकालु और चिड़चिड़े रहे हैं। भय और चिंता ही हमारे अस्तित्व के औजार हैं। पहले के लोग जो आकस्मिक तूफानों और जीवभक्षियों से बचे रहे, वे दुनिया में बराबर नई-नई आपदाओं और चुनौतियों की तलाश में रहते थे, न कि वे जो आराम से बैठे रह कर दुनिया का नजारा देखते रहते थे। उन्हीं के जीन्स हम लोगों में हैं। यही कारण है कि हमें दुर्घटनाओं, आपदाओं की कहानियां सुनने-पढ़ने में मजा आता है, न कि सीधी-सादी सुखांत कहानियों को। जिन पुस्तकों में दुनिया के समाप्त होने, कयामत आदि की बातें रहती हैं, वे अन्य पुस्तकों की अपेक्षा कहीं ज्यादा बिकती हैं।

जोहान नोर्बर्ग की एक पुस्तक ‘प्रोग्रेस: टेन रीजन्स टु लुक फॉरवर्ड टु द फ्यूचर’ में मानवता की विजय के संबंध में काफी विस्तार से बताया गया है। यह लोगों के लिए एक प्रकार की चेतावनी के रूप में लिखी गई है कि हमने जो प्रगति की है, हम जब उसकी ओर से आंख मूंद कर अन्यथा सोचते हैं तो जो समस्याएं बची हुई हैं, उनके लिए बलि के बकरे की तलाश करने लगते हैं। कभी-कभी पहले और अब भी अपने देश को फिर से ‘महान’ बनाने के लिए हम जन-भावनाओं को भड़काने वाले बाजारू नेताओं की शरण में जाते हैं और वे आसान रास्ते सुझाते हैं। वह अर्थव्यवस्था का राष्ट्रीयकरण हो, आयात पर प्रतिबंध हो या आप्रवासियों का निष्कासन आदि, अगर हम सोचते हैं कि ऐसा करने से हमें कोई नुकसान नहीं होगा तो इसके लिए उनकी स्मरण-शक्ति को दोष देना होगा।

सौ-डेढ़ सौ वर्ष पहले पूरे यूरोप में भीषण गरीबी थी। उस समय यूरोप के औसत बच्चे को जो खाना मिलता था, आज अफ्रीका और एशिया के औसत बच्चे को उससे अधिक मिलता है। कार्ल मार्क्स का मानना था कि पूंजीवाद से अमीर ज्यादा अमीर और गरीब ज्यादा गरीब होते जाते हैं। मार्क्स की मृत्यु के समय तक औसत यूरोपीय व्यक्ति मार्क्स के जन्म के समय की अपेक्षा तिगुना धनी हो चुका था। उसके पहले कभी लोगों की स्थिति में ऐसा सुधार नहीं हुआ था। उससे आगे 1981 में देखें तो चीन में दस में से नौ लोग भारी गरीबी में थे। अब दस में से केवल एक व्यक्ति वैसी स्थिति में है। उस समय दुनिया की केवल आधी आबादी को शुद्ध जल उपलब्ध था, अब इक्यावन प्रतिशत को उपलब्ध है।

वैश्विक व्यापार की बात करें तो उससे दुनिया की दौलत में असीमित विस्तार हुआ है। विशेषज्ञों का मानना है कि पिछले तीस वर्षों में यानी शीतयुद्ध की समाप्ति के बाद दुनिया में जितनी दौलत, यानी प्रति व्यक्ति सकल घरेलू उत्पाद जितना बढ़ा है, उतना उसके पहले ढाई हजार वर्षों में भी नहीं बढ़ा था। यह मात्र संयोग नहीं कि इस वृद्धि के साथ-साथ दुनिया भर के देशों में लोगों के द्वारा लोगों के लिए शासन में भी वृद्धि हुई है। एक चौथाई सदी पहले दुनिया के केवल आधे देशों में जनतंत्र था, आज दो तिहाई देशों में है।

‘अच्छे दिन’ पर केवल भारत में नहीं, दुनिया भर में लोग प्रश्नचिह्न लगाते रहे हैं। ऐसा करने वालों में मुख्य रूप से वही लोग हैं जो अपने वर्तमान से असंतुष्ट हैं। वे भूल जाते हैं कि केवल करीब तीस वर्ष पहले के मुकाबले दुनिया भर में आमतौर पर सभी क्षेत्रों में अपूर्व प्रगति हुई है, जिसके कारण हम आज पहले से अधिक स्वस्थ, सुरक्षित और आनंददायक जीवन जी रहे हैं। आज भले ही हम गंगा मैली होने की बात करें, लेकिन यह भी सच है कि केवल गंगा नहीं, दुनिया भर की नदियों की यही स्थिति है। लेकिन अब पहले की अपेक्षा अधिक स्वच्छ जल है। ज्यों-ज्यों हम संपन्न होते जा रहे हैं, हममें स्वच्छता की भावना पहले से अधिक आती जा रही है। पेड़-पौधों के प्रति भी हमारी धारणा में परिवर्तन हुआ है, लोग छोटे-छोटे घरों और फ्लैटों में भी गमले रखने लगे हैं, पौधे उगाने लगे हैं। भारत और चीन जैसे देशों में भी जंगलों के प्रति जागरूकता बढ़ी है, जंगल फिर से बढ़ रहे हैं और तकनीक की सहायता से भूमंडलीय ऊष्मा को कम किया जा रहा है।

आज छोटे-मोटे युद्ध और संघर्ष भी समाचार-पत्रों की सुर्खियां बनते हैं। इसलिए हम सोचते हैं कि दुनिया भर में हिंसा का आतंक है। हम गृह-युद्धों की ही बात सोचते हैं, पर उन युद्धों की बात भूल जाते हैं जो कोलंबिया, श्रीलंका, अंगोला और चाड में समाप्त हो चुके हैं। निश्चय ही आतंकवादियों का खतरा नया है, पर सच कहा जाए तो अब ऐसी घटनाओं में पहले की अपेक्षा कम लोग मारे जाते हैं। इसकी अपेक्षा यूरोप और अमेरिका में आज एक सामान्य व्यक्ति द्वारा मारे जाने का खतरा पहले की अपेक्षा तीस प्रतिशत से भी अधिक है। हालांकि भारत इसका अपवाद नहीं है।

कहा जा सकता है कि आज हर दृष्टि से लोग पहले से अधिक सुरक्षित, स्वस्थ, संपन्न और अधिक लंबा जीवन जी रहे हैं और इसे प्रमाणित करने के लिए पर्याप्त आंकड़े उपलब्ध हैं। तब फिर क्या कारण है कि आज लोग पहले से अधिक शिकायत कर रहे हैं कि जीवन दुष्कर हो गया है या होता जा रहा है। लोग आज भय, हत्या आदि की बात ज्यादा करते हैं। यह स्वाभाविक है, क्योंकि अच्छी बातों को लोग जल्दी भूल जाते हैं और बुरी खबर जल्दी फैलती है।
आज हम ग्लोबल मीडिया के युग में जी रहे हैं और जगह-जगह आईफोन, टेबलेट आदि देखने में आते हैं। इसी कारण कहीं कोई घटना, प्राकृतिक आपदा, हत्या आदि की वारदात होती है तो हमें तुरंत पता चल जाता है और वैसी घठना मुख्य समाचार बनती है। इससे हमें यह सोचने का बहाना मिल जाता है कि अब यह पहले की अपेक्षा अधिक सामान्य बात हो गई है। यह सच नहीं है। पहले भी ऐसी और इनसे भी बड़ी-बड़ी घटनाएं होती थीं, लेकिन उनके संबंध में हमें या तो पता नहीं चलता था या बहुत बाद में पता चलता था, क्योंकि तब आज जैसे संचार माध्यम नहीं थे।

पुरानी बातों को याद करना भी जीव विज्ञान से ही संबंधित है। ज्यों-ज्यों उम्र बढ़ती जाती है, हम पर अधिक जिम्मेदारियां आती जाती हैं और हम सोचने लगते हैं कि पहले हम कितने निश्चिंत और सुरक्षित थे। दरअसल, हरेक समाज और संस्कृति के लोगों का मानना है कि आज के लोगों में उनके माता-पिता और दादा-परदादा जैसी बात नहीं रही है। सवाल है कि यह पंक्ति किसने कही थी कि ‘अब समय कितना खराब आ गया है!’ वह आज के किसी नेता, विचारक, प्रबुद्ध व्यक्ति, समाज-सुधारक ने नहीं, बल्कि आज से एक सदी पहले एक अमेरिकी प्रोफेसर ने इस्तांबुल के एक संग्रहालय में एक शिलालेख पर खुदा देखा था। पुरातत्त्ववेत्ताओं ने उस शिलालेख को ईस्वी पूर्व 3800 का माना है।

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App

  1. No Comments.