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राजनीतिः प्रदूषण की चपेट में जिंदगी

दिल्ली और एनसीआर में जहां औद्योगिक इकाइयों और कारखानों की भरमार है वहां धुंध के साथ ध्वनि प्रदूषण भी चरम पर है। धुंध के मामले में दिल्ली ने बेजिंग को भी पीछे छोड़ दिया है। जरूरत इस बात की है कि औद्योगिक इकाइयों पर नियंत्रण के लिए सख्त कानून बने, मगर उसकी फिलहाल कोई उम्मीद नजर नहीं आती।
Author April 15, 2017 04:04 am

मुजफ्फर हुसैन गजाली

दुनिया में प्रदूषण बड़ा मुद्दा बन गया है। जीवन और पर्यावरण दोनों इससे प्रभावित हैं। पृथ्वी का तापमान बढ़ रहा है और ग्लेशियर पिघल रहे हैं। इससे साफ पानी की किल्लत बढ़ रही है और मौसम बेमानी होते जा रहे हैं। ग्लोबल वार्मिंग का असर खाद्य उत्पादन, प्राणियों, पेड़ पौधों और नदियों के जीवन पर पड़ रहा है। आदमी भोजन के बिना हफ्तों और पानी के बिना कुछ दिनों तक जीवित रह सकता है, मगर हवा के बिना जीना असंभव है। मनुष्य दिन भर में जो कुछ लेता है, उसमें अस्सी प्रतिशत भाग वायु का होता है। वायु विभिन्न गैसों का मिश्रण है। उनकी मात्रा में थोड़ा-सा भी अंतर आने पर वायु का संतुलन बिगड़ जाता है, जो स्वास्थ्य के लिए खतरनाक साबित होता है। सांस लेने के लिए आॅक्सीजन जरूरी है। जब कभी हवा में कार्बन डाइआॅक्साइड या नाइट्रोजन के आक्साइडों की मात्रा बढ़ जाती है, तो यह खतरनाक हो जाती है।

भारत को दुनिया में पर्यावरण के आधार पर सातवें सबसे खतरनाक देश के तौर पर जगह दी गई है। स्वच्छ हवा का स्तर भारत के बड़े शहरों में पिछले बीस वर्षों में बहुत खराब हुआ है। औद्योगिक प्रदूषण चार गुना बढ़ा है। देश के चौबीस राज्यों के एक सौ अड़सठ शहरों की स्थिति पर आधारित ग्रीनपीस इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार भारत में हर साल प्रदूषणजनित रोगों से बारह लाख लोग मर जाते हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन की मानें तो दुनिया के दस में से नौ लोग प्रदूषित हवा में सांस लेने को मजबूर हैं और प्रदूषित हवा से होने वाली हर तीन में से दो मौतें भारत और दक्षिण-पूर्व एशिया में होती हैं। समझा जा सकता है कि भारत में वायु प्रदूषण किस खतरनाक स्तर पर पहुंच गया है। पिछले साल केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने देश के इक्कीस चुनिंदा शहरों की हवा की गुणवत्ता पर एक रिपोर्ट जारी की थी। इसके अनुसार इक्कीस में से केवल एक शहर पंचकूला में वायु गुणवत्ता का स्तर संतोषजनक था। इसके अलावा मुंबई और पश्चिम बंगाल के शहर हल्दिया में भी वायु गुणवत्ता कुछ ठीक नहीं थी।

मुजफ्फरपुर, लखनऊ, दिल्ली, वाराणसी, पटना, फरीदाबाद, कानपुर, आगरा आदि शहरों में प्रदूषण का स्तर बहुत खराब पाया गया। दिल्ली तीसरा सबसे ज्यादा प्रदूषित शहर पाया गया। यूनिसेफ ने भी वायु प्रदूषण के मामले में दिल्ली को सबसे खराब शहर बताया था।
विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार दिल्ली की हवा में पीएम-25 (2.5 माइक्रोन छोटे पर्टिकुलेट मैटर) सबसे अधिक पाया गया है। दिल्ली प्रदूषण नियंत्रण समिति के अनुसार पीएम 2.5 का सुरक्षित स्तर 60 माइक्रोग्राम होता है, जो 153 माइक्रोग्राम पाया गया। पीएम-10 की सघनता 100 माइक्रोग्राम प्रति क्यूबिक मीटर है, जो 286 माइक्रोग्राम तक पहुंच गई। यह स्वास्थ्य के लिए बेहद खतरनाक है। पिछले वर्ष नवंबर में पीएम-2.5 की मात्रा 471 और पीएम-10 की मात्रा 1000 हो गई थी, जिसके कारण दिल्ली में कई दिन तक धुंध छाई रही थी। दिल्ली में वायु प्रदूषण का सबसे ज्यादा असर बस, मोटरसाइकिल, आॅटो और पैदल चलने वालों पर होता है। हवा में घुले जहर से फेफड़े, गुर्दे और दिल आदि प्रभावित हो रहे हैं। अधिकतर लोगों को सिरदर्द, बुखार, जुकाम, खांसी जैसी परेशानियां झेलनी पड़ रही हैं।

पिछले वर्ष मुंबई के धारावी डंपिंग स्टेशन में कूड़ा जलाने के कारण आसपास बसी बस्तियों के लोग अत्यधिक प्रभावित हुए और सैकड़ों लोगों को अस्पताल जाना पड़ा। पिछले अठारह वर्षों में जैविक र्इंधन के जलने से कार्बन डाइआॅक्साइड के उत्पादन में चालीस प्रतिशत का इजाफा हुआ है। इसे रोकने के लिए प्रधानमंत्री ने गरीबों को मुफ्त रसोई गैस देने की योजना शुरू की है। क्योंकि बढ़ी हुई कार्बन डाइआॅक्साइड गैस के कारण पृथ्वी के तापमान में 0.7 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि हुई है। अगर इसे रोकने के लिए ठोस कदम नहीं उठाए गए तो 2030 तक पृथ्वी के वातावरण में कार्बन डाइआॅक्साइड की मात्रा नब्बे प्रतिशत तक बढ़ जाएगी।

वायु प्रदूषण जहां मोटर वाहन बढ़ा रहे हैं वहीं थर्मल पावर स्टेशन, र्इंट के भट्ठे और औद्योगिक इकाइयां भी पीछे नहीं हैं। इसमें खेती के अवशेष जलाना खतरे को और बढ़ाता है। नब्बे के दशक में दिल्ली की हवा को साफ रखने के लिए प्रदूषण पैदा करने वाली छोटी इकाइयों को दिल्ली से बाहर किया गया और सीएनजी बसें चलाई गर्इं। पुरानी बसों को सड़कों से हटा दिया गया। वाहनों को सम-विषम तरीके से चलाने का अनुभव भी किया गया, लेकिन ये सब आधे-अधूरे कदम साबित हुए। पिछले महीने सर्वोच्च न्यायालय ने एक बार फिर भारतीय स्टेज-3 वाहनों के दिल्ली एनसीआर में पंजीकरण पर प्रतिबंध लगा कर वायु प्रदूषण को नियंत्रण करने की कोशिश की है। मगर डीजल से चलने वाली बड़ी-बड़ी गाड़ियां अभी भी सड़क पर दौड़ रही हैं, उन पर किसी तरह की पाबंदी नहीं लगी। एक गैलन पेट्रोल के जलने से लगभग 5720 लाख घन फीट वायु प्रदूषण उत्पन्न होता है, जबकि डीजल से वायु प्रदूषण पेट्रोल की तुलना में कई गुना अधिक उत्पन्न होता है।

राष्ट्रीय ग्रीन ट्रिब्यूनल ने प्रदूषण कम करने के लिए कई कदम उठाने का आदेश दिया है। इसमें बाहरी ट्रकों के शहर में प्रवेश पर प्रतिबंध भी शामिल है। मोटर वाहन, उनके र्इंधन और उनसे निकलने वाले धुएं पर तो सरकार, अदालत दोनों की निगाह है, लेकिन औद्योगिक इकाइयों पर नियंत्रण के लिए कुछ खास नहीं हो पा रहा, जबकि उनसे केवल वायु नहीं, पानी और जमीन भी प्रदूषित हो रही है। दिल्ली और एनसीआर में जहां औद्योगिक इकाइयों और कारखानों की भरमार है वहां धुंध के साथ ध्वनि प्रदूषण भी चरम पर है। धुंध के मामले में दिल्ली ने बेजिंग को भी पीछे छोड़ दिया है। जरूरत इस बात की है कि औद्योगिक इकाइयों पर नियंत्रण के लिए सख्त कानून बने, मगर उसकी फिलहाल कोई उम्मीद नजर नहीं आती।

शादी-ब्याह में डीजे और संगीत आम बात है। इसमें इतना शोर होता है कि आप अपने बराबर बैठे व्यक्ति से भी बात नहीं कर सकते। धार्मिक अनुष्ठानों में भी लाउडस्पीकर तेज बजाया जाता है। आमतौर पर ध्वनि प्रदूषण की ओर किसी का ध्यान ही नहीं है। अनधिकृत कालोनियों में लोग अब भी छोटे कारखाने अपने घरों में चलाते हैं। प्रशासन इसे लेकर गंभीर नहीं।
अभी पांच राज्यों के विधानसभा के चुनाव संपन्न हुए। इस समय दिल्ली में निगम के चुनाव की तैयारी चल रही है। सभी पार्टियों ने चुनाव जीतने के लिए तरह-तरह के वादे किए, लेकिन किसी ने भी अपने घोषणापत्र में प्रदूषण के मुद्दे को शामिल नहीं किया। इससे हमारे राजनीतिक दलों और जनता की उदासीनता का बखूबी अंदाजा लगाया जा सकता है। अगर जीवन को प्रदूषण की चपेट से बचाना है तो मोटर वाहनों की अंधाधुंध संख्या पर अंकुश लगाना होगा। पेड़-पौधों की संख्या बढ़ानी होगी। जंगलों को कटने से बचाने के लिए कोशिश करनी होगी। औद्योगिक विकास और जीवन में ताल-मेल बना कर संतुलन स्थापित करना होगा। कारखानों और औद्योगिक इकाइयों के लिए कड़े कानून बनाए जाएं ताकि उनसे प्रदूषण में इजाफा न हो। शहरी योजनाएं तैयार करते समय इस बात का ध्यान रखा जाए कि वहां पैदल, साइकिल से चलने वालों को परेशानी न हो। सरकार और जनता दोनों को मिल कर अपने वातावरण को साफ रखने के लिए कोशिश करनी होगी। क्योंकि जीवित रहेंगे तभी तो विकास करेंगे, और जीएंगे तभी जब सांस लेने के लिए स्वच्छ हवा, पीने के लिए साफ पानी और खाने के लिए पौष्टिक आहार मिलेगा।

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